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मंदसौर में मीनाक्षी नटराजन का मुकाबला मोदी से

Tue, 15 Apr 2014 03:25 PM IST
जयप्रकाश पाराशर/ अमर उजाला ब्यूरो, पिपलिया मंडी (मंदसौर)
जयप्रकाश पाराशर/ अमर उजाला ब्यूरो, पिपलिया मंडी (मंदसौर) Updated Tue, 15 Apr 2014 03:25 PM IST
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meenakshi natrajan has to fight modi on mandsaur seat

अफीम की खेती के लिए देशभर में मशहूर मंदसौर –नीमच राहुल गांधी की करीबी मीनाक्षी नटराजन का लोकसभा क्षेत्र है।

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मंदसौर से सुबह छह बजे निकली मीनाक्षी दोपहर दो बजे पिपलिया मंडी में पैदल ही अपने साथियों के साथ गुजर रही हैं।

दुकानदार तेजामल पामेचा कह रहे हैं, ‘अच्छी लड़की है, लेकिन इस बार लड़ाई कठिन है। भाजपा के उम्मीदवार को ज्यादा लोग नहीं जानते। मीनाक्षी का मुकाबला मोदी से है।’

पामेचा के परिवार से सात लोग जैन साधु बन चुके हैं और उनका कहना है कि वे खुद सत्य का पालन करते हैं। मंदसौर देश के उन संसदीय क्षेत्रों में से है, जहां जाति-पांति की राजनीति नहीं होती। अगर होती है तो विधानसभा चुनावों से ऊपर नहीं जाती।
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विकास शुक्ला अपने आपको जनता बताते हैं, क्योंकि वे किसी पार्टी के कार्यकर्ता नहीं हैं, लेकिन राजनीति के बारे में उनकी समझ बड़ी पक्की है। उनका कहना है, ‘मंदसौर की आठ विधानसभाओं में से कांग्रेस सात हार गई। उन सात विधानसभा सीटों की भाजपा की लीड मिलाकर कुल होती है 1.35 लाख। क्या मीनाक्षी इस लीड की भरपाई कर सकती हैं? अगर ऐसा हो जाए तो समझिए अजूबा हो गया।’
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मीनाक्षी देश के उन बिरले उम्मीदवारों में से हैं जिन्हें पार्टी ने प्राइमरी चुनावों के बाद उम्मीदवार बनाया है। विकास की राय है कि यह काम राहुल गांधी को मंदसौर से शुरू नहीं करना चाहिए था। ‘हर कोई जानता था कि वह राहुल गांधी की करीबी हैं। इसलिए सबने उन्हें ही वोट दिए।’

कांग्रेस कार्यालय के सामने खड़ी मीनाक्षी की बोलेरो सुबह छह-सात बजे मंदसौर से निकलती है और रात दस बजे वापस मंदसौर लौटती है। उनकी सादा जीवन शैली का हर कोई कायल है।

एक लोकल टीवी चैनल चलाने वाले शाहिद चौधरी कहते हैं, ‘वह पक्की गांधीवादी हैं। सादगी से रहती हैं। कोई फिजूलखर्ची नहीं। सुबह जल्दी उठना और निश्चित समय पर गांवों में निकल जाना उनका नियम है। भाजपा के पक्ष में माहौल होने के बाद भी मीनाक्षी का पलड़ा भारी लगता है।’ शाहिद की बात से कई कांग्रेसी भी इत्तफाक नहीं रखते।

नीमच के एक कांग्रेस नेता नाम नहीं बताने की शर्त पर कहते हैं, ‘मीनाक्षी ने दो बड़ी गलतियां की हैं। मनासा और जावद विधानसभा के टिकट उन्होंने अपनी पसंद से दिलाए। वे चुनाव हार गए। वहां से जो अच्छे नेता राजकुमार अहीर और नरेंद्र नाहटा थे, उन्हें टिकट नहीं दिए। अब उसका खामियाजा उन्हें भोगना पड़ेगा।’

भाजपा के उम्मीदवार सुधीर गुप्ता पार्टी के जिला अध्यक्ष थे। उनकी कमजोरी यह है कि वह बहुत लोकप्रिय चेहरा नहीं हैं। एक आरएसएस कार्यकर्ता बताते हैं, ‘सुधीर गुप्ता से बेहतर उम्मीदवार बंशीलाल गुर्जर और रघुनंदन शर्मा थे। अगर वे लोग होते तो मीनाक्षी को दिक्कत हो जाती। भाजपा यह चुनाव आसानी से जीतती।’

आरएसएस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘जब देश में मोदी लहर बह रही है, कमजोर उम्मीदवार के कारण यह लड़ाई कड़ी टक्कर में बदल गई। यह भी एक किस्म की हार ही है।’

फिर भाजपा ने सुधीर गुप्ता को टिकट क्यों दिया? आरएसएस नेता कहते हैं, ‘उनकी ऊपर कोई पकड़ होगी, नीचे तो कोई पकड़ नहीं है।’

उनका इशारा है कि यह सुंदरलाल पटवा और सुरेंद्र पटवा के हस्तक्षेप के कारण हुआ है। ‘हो सकता है भविष्य में सुरेंद्र
पटवा ही यहां से चुनाव लड़ते दिखाई दें।’

मीनाक्षी से पहले यह सीट लगातार भाजपा के पास रही। लक्ष्मीनारायण पांडे ने यह सीट आठ बार जीती है। मीनाक्षी ने इन्हीं लक्ष्मीनारायण पांडे को 2009 में शिकस्त दी। उधर पामेचा बड़ी साफगोई से कारण बताते हैं, ‘जनता आपको लगातार जिताकर संसद भेज रही है और वह देखती है कि हमारा सांसद दिल्ली जाकर नींद ले रहा है। भाजपा अगर 2009 में उम्मीदवार बदल देती तो मीनाक्षी नहीं जीत सकती थी।’

मंदसौर और नीमच क्षेत्र के किसानों में अफीम की खेती का मुद्दा भी बड़ा संवेदनशील रहता है। अफीम की खेती मुनाफे का धंधा है। किसान अफीम का रकबा बढ़ाने की मांग करते रहे हैं।


एक किसान बताते हैं कि मीनाक्षी नटराजन से भी उन्होंने लगातार मांग की थी और मीनाक्षी ने अब तक इस बारे में कुछ नहीं किया है। अफीम उत्पादक किसान उनके खिलाफ वोट कर सकते हैं।

मंदसौर और नीमच का 80 फीसदी किसान अफीम की खेती करता है। जो 20 फीसदी नहीं करता वह भी सरकारी अनुमति नहीं मिलने के कारण ही नहीं करता है।

पिपलिया मंडी में मीनाक्षी ने दो सभाएं कीं। एक नुक्कड़ नाटक किया। और वह अगले गांव की ओर बढ़ती हैं।
मुझे विकास शुक्ला की टिप्पणी याद आती है, ‘यह सब वह एक-डेढ़ साल पहले शुरू कर देती, तो आज जीत भी जाती। जनता अच्छे लोगों को पसंद करती है।’

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