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MP News: IPS कैलाश मकवाना छह महीने में किसकी आंखों की किरकिरी बने? पर्दे के पीछे की कहानी चौंकाने वाली

Mon, 05 Dec 2022 09:06 PM IST
आनंद पवार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Published by: आनंद पवार Updated Mon, 05 Dec 2022 09:06 PM IST
सार

1988 बैच के आईपीएस अधिकारी कैलाश मकवाना को उनकी ईमानदार छवि के चलते ही मुख्यमंत्री ने लोकायुक्त का डीजी बनाया था। 2 जून 2022 को पदभार संभालने के साथ ही मकवाना ने लोकायुक्त पुलिस की धीमी कार्यप्रणाली को गति में लाना शुरू कर दिया। सूत्रों के अनुसार काम करने में आ रही कुछ अड़चनों का दूर करने के उन्होंने सुझाव दिए, जिसके बाद से ही उनको हटाने की पटकथा लिखना शुरू हो गई।  

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MP News: In whose eyes did IPS Kailash Makwana become an eyesore in six months? shocking behind the scenes sto
वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी कैलाश मकवाना - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भ्रष्टाचार पर प्रहार की बात करने वाली सरकार ने छह महीने में लोकायुक्त के डीजी कैलाश मकवाना से तौबा कर ली। मकवाना के तेवर से प्रदेश के बड़े साहबों में खौफ का माहौल था। कई बड़े अधिकारियों की मकवाना ने गर्दन पकड़ ली थी। इसके बाद सरकार में बेचैनी बढ़ गई थी। एक खेमे ने मकवाना के खिलाफ लॉबिंग शुरू कर दी थी। दरअसल मकवाना ने सीएम के ड्रीम प्रोजेक्ट महाकाल लोक में भ्रष्टाचार की जांच शुरू कर दी थी। साथ ही लंबे समय से पड़ी शिकायतों की पुरानी फाइलों को खोलना शुरू कर दिया था। इसकी वजह से चुनावी साल में सरकार की भी किरकिरी होती। इसके बाद कैलाश मकवाना खटकने लगे थे। लोकायुक्त डीजी के पद से हटाए जाने के बाद कई तरह की चर्चाएं हैं।

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1988 बैच के आईपीएस अधिकारी कैलाश मकवाना को उनकी ईमानदार छवि के चलते ही मुख्यमंत्री ने लोकायुक्त का डीजी बनाया था। 2 जून 2022 को पदभार संभालने के साथ ही मकवाना ने लोकायुक्त पुलिस की धीमी कार्यप्रणाली को गति में लाना शुरू कर दिया। पुरानी शिकायतें, पुराने अपराध पर कार्रवाई करने के निर्देश दिए। पुराने केस का बड़ी संख्या में निपटारा होने लगा। हालांकि इस बीच कुछ काम करने में अड़चनें भी सामने आईं, जिनको दूर करने सुझाव मकवाना की तरफ से लोकायुक्त को दिए गए। सूत्रों के अनुसार उन सुझाव पर कुछ नहीं हुआ, लेकिन उनको हटाने की पटकथा लिखना शुरू हो गया।

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लोकायुक्त की अभी की कार्यप्रणाली के अनुसार रिश्वत लेने की शिकायत मिलने पर लोकायुक्त पुलिस वेरिफाइ करने के बाद ट्रैप कर आरोपी को पकड़ लेती है, लेकिन सरकारी बड़े पदों पर बैठे और अनुपातहीन संपत्ति की शिकायत के लिए लोकायुक्त पुलिस को जांच के अधिकार ही नहीं हैं। इस संबंध में लंबे समय से कई शिकायतें लोकायुक्त में धूल खा रही थीं। दरअसल ऐसे मामलों में कुछ साल से नियम बना दिया गया कि इसकी लोकायुक्त पुलिस सीधे जांच नहीं करेगी। इसके लिए लोकायुक्त से अनुमति लेना जरूरी होगी। नियम अनुसार एसपी शिकायतें डीजी को भेजेंगे और डीजी उनको लोकायुक्त को भेजेंगे। जिनके अनुमति मिलने के बाद ही पुलिस जांच कर सकेगी।

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सूत्रों के अनुसार मकवाना ने लंबे समय से लोकायुक्त में धूल खा रही शिकायतों को निकालकर उनका प्रारंभिक परीक्षण शुरू किया। इसमें शिकायतें में कई बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों के विभागीय गड़बड़ी और अनुपातहीन संपत्ति होने के प्रमाण मिले। इन पर डीजी की अनुशंसा के बावजूद लोकायुक्त से जांच की अनुमति लेने भेजने पर कोई जवाब नहीं मिलता था। फाइल ही वापस नहीं आती थी। इसी को लेकर लोकायुक्त और डीजी मकवाना के बीच दूरियां बढ़ गईं। सूत्रों के अनुसार मकवाना ने लोकायुक्त पुलिस को शिकायत मिलने के बावजूद जांच के अधिकार नहीं होने पर सवाल उठाए। जिससे बड़े-बड़े अधिकारी जांच के घेरे में आते। यही कारण है कि ईमानदार छवि के आईपीएस कैलाश मकवाना को सरकार 6 महीने भी नहीं झेल पाई।

वहीं, डीजी मकवाना उज्जैन में महाकाल कॉरिडोर निर्माण में गड़बड़ी, आयुष्मान योजना में निजी अस्पतालों में करोड़ों रुपये के भुगतान, पोषण आहार जैसे मामलों की जांच करना चाह रहे थे। हालांकि सूत्रों का कहना है कि ऐसे कई बड़े मामले शिकायतें के रूप में लोकायुक्त में पड़े हुए हैं। जिनको खोलना मकवाना को भारी पड़ा।  

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