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Dussehra 2025: यहां का दशहरा कुछ अलग, 10 किलोमीटर के दायरे में नहीं जलाए जाते रावण-कुंभकरण-मेघनाथ के पुतले
Wed, 01 Oct 2025 09:20 PM IST
दिनेश शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ओंकारेश्वर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ओंकारेश्वर
Published by: दिनेश शर्मा
Updated Wed, 01 Oct 2025 09:20 PM IST
सार
ओंकारेश्वर में दशहरा उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन रावण दहन नहीं होता। मान्यता है कि रावण भगवान शिव का परम भक्त था, इसलिए यह परंपरा यहां नहीं रही। विजयादशमी पर भगवान की सवारी, शमी पूजा और राजमहल में मिलन समारोह होता है। संदेश यही है—बाहरी नहीं, भीतर की बुराइयां जलाएं।
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ओंकारेश्वर में नहीं होता रावण के पुतले का दहन
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
ओंकारेश्वर, भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक, धार्मिक आस्था और परंपराओं की अद्वितीय नगरी है। यहां विजयादशमी (दशहरा) पर्व का उत्सव पूरे हर्षोल्लास और भव्य परंपरा के साथ मनाया जाता है, लेकिन इस नगरी की एक विशेषता है कि यहां कभी रावण दहन नहीं किया जाता।
किवदंती और प्रचलित मान्यता के अनुसार, ओंकारेश्वर से 10 किलोमीटर के दायरे में स्थित किसी भी गांव में रावण दहन नहीं होता। प्राचीन काल से चली आ रही इस परंपरा को आज भी यहां के लोग मानते हैं। समीपवर्ती ग्राम शिवकोठी के कुछ युवाओं ने रावण का पुतला बनाकर उसका दहन किया था। लेकिन इसके बाद पूरे गांव में विवाद खड़ा हो गया। गांव दो भागों में बंट गया, महिलाएं आपस में बोलचाल बंद कर बैठीं और पुरुषों ने भी एक-दूसरे से मेल-मिलाप बंद कर दिया। धार्मिक कार्यक्रमों में आना-जाना रुक गया और गांव का सामाजिक ताना-बाना टूट गया। अंततः गांव के बुजुर्ग आगे आए, समझौता कराया और यह संकल्प लिया कि भविष्य में गांव में कभी रावण दहन नहीं होगा।
ये भी पढ़ें- यहां दशहरे पर रावण और कुंभकर्ण का 'दहन' नहीं 'पूजन' होता है, प्रसाद चढ़ाकर मांगते हैं मन्नत
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आखिर क्यों नहीं जलाया जाता रावण
ओंकारेश्वर के लोगों का मानना है कि रावण भगवान शिव का परम भक्त था। उसने भगवान को प्रसन्न करने के लिए अपने ही सिर भगवान को अर्पित कर दिए थे। इसीलिए यहां रावण दहन की परंपरा नहीं रही। हालांकि स्थानीय पुजारियों और विद्वानों का कहना है कि यह केवल भक्ति का कारण नहीं है। ओंकारेश्वर पंडा संघ के अध्यक्ष पंडित नवल किशोर शर्मा ने कहा भगवान भोलेनाथ का भक्त था रावण, उसके जैसा भक्त ना कभी हुआ ना आगे होगा। यह परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है, जिसका पालन नगर वासी एवं सभी लोग कर रहे हैं। मंदिर के सायंकालीन पुजारी पंडित डंकेश्वर दीक्षित बताते हैं कि यह परंपरा बहुत पुरानी है और नगरवासियों ने इसे पीढ़ियों से निभाया है।
ओंकारेश्वर में दशहरा उत्सव की परंपरा
यहां रावण दहन न होते हुए भी विजयादशमी का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। भगवान ओंकारेश्वर की भव्य सवारी मंदिर परिसर से शाम 7 बजे पूजन-अर्चन और आरती के बाद निकलती है। सवारी नगर के मुख्य बाजार होते हुए खेड़ापति हनुमान मंदिर पहुंचती है, जहां पर सामी वृक्ष (शमी वृक्ष) की पूजा होती है। इसके बाद भगवान की सवारी मंदिर लौटती है और फिर नगरवासी राजमहल पहुंचते हैं।
ये भी पढ़ें- दमोह में होगा 50 फीट ऊंचे रावण का दहन, बारिश की आशंका ने घटाया कद, आतिशबाजी होगी मुख्य आकर्षण
राजमहल में राजा राव पुष्पेंद्रसिंह गद्दी पर विराजमान होते हैं। नगर की जनता उन्हें विजयादशमी की शुभकामनाएं देती है और बदले में राजा अपनी प्रजा को श्रीफल और प्रसाद देकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं। यह दृश्य अपने आप में एक अनूठा दशहरा मिलन समारोह बन जाता है, जहां आपसी भाईचारे और सौहार्द का संदेश दिया जाता है।
बुराइयों का दहन, रावण का नहीं
ओंकारेश्वर में विजयादशमी का मूल संदेश यह है कि बाहरी रावण को जलाने की जगह, इंसान को अपने भीतर की बुराइयों को खत्म करना चाहिए। यहां दशहरे के दिन प्रतीकात्मक रूप से यह माना जाता है कि रावण की बुराइयां ही जलती हैं, जबकि पुतला दहन की परंपरा नहीं निभाई जाती।
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किवदंती और प्रचलित मान्यता के अनुसार, ओंकारेश्वर से 10 किलोमीटर के दायरे में स्थित किसी भी गांव में रावण दहन नहीं होता। प्राचीन काल से चली आ रही इस परंपरा को आज भी यहां के लोग मानते हैं। समीपवर्ती ग्राम शिवकोठी के कुछ युवाओं ने रावण का पुतला बनाकर उसका दहन किया था। लेकिन इसके बाद पूरे गांव में विवाद खड़ा हो गया। गांव दो भागों में बंट गया, महिलाएं आपस में बोलचाल बंद कर बैठीं और पुरुषों ने भी एक-दूसरे से मेल-मिलाप बंद कर दिया। धार्मिक कार्यक्रमों में आना-जाना रुक गया और गांव का सामाजिक ताना-बाना टूट गया। अंततः गांव के बुजुर्ग आगे आए, समझौता कराया और यह संकल्प लिया कि भविष्य में गांव में कभी रावण दहन नहीं होगा।
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आखिर क्यों नहीं जलाया जाता रावण
ओंकारेश्वर के लोगों का मानना है कि रावण भगवान शिव का परम भक्त था। उसने भगवान को प्रसन्न करने के लिए अपने ही सिर भगवान को अर्पित कर दिए थे। इसीलिए यहां रावण दहन की परंपरा नहीं रही। हालांकि स्थानीय पुजारियों और विद्वानों का कहना है कि यह केवल भक्ति का कारण नहीं है। ओंकारेश्वर पंडा संघ के अध्यक्ष पंडित नवल किशोर शर्मा ने कहा भगवान भोलेनाथ का भक्त था रावण, उसके जैसा भक्त ना कभी हुआ ना आगे होगा। यह परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है, जिसका पालन नगर वासी एवं सभी लोग कर रहे हैं। मंदिर के सायंकालीन पुजारी पंडित डंकेश्वर दीक्षित बताते हैं कि यह परंपरा बहुत पुरानी है और नगरवासियों ने इसे पीढ़ियों से निभाया है।
ओंकारेश्वर में दशहरा उत्सव की परंपरा
यहां रावण दहन न होते हुए भी विजयादशमी का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। भगवान ओंकारेश्वर की भव्य सवारी मंदिर परिसर से शाम 7 बजे पूजन-अर्चन और आरती के बाद निकलती है। सवारी नगर के मुख्य बाजार होते हुए खेड़ापति हनुमान मंदिर पहुंचती है, जहां पर सामी वृक्ष (शमी वृक्ष) की पूजा होती है। इसके बाद भगवान की सवारी मंदिर लौटती है और फिर नगरवासी राजमहल पहुंचते हैं।
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राजमहल में राजा राव पुष्पेंद्रसिंह गद्दी पर विराजमान होते हैं। नगर की जनता उन्हें विजयादशमी की शुभकामनाएं देती है और बदले में राजा अपनी प्रजा को श्रीफल और प्रसाद देकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं। यह दृश्य अपने आप में एक अनूठा दशहरा मिलन समारोह बन जाता है, जहां आपसी भाईचारे और सौहार्द का संदेश दिया जाता है।
बुराइयों का दहन, रावण का नहीं
ओंकारेश्वर में विजयादशमी का मूल संदेश यह है कि बाहरी रावण को जलाने की जगह, इंसान को अपने भीतर की बुराइयों को खत्म करना चाहिए। यहां दशहरे के दिन प्रतीकात्मक रूप से यह माना जाता है कि रावण की बुराइयां ही जलती हैं, जबकि पुतला दहन की परंपरा नहीं निभाई जाती।
