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Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   MP's Narmada Valley scam: Megha and Diggi said that no action was taken for 6 years due to the alliance between the government and the touts

MP का नर्मदा घाटी घोटाला: मेघा और दिग्गी बोले शासन और दलालों के गठजोड़ से 6 साल से नहीं हुई कार्रवाई 

Mon, 07 Mar 2022 09:16 PM IST
आनंद पवार न्यू डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यू डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Published by: आनंद पवार Updated Mon, 07 Mar 2022 09:16 PM IST
सार

मध्यप्रदेश में नर्मदा घाटी परियोजना में फर्जी रजिस्ट्रियां के मामले में 6 साल से मध्यप्रदेश सरकार और दलालों के गठजोड से नहीं होने का आरोप लगाया है। सोमवार को मेघा पाटकर और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने संयुक्त रूप से प्रेसवार्ता की। 

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MP's Narmada Valley scam: Megha and Diggi said that no action was taken for 6 years due to the alliance between the government and the touts
मेघा पाटकर और दिग्विजय सिंह की प्रेसवार्ता - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मध्यप्रदेश में नर्मदा घाटी परियोजना में फर्जी रजिस्ट्रियां के मामले में 6 साल से मध्यप्रदेश सरकार और दलालों के गठजोड से नहीं होने का आरोप लगाया है। इसको लेकर सोमवार को मेघा पाटकर और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने संयुक्त रूप से प्रेसवार्ता की। 

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नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़ी मेघा पाटकर और दिग्विजय सिंह ने कहा कि मध्यप्रदेश में नर्मदा घाटी परियोजना में 1590 फर्जी रजिस्ट्रियां  की गई। इसमें अलीराजपुर में 44, बड़वानी में 167, धार में 705, देवास में 143 और खरगोन में 531 की गई। उन्होंने झा आयोग की रिपोर्ट के हवाले से बताया कि पुनर्वास नीति का मनमर्जी से मुआवजा बांटने में उपयोग किया। पुनर्वास अधिकारियों ने जमीन के बदले जमीन देने में कोई रूचि नहीं दिखाई। यह भष्टाचार अधिकारियों की सांठगाठ से किया गया। इसमें 32 पटवारी, 3 भू-अर्जन अधिकारी, 1 तहसीलदार, 10 अधिवक्ता, उपजीयक कार्यालय, भू-अर्चन कार्यालय के बाबू, भृत्य, दस्तावेज लेखक, स्टाम्प वेंड कुल 52 लोग शामिल थे। यहीं नहीं इसमें बताया गया कि बड़वानी के एक दलाल गाेवर्धन के परिजनों ने एक ही जमीन को 87 बार बेचा। प्रेसवार्ता में आरोप लगाया गया कि प्रभावितों को जमीन ना देकर नकद राशि देकर भ्रष्टाचार किया गया।  जिसमें 1600 गरीब किसानों की फर्जी रजिस्ट्री करवाकर करोड़ों रूपयों का भ्रष्टाचार अधिकारियों, कर्मचारियों और दलालों ने किया है। 

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 झा आयोग के निष्कर्ष

1-झा आयोग के समक्ष सरदार सरोवर पुनर्वास के कई मुद्दें जांच के लिये सम्मिलित रहे। हर मुद्दे पर गहरी जांच हुई करीब 10 हजार लोगों की सुनवाई की और 7 सालों के बाद जनवरी 2016 में रिपोर्ट पेश किया।

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2- वैकल्पिक जमीन खरीदने के लिए 5.58 लाख रुपए अनुदान देने से भ्रष्टाचार हुआ। इसमें फर्जी रजिस्ट्रियों की गई। अधिकारियों और दलालों की सांठ--गांठ से बड़ा भ्रष्टाचार हुआ है।  

3- जिन 200 दलालों की सूची झा आयोग ने रिपोर्ट में घोषित की है उन पर सख्त कार्यवाही के लिये शासन से जांच की जरूरत नही समझी है जबकि तत्काल कार्यवाही होना चाहिए।

4-रजिस्ट्रियां पूर्णतः फर्जी होते हुए भी की गई, जिसमें राजस्व विभाग, रजिस्ट्रार कार्यालय एवं नर्मदा सरदार सरोवर पुनर्वास कार्यालय के कर्मचारी/अधिकारी सम्मिलित होने की हकीकत झा आयोग की रिपोर्ट से स्पष्ट है। 

5-मकान के लिये भू-खण्ड आवंटन में प्रक्रिया भू-राजस्व संहिता के तहत होते हुए भी आधी अधूरी होने से आवंटित भू-खण्डों में परिवर्तन भी भ्रष्टाचार का आधार बन गया। भू-खण्ड आवंटन की कानूनी प्रक्रिया का पूर्ण तरिके से उल्लंघन होने से सारे अधिकारी इन अनियमित्ताएं एवं भ्रष्टाचार के लिये जिम्मेदार है।  

6-आजीविका अनुदान के भुगतान संबंधी सही रिकोर्ड नही रखा गया। जिससे अनुदान आजीविका संबंधी साधन खरीदी पर ही खर्च होना साबित हो सकता था। इस वास्तविकता को भ्रष्टाचार ही कहकर आयोग ने निष्कर्ष निकाला । हजारो परिवारों को आजीविका अनुदान का भुगतान हुआ है। लेकिन उसमें पाई गई अनियमितता संबंधी कोई कार्यवाही, किसी को दोषी भी न करार करते हुए, टाली गई है। न ही जांच आगे बढ़ाई गई है, न ही गलत भुगतान या उससे दलालों ने निकाला गया हिस्सा वसूला गया। शासकीय तिजोरी पर यह डाका होते हुए भी किसी को दोषी करार नही किया गया। 

7- म.प्र. की 83 पुनर्वास स्थलों पर निर्माण की, सुविधा-संरचनाओं की जांच में पूर्व में ऑडिटर से होकर 40 इंजीनियर्स और अन्य कर्मचारी प्रथम निलंबित और आखिर सेवा से हटाये गये थे जिसमें भ्रष्टाचारी साबित हुआ था। झा आयोग ने इस मुद्दे पर तकनीकी जांच होते हुए मैनिट भोपाल और आई.आई.टी. मुम्बई को कार्य सौंप दिया। मैनिट भोपाल की टीम ने एक-एक बसाहट में पहुंचकर जांच की, विस्तृत रिपोर्ट में पानी, बिजली, सड़क, पुलिया जैसी हर सुविधा के निर्माण कार्य में हुई तमाम अनियमितताओं का ब्योरा दिया था। उसमें कई सारी धांधलियां जिनमें आर्थिक मुनाफा कमाने की साजिश पायी गई थी। पुनर्वास स्थलों को चुनने से लेकर बिजली सप्लाई के लिये ट्रांसफार्मर खरीदने में भ्रष्टाचार साबित हुआ है। इन सभी मुददों पर छोटे कर्मचारी ही नही ऊँचे स्तर पर बैठे अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध नजर आती है। बसाहटों का निर्माण कार्य आज तक पूरा नही कराया गया है। भ्रष्टाचार का ही नतीजा है कि सुविधा-संरचना निर्माण में गुणवत्ता कम होकर विस्थापितों को ही भुगतना पड़ा है। जो आज भी पीड़ित है। 

8- मैनिट/आई.आई.टी. की विस्तृत जांच रिपोर्ट में आये कई निष्कर्ष और आरोपों को एन.व्ही.डी.ए. ने श्री खरे (संयुक्त संचालक) ने आपत्ति उठाकर या पूर्णतः नकारकर एक चुनौती दी लेकिन इसमें भी सच झूंठ की तलाश नहीं हुई, न ही कोई कार्यवाही हुई।
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