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Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   Surviving in the AI Era: 209-Year-Old Tradition of Clay Sculptures Shines Bright in Rural Madhya Pradesh

एमपी: एआई के दौर में जिंदा है 209 साल पुरानी परंपरा, इस गांव में सजती है मिट्टी की मूर्तियों की जीवंत झांकियां

Sat, 26 Sep 2026 10:22 PM IST
सागर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सागर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सागर Published by: सागर ब्यूरो Updated Sat, 26 Sep 2026 10:22 PM IST
सार

सागर जिले के काछी पिपरिया गांव में करीब 209 वर्षों से ‘पुतरियो का मेला’ आयोजित हो रहा है। दुर्गाप्रसाद पाण्डेय द्वारा शुरू की गई यह परंपरा चार पीढ़ियों से जारी है। मिट्टी की मूर्तियों और धार्मिक झांकियों के साथ मेले में व्यसनमुक्ति और गौ-पालन जैसे सामाजिक संदेश भी दिए जाते हैं।

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Surviving in the AI Era: 209-Year-Old Tradition of Clay Sculptures Shines Bright in Rural Madhya Pradesh
सागर में पुतरियों का मेला - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आज की हाई-टेक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की इस अंधी दौड़ में जहां दुनिया पलभर में बदल रही है, वहीं मध्य प्रदेश के सागर जिले की रहली तहसील के एक छोटे से गांव काछी पिपरिया में समय जैसे ठहर सा गया है। यहां पिछले 209 वर्षों से एक ऐसा परिवार रहता है, जो अपनी माटी की खुशबू और पुरखों की विरासत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोए हुए है। आधुनिकता के इस दौर में भी यहां लगने वाला 'पुतरियो का मेला' अपनी प्राचीन गरिमा के साथ आज भी पूरी शान से जीवंत है।

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क्या है पुतरियो का मेला और इसका इतिहास?
भाद्रपद पूर्णिमा के अवसर पर हर साल लगने वाले इस मेले की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है। करीब 209 साल पहले (वर्षों की गणना के अनुसार) स्व. दुर्गाप्रसाद पाण्डेय ने इस परंपरा की शुरुआत की थी
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कला के जरिए जन-जागरण
उस दौर में जब शिक्षा और संसाधनों का अभाव था, तब स्व. दुर्गाप्रसाद पाण्डेय ने मूर्तिकला और चित्रकला को जन-जागरण का माध्यम बनाया। उन्होंने अपने ही निवास को एक संग्रहालय का रूप दिया और लगभग एक हजार से अधिक मिट्टी की मूर्तियां गढ़कर धार्मिक कथाओं व कृष्ण लीलाओं की सजीव झांकियां सजाईं।


चार पीढ़ियों से अटूट निष्ठा का सफर
यह आयोजन केवल एक मेला नहीं, बल्कि त्याग और समर्पण की एक मिसाल है। पाण्डेय परिवार की चार पीढ़ियां इस परंपरा को पूरी शिद्दत के साथ आगे बढ़ा रही हैं।प्रथम पीढ़ी के स्व. दुर्गाप्रसाद पाण्डेय (संस्थापक), द्वितीय पीढ़ी में स्व. बैजनाथ प्रसाद पाण्डेय (जिन्होंने परंपरा को संभाला), तृतीय व चतुर्थ पीढ़ी में जगदीश प्रसाद पाण्डेय व उनका परिवार, जो आज भी पूरी तन्मयता से इस विरासत को सहेजे हुए हैं।
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केवल धर्म नहीं, समाज सुधार का भी संदेश
पाण्डेय परिवार केवल धार्मिक प्रसंगों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इस अनूठी प्रदर्शनी के माध्यम से समाज को एक सकारात्मक दिशा देने का काम कर रहा है। वे अपने स्वयं के व्यय और अथक परिश्रम से मेले के जरिए व्यसनमुक्ति और गौ-पालन जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश भी जनता तक पहुंचाते हैं। आज जहां मनोरंजन के साधन और तकनीक बदल चुके हैं, इसके बावजूद 'पुतरियो के मेले' के प्रति लोगों का आकर्षण जरा भी कम नहीं हुआ है। पाण्डेय परिवार का संकल्प है कि वे अपनी इस अमूल्य विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पूरी निष्ठा के साथ यूं ही पहुंचाते रहेंगे, ताकि माटी की यह कला और संस्कृति हमेशा अमर रहे।


कलात्मक प्रतिमाएं

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