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Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   Seven decades waiting for the bridge: Bamboo bridge became an essential link between the village and the city

पुल के इंतजार में बीते सात दशक: गांव और शहर के बीच की कड़ी बना बांस का पुल, दो किमी का सफर 200 मीटर में पूरा

Mon, 23 Jan 2023 06:10 PM IST
दिनेश शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शहडोल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शहडोल Published by: दिनेश शर्मा Updated Mon, 23 Jan 2023 06:10 PM IST
सार

शहडोल जिले की विशिष्ट पंचायत का एक गांव बांस के पुल के सहारे शहर से जुड़ा है। कई बार पुल की मांग पर भी कोई सुनवाई नहीं हो रही है। बारिश में दिक्कत और बढ़ जाती है। 

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Seven decades waiting for the bridge: Bamboo bridge became an essential link between the village and the city
गांव को शहर से जोड़ने के लिए बांस का पुल आसरा है। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

मध्यप्रदेश का एक गांव आज भी अपने पहले पुल के लिए तरस रहा है। गांव और शहर के बीच टांकी नाला है, जिस पर बांस का कच्चा पुल यहां के लोगों के जीवन का अहम हिस्सा बना हुआ है। ये पुल शहर से गांव की दूरी सिर्फ दो मीटर में पूरी कर देता है। अगर पुल का इस्तेमाल न किया जाए तो ग्रामीणों को दो किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता है। लोगों ने कई बार सरकार से कच्चे पुल को पक्के पुल में बदलने की मांग की है।
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दरअसल हम बात कर रहे हैं शहडोल संभागीय मुख्यालय से सटे जनपद पंचायत सोहागपुर के ग्राम ढाप टोला की। यहां के बाशिंदे आजादी के बाद से ही मूलभूत सुविधाओं के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं। यहां से शहर चंद कदमों की दूरी पर है, पर नाला बाधक बना हुआ है। ग्रामीणों ने जुगाड़ कर बांस का पुल बनाया है, जिससे पूरा गांव शहर आना-जाना करता है। बांस का पुल कब टूट जाए कोई भरोसा नहीं पर मजबूरी ऐसी कि जान जोखिम में डालकर उसे पार करना पड़ता है। बारिश में स्थिति बिगड़ जाती है। ऐसा नहीं कि यही एकमात्र रास्ता हो शहर जाने का। एक और रास्ता है जो दो किलोमीटर घूमकर शहर को जाता है। ग्रामीण इतनी दूरी से बचने के लिए बांस के पुल का सहारा ले रहे हैं।  
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कई बार मांग की, लेकिन सुनता कोई नहीं
ग्रामीणों का कहना है कि हालकि वह पुल कभी भी टूट सकता है, फिर भी कम दूरी तय करने के कारण जान जोखिम में डालकर उक्त पुल का उपयोग करना मजबूरी है। कई बार प्रशासन के आला अधिकारियों से टांकी नाला के ऊपर स्थाई पुल के निर्माण की मांग की गई, लेकिन आज तक किसी ने इस ओर ध्यान नही दिया। ग्रामीणों का कहना है कि सर्वाधिक दिक्कत बारिश के दिनों में होती है जब बांस से निर्मित पुल के ऊपर तक पानी आ जाता है। ऐसे में शहर पहुंचने के लिए फिर 2 सौ मीटर की जगह 2 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करनी पड़ती है। 
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 विशिष्ट ग्राम पंचायत में बसा है गांव
ग्रामवासियों का कहना है कि प्रदेश में पंचायती राज की स्थापना के बाद ऐसा आभास हुआ था कि अब गांवों की तस्वीर बदल जाएगी। लेकिन स्थिति आज भी जस की तस बनी हुई है। जबकि कोटमा को विशिष्ट ग्राम पंचायत का दर्जा प्राप्त है। जब संभागीय मुख्यालय और शहर की सीमा से लगे गांव की इस प्रकार अनदेखी की जा रही है तो फिर दूर दराज के ग्रामों में विकास की रफ्तार क्या होगी, इसका अंदाज स्वयं लगाया जा सकता है।


जनपद पंचायत सोहागपुर के उपाध्यक्ष शक्ति सिंह ने बताया कि उक्त स्थान पर स्थाई पुल के निर्माण की मांग वर्षों से ग्राम वासियों द्वारा की जा रही है। मैं भी प्रयास में लगा हूं कि शीघ्र ही गांववालों के लिए स्थाई पुल का निर्माण कराया जा सके। 
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