‘एक जान है, चाहे कोई ले ले...': खड़े हनुमान जी के विस्थापन पर लोगों का बड़ा एलान, कहा- यहां से नहीं हटने देंगे
उज्जैन में श्री खड़े हनुमान जी की प्रतिमा के विस्थापन को लेकर प्रशासन और श्रद्धालुओं के बीच विवाद बढ़ गया है। श्रद्धालु प्रतिमा हटाने के विरोध में डटे हैं, जबकि हिंदूवादी संगठनों ने प्रशासन पर भ्रम फैलाने और मनमानी का आरोप लगाया है।
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धार्मिक नगरी उज्जैन में श्री खड़े हनुमान जी की प्रतिमा के विस्थापन को लेकर प्रशासन और श्रद्धालुओं के बीच गतिरोध लगातार बढ़ता जा रहा है। एक ओर नगर निगम और प्रशासनिक अमला प्रतिमा के स्थानांतरण को लेकर स्कैनिंग रिपोर्ट और आईआईटी इंदौर की एक्सपर्ट टीम की मदद से रास्ता तलाश रहा है, वहीं दूसरी ओर श्रद्धालु प्रतिमा को मूल स्थान से हटाने के विरोध में डटे हुए हैं। भक्तों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी कीमत पर प्रतिमा को यहां से हटने नहीं देंगे।
मंदिर परिसर में जुटे श्रद्धालुओं में प्रशासन की कार्रवाई को लेकर नाराजगी है। विरोध कर रहे श्रद्धालुओं ने कहा, "एक जान है, चाहे कोई भी ले ले। अयोध्या में सरयू मय्या लाल हुई थी, अब भले ही यहां शिप्रा मय्या लाल हो जाए, लेकिन बाबा अब यहां से कहीं नहीं जाएंगे। होई वही जो राम रचि राखा।" श्रद्धालुओं के इस रुख से मामला अब केवल मंदिर के ढांचे या प्रतिमा के स्थानांतरण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह आस्था और जनभावनाओं से जुड़ा मुद्दा बन गया है।
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हिंदूवादी संगठनों का आरोप- भ्रम फैला रहा प्रशासन
मामले को लेकर हिंदूवादी नेता रूपेश ठाकुर ने नगर निगम प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि नगर निगम के अधिकारी भ्रम फैला रहे हैं और कार्रवाई से बचने के लिए अलग-अलग तरीके अपना रहे हैं।
रूपेश ठाकुर ने कहा कि पुजारी की सहमति के बिना मंदिर का ढांचा ध्वस्त कर दिया गया, लेकिन अब आगे किसी तरह की मनमानी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा कि शहर के विकास के लिए हिंदू समाज पहले ही 60 से अधिक मंदिरों के मामले में सहयोग कर चुका है। अब श्री खड़े हनुमान जी के स्थान से कोई समझौता नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि मंदिर का ढांचा ध्वस्त किए जाने के बाद भगवान श्री खड़े हनुमान जी को टेंट में विराजमान किया गया है। उन्होंने इस स्थिति की तुलना उस दौर से की, जब प्रभु श्री राम टेंट में विराजमान थे। रूपेश ठाकुर ने कहा कि श्रद्धालुओं के लिए यह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि "गरीबों का एम्स" है, जहां लोगों को आत्मिक और मानसिक संबल मिलता है।
