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MP Politics: पहले कैलाश विजयवर्गीय से प्रभार छीना, अब शिवराज को संसदीय बोर्ड से हटाया, क्या हैं इसके मायने

Thu, 18 Aug 2022 07:18 PM IST
आनंद पवार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Published by: आनंद पवार Updated Thu, 18 Aug 2022 07:18 PM IST
सार

भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति में पिछले एक हफ्ते में मध्यप्रदेश को दो बड़े नुकसान हुए। कैलाश विजयवर्गीय से पश्चिम बंगाल का प्रभार छीन लिया गया। वहीं सीएम शिवराज सिंह चौहान को संसदीय बोर्ड और केंद्रीय चुनाव समिति से हटाया है। इससे प्रदेश के दोनों बड़े नेताओं के भविष्य को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। 

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MP Politics: First took away the charge from Kailash Vijayvargiya, now Shivraj removed from the parliamentary
सीएम शिवराज और कैलाश विजयवर्गीय - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मध्य प्रदेश में 15 महीने बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। इसके पहले भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर बड़े बदलाव किए हैं। महासचिव कैलाश विजयवर्गीय से पश्चिम बंगाल का प्रभार वापस लिया। वहीं, अब शिवराज सिंह चौहान को संसदीय बोर्ड के साथ-साथ केंद्रीय चुनाव समिति से हटा दिया। इसके बाद से मध्यप्रदेश के इन दो नेताओं की राष्ट्रीय राजनीति में अस्तित्व को लेकर सुगबुगाहट शुरू हो गई है। हालांकि, दोनों का राज्य की राजनीति में अपना कद है और फिलहाल दोनों का विकल्प पार्टी के पास नहीं दिख रहा है।
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मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भाजपा की सबसे ताकतवर संसदीय बोर्ड से बाहर किया तो इसके कारणों को लेकर कयासबाजी शुरू हो गई। लोगों में भी जिज्ञासा है कि आगे क्या होगा? आखिर संसदीय बोर्ड ही तो तय करता है कि किस राज्य में किसे मुख्यमंत्री बनाया जाएगा? किसी पार्टी से गठबंधन करना है या नहीं? यानी पार्टी के हर छोटे-बड़े फैसले पर संसदीय बोर्ड की मुहर आवश्यक होती है। प्रदेश में चेहरा बदलने की कवायद 2018 से ही हो रही है। शिवराज को केंद्र में बड़ी जिम्मेदारी देने की बात भी हो रही है, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व जब भी प्रदेश में आता है तो इन कयासों को नकार दिया जाता है। अब शिवराज की संसदीय बोर्ड और केंद्रीय चुनाव समिति से छुट्टी के बाद एक बार फिर 2023 के विधानसभा चुनावों से पहले चेहरा बदलने की चर्चा तेज हो गई है।
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विजयवर्गीय को लेकर भी अटकलबाजी
कैलाश विजयवर्गीय की बात करें तो वे अब भी पार्टी के महासचिव हैं। पश्चिम बंगाल का प्रभार उनसे वापस ले लिया गया है। मध्यप्रदेश में भी सक्रियता कम हुई है। हरियाणा में सरकार बनाने का सेहरा बांधने के बाद विजयवर्गीय को पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्य की जिम्मेदारी दी थी। वहां भी विजयवर्गीय ने अच्छा काम किया है। इस वजह से उनके भविष्य को लेकर अटकलें भी लग रही हैं। क्या उन्हें विधानसभा और लोकसभा चुनाव में कोई बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी?
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शिवराज का मध्यप्रदेश में कोई विकल्प नहीं

दो दशक से भी अधिक समय से मध्यप्रदेश की राजनीतिक घटनाओं की नब्ज पढ़ रहे वरिष्ठ पत्रकार प्रभु पटेरिया कहते हैं कि शिवराज को बदलने के कयास नए नहीं हैं। लंबे अरसे से उनका विकल्प तलाशने की खबरें आ रही हैं। नगरीय निकाय और पंचायत चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा रहा है। इसके बाद फिलहाल शिवराज को हटाने की संभावना कम ही है। प्रदेश में भाजपा के पास कोई दूसरा विकल्प है भी तो नहीं। शिवराज देश में भाजपा के सबसे लंबी अवधि तक रहने वाले मुख्यमंत्री हैं। जनता के बीच से आए हैं। जनता की बात करते हैं। जहां तक कमेटियों से हटाने की बात है, तो इससे प्रदेश की राजनीति पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। जब भी चुनाव होते हैं तो संबंधित प्रदेश का मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष, संगठन महामंत्री भी निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल रहते हैं। ऐसे में शिवराज का प्रदेश में कद कम होगा, ऐसा सोचना भी इस समय ठीक नहीं लगता। उनको हटाना एक तरह से रोटेशन की प्रक्रिया है। 

 
बीजेपी विजयवर्गीय को नजरअंदाज नहीं करेगी 
कैलाश विजयवर्गीय को हटाने की बात है तो पश्चिम बंगाल में उनका टास्क पूरा हो गया था। दूसरा उन पर राजनीतिक दुर्भावना से केस केस दर्ज होना भी कारण बताए जा रहे है। इस वजह से वे विधानसभा चुनावों के बाद पश्चिम बंगाल गए भी नहीं हैं। जहां तक उनके प्रभाव की बात है तो मालवा-निमाड़ क्षेत्र में विजयवर्गीय का दबदबा है। इस क्षेत्र में भाजपा अच्छा प्रदर्शन कर रही है। यहां तक कि नगरीय निकायों में भी प्रदेश का यह ही ऐसा क्षेत्र था, जहां सभी नगर निगमों पर भाजपा ने कब्जा जमाया। आज भले ही सरकार में नरोत्तम मिश्रा संकटमोचक की भूमिका में हों, उनसे पहले कैलाश विजयवर्गीय ही यह भूमिका निभा रहे थे। बीजेपी कैलाश विजयवर्गीय को नजरअंदाज नहीं करेगी। 
 
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