Ujjain: उज्जैन की पवित्र नदी अब सरकारी रिकॉर्ड में 'शिप्रा', मुख्यमंत्री के फैसले पर संत समाज ने जताई खुशी
सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के बीच मध्य प्रदेश सरकार ने उज्जैन की पवित्र नदी के नाम को लेकर बड़ा फैसला लिया है। अब सरकारी दस्तावेजों में नदी का नाम 'क्षिप्रा' के बजाय 'शिप्रा' लिखा जाएगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के इस निर्णय का संत समाज, विद्वानों और तीर्थ पुरोहितों ने स्वागत किया है।
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सिंहस्थ 2028 से पहले उज्जैन की पवित्र नदी के नाम को लेकर चला आ रहा संशय अब खत्म हो गया है। भोपाल में हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा आपत्ति जताने के बाद राज्य सरकार ने फैसला लिया है कि अब सरकारी दस्तावेजों में नदी का नाम 'क्षिप्रा' नहीं, बल्कि 'शिप्रा' लिखा जाएगा।
मुख्यमंत्री के इस फैसले का संत समाज, विद्वानों और तीर्थ पुरोहितों ने स्वागत किया है। उनका कहना है कि संस्कृत व्याकरण, प्राचीन कोशों, वैदिक मंत्रों और पौराणिक ग्रंथों के अनुसार नदी का शुद्ध एवं मूल नाम शिप्रा ही है, जबकि क्षिप्रा समय के साथ प्रचलित हुआ एक अपभ्रंश रूप है।
'नदी का शुद्ध नाम शिप्रा ही है'
रामानुजकोट के महंत रामानंदाचार्य ने कहा कि संस्कृत-हिंदी कोश में शिप्रा शब्द स्त्रीलिंग में वर्णित है। इसकी व्युत्पत्ति 'शिप' शब्द से मानी गई है। व्याकरण की दृष्टि से 'श' वाला शिप्रा ही शुद्ध है। उनके अनुसार यह एक विशेष सरोवर से निकली नदी का नाम है, जिसके तट पर उज्जयिनी नगरी बसी है। उनका कहना है कि संस्कृत व्याकरण, पौराणिक ग्रंथों और वैदिक मंत्रों के अनुसार नदी का शुद्ध नाम शिप्रा ही है, जबकि क्षिप्रा समय के साथ प्रचलित हुआ अपभ्रंश रूप है।
संस्कृत व्याकरण के आधार पर 'शिप्रा' ही सही शब्द है और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उसका शुद्ध रूप पुनः स्थापित किया है। वैदिक मंत्रों और पौराणिक ग्रंथों में स्पष्ट रूप से शिप्रा शब्द का ही उल्लेख मिलता है। उन्होंने मंत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि..
"शिप्रा सर्वत्र पुण्यायां ब्रह्महत्यापहारिणी।
अवन्तिकायां विशेषेण शिप्रा उत्तरवाहिनी।।"
उनके अनुसार शिव महापुराण, विष्णु महापुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण और स्कंद पुराण में भी शिप्रा का ही वर्णन मिलता है।
- डॉ. राजेश्वर शास्त्री मूसलगांवकर, संस्कृत ज्योतिर्विज्ञान वेद अध्ययनशाला, विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन
महामंडलेश्वर शांति स्वरूपानंद महाराज ने कहा कि सामान्य बोलचाल में कई शब्द समय के साथ बदल जाते हैं और उनका अपभ्रंश रूप प्रचलित हो जाता है। मध्य प्रदेश की लोकभाषा में आज भी ग्रामीण क्षेत्रों के लोग नदी को 'सिपरई' जैसे उच्चारण से पुकारते हैं। उन्होंने वैदिक मंत्र का हवाला देते हुए कहा कि..
"शिप्रा सर्वत्र पुण्यायां ब्रह्महत्यापहारिणी।
अवन्तिकायां विशेषेण शिप्रा उत्तरवाहिनी।।"
उन्होंने कहा कि शिव महापुराण, विष्णु पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण और स्कंद पुराण में भी शिप्रा का ही उल्लेख मिलता है।
सिप्रा, शिप्रा या क्षिप्रा क्या है सही?
उज्जैन के धर्माधिकारी एवं तीर्थ पुरोहित पंडित नारायण उपाध्याय के अनुसार इस नदी को तीन नामों से जाना गया है। सिप्रा, शिप्रा और क्षिप्रा।
'सिप्रा' नाम मालवा में 'श' को 'स' बोलने की स्थानीय परंपरा के कारण प्रचलित हुआ। स्कंद पुराण में भी इसका उल्लेख मिलता है। वहीं महाकवि कालिदास ने अपने 'मेघदूत' में स्पष्ट रूप से शिप्रा शब्द का प्रयोग किया है। महाभारत, शिव पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण में भी शिप्रा नदी की महिमा का वर्णन मिलता है। इसी नदी के तट पर स्थित सांदीपनि आश्रम में भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा ने शिक्षा ग्रहण की थी। महाकाल मंदिर से दो किलोमीटर दूर स्थित रामघाट भी इसी शिप्रा नदी के तट पर है।
मुख्यमंत्री के इस फैसले के बाद सिंहस्थ 2028 से पहले सरकारी दस्तावेजों, साइनबोर्ड और सभी आधिकारिक अभिलेखों में नदी का नाम शिप्रा ही लिखा जाएगा।
कालिदास के ग्रंथों में भी मिलते हैं प्रमाण
इंदुमती स्वयंवर : शिप्रातरंगानिलकम्पितासु
मेघदूत : शिप्रावातः प्रियतम इव प्रार्थनाचाटुकारः
यजुर्वेद में भी "शिप्रेः..." कहकर ऋषियों ने इस नदी का स्मरण किया है।
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संस्कृत नाम है क्षिप्रा
वास्तव में देखा जाए तो इस नदी का प्राचीन नाम क्षिप्रा ही माना जाता है और यह संस्कृत शब्द है। संस्कृत में क्षिप्रा शब्द का अर्थ तेज अथवा तेज गति से बहने वाली होता है। प्राचीन समय में दिया गया यह नाम नदी के मूल स्वरूप को दर्शाता है। यह एक तेज और स्वच्छ प्रवाह वाली धारा के रूप में बहती थी। पुराणों, वैदिक साहित्य तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों में क्षिप्रा नाम का व्यापक रूप से उल्लेख मिलता है।
समय के साथ क्षिप्रा का उच्चारण बदलकर शिप्रा हो गया। क्षिप्रा और शिप्रा, दोनों नाम एक ही नदी के लिए प्रयुक्त होते हैं। क्षिप्रा नाम आज मध्य प्रदेश और पूरे भारत में व्यापक रूप से प्रचलित है, जबकि अनेक लोग इसे शिप्रा कहकर भी पुकारते और लिखते हैं। यह भी पूरी तरह गलत नहीं माना जाता, क्योंकि क्षिप्रा इसका संस्कृत रूप है, जबकि शिप्रा लोकप्रचलित एवं व्याकरण की एक मान्य परंपरा के अनुसार प्रयुक्त रूप है।

सीएम डॉ. मोहन यादव एक तस्वीर में मां शिप्रा की पूजा अर्चना करते हुए।
