MP Politics: कर्नाटक नतीजों के बाद एमपी में बढ़ीं सिंधिया समर्थक विधायकों की धड़कनें, बन रहे टिकट कटने के आसार
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विस्तार
कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद मध्यप्रदेश के दल-बदलू नेताओं की धड़कनें बढ़ गई हैं। क्योंकि कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए आधे से ज्यादा विधायकों को इन चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा है। एमपी में भी मार्च 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ 22 विधायक कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे। कर्नाटक के रिजल्ट के बाद इन नेताओं की घबराहट बढ़ सी गई है। सिंधिया समर्थक विधायक कई चुनौतियों से जूझते हुए नजर आ रहे हैं। एक ओर जनता में इनके ख़िलाफ़ नकारात्मक माहौल है, तो वहीं भाजपा में भी सिंधिया समर्थक विधायकों के लिए सहजता दिखाई नहीं दे रही है। पार्टी फ़ोरम पर भी इन्हें लेकर असंतोष सार्वजनिक रूप से मुखर हो रहा है। विधानसभा चुनाव को देखते हुए वोटर्स को फिर से साधना भी इन विधायकों लिए परेशानी बना हुआ है।
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इसी बीच सोमवार को केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बीच मुलाकात हुई। दोनों नेताओं की यह बैठक करीब घंटे से ज्यादा चली। हालांकि दोनों नेताओं ने इस मुलाकात को शिष्टाचार भेंट बताया है। विधायकों के आंतरिक सर्वे के बाद दोनों नेताओं की यह मुलाकात बेहद मानी जा रही है। मध्यप्रदेश भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने के अनुरोध पर अमर उजाला से चर्चा में कहा कि अब कर्नाटक के नतीजों के बाद मध्यप्रदेश में भाजपा कार्यकर्ता और अधिक मुखर हो जाएंगे। जितनी भी विधानसभा सीटों पर ज्योतिरादित्य सिंधिया का प्रभाव है, उन सभी सीटों पर भाजपा के मूल कार्यकर्ता और सिंधिया समर्थक नेताओं के बीच खुला संघर्ष चल रहा है। पार्टी स्पष्ट रूप से दो भागों में बटी हुई दिखाई देती हैं। पहले यह लड़ाई पर्दे के पीछे चल रही थी, लेकिन चुनाव नजदीक आते देख यह खुले आम शुरू हो गया है। अगर इस तरह का विरोध चलता रहा तो पार्टी को सिंधिया प्रभावी सीटों पर भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
वरिष्ठ नेता के मुताबिक, ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए कार्यकर्ताओं के नेता आज भी सिंधिया ही हैं। जबकि भाजपा में संगठन महत्वपूर्ण होता है, नेता महत्वपूर्ण नहीं होता। सिंधिया समर्थक खुलेआम बयान बाजी करते हैं। कहते हैं कि उनके लिए उनका नेता सबसे महत्वपूर्ण है। सिंधिया समर्थकों के बयान भाजपा के आधार पाठ्यक्रम के खिलाफ हैं। यही कारण है कि सिंधिया समर्थक और भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच वैचारिक मतभेद शुरू हो जाते हैं। जबकि सिंधिया अपनी श्रीमंत की छवि को छोड़कर जमीन पर एक्टिव नजर आते हैं। कार्यकर्ताओं से खुलकर मिलते हैं। लेकिन उनके समर्थक विधायकों आज भी अपने पुराने रंग में ही नजर आते हैं।
कर्नाटक में भाजपा ने 19 विधायकों के टिकट काटे
कर्नाटक में पिछले चुनाव में भाजपा ने 224 में से 104 सीटें जीतीं थीं। लेकिन 2023 के के चुनाव में 19 विधायकों के टिकट काटे। इसमें पूर्व सीएम से लेकर तीन बार तक के विधायक शामिल थे। हालांकि इसका नतीजा यह रहा कि जिन सीटों पर पार्टी ने नए चेहरों को टिकट दिया था, उनमें से 16 लोग चुनाव जीत गए। वहीं मध्यप्रदेश भाजपा के पास 126 विधायक हैं। लेकिन पार्टी आंतरिक सर्वे में 50 से ज्यादा विधायकों की रिपोर्ट ठीक नहीं हैं। मध्यप्रदेश में 3 से लेकर 8 बार के 59 विधायक हैं। ऐसे में भाजपा कर्नाटक की तरह एमपी में भी नए चेहरों पर दांव लगा सकती है।
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यह हुआ था मध्यप्रदेश में
2018 के चुनाव में कांग्रेस की 114 सीटें आई थीं। इसके बाद कमलनाथ ने निर्दलीय, सपा और बसपा के समर्थन से सरकार बना ली थी। लेकिन, महज 15 महीने ही बीते थे कि सिंधिया समर्थक विधायकों ने दल बदल लिया था। सबसे पहले मार्च 2020 में 22 विधायक भाजपा में शामिल हुए, इसके बाद धीरे-धीरे छह और आ गए। यानी 28 कांग्रेस विधायक भाजपा में आ गए और शिवराज सिंह चौहान की सरकार बन गई। हालांकि, उपचुनाव में 28 में से 09 विधायक चुनाव हार गए थे। हार के बाद ज्यादातर को सरकार ने निगम-मंडल में नियुक्ति देकर उपकृत कर दिया है। हालांकि आगामी चुनाव में इन सभी के टिकट को लेकर अनिश्चय बना हुआ है, जिससे उनका सियासी भविष्य दांव पर लगा है।
