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मध्य प्रदेश: 14 साल जेल में गुजारने के बाद हत्या के आरोपों से मेडिकल छात्र बरी, अब 42 लाख रुपये मुआवजा देने के आदेश
Thu, 05 May 2022 07:30 PM IST
रवींद्र भजनी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: रवींद्र भजनी
Updated Thu, 05 May 2022 07:30 PM IST
सार
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 14 साल पुराने मामले में एक मेडिकल छात्र को हत्या के आरोप से दोषमुक्त करार दिया है। साथ ही राज्य सरकार को मुआवजे के तौर पर उसे 42 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश भी दिया है।
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने हत्या के आरोप में उम्रकैद काट रहे मेडिकल छात्र को दोषमुक्त करार दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस और अभियोजन पक्ष ने आरोप साबित करने में जल्दबाजी की कार्यवाही की। मेडिकल छात्र पढ़ाई खत्म कर हर साल कम से कम 3 लाख रुपये कमाता। इस नाते उसे राज्य सरकार 42 लाख रुपये उसे चुकाएगी।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सुनीता यादव की बेंच ने कहा कि डॉक्टर बनने के बाद याचिकाकर्ता हर साल कम से कम 3 लाख रुपये कमाई करता। उसने अपने जीवन के 14 साल जेल में काटे हैं। सरकार उसे 42 लाख रुपये मुआवजे के तौर पर प्रदान करें। दरअसल, याचिकाकर्ता चंद्रेश मर्सकोले की तरफ से दायर की गई अपील में कहा गया था कि वह गांधी मेडिकल कॉलेज, भोपाल में एमबीबीएस अंतिम साल का छात्र था। एक लडकी की हत्या के आरोप में उसे कोर्ट ने जून 2009 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। अपील में कहा गया था कि चंद्रेश निर्दोष है। अस्पताल के रेजिडेंट डॉक्टर हेमंत वर्मा के इशारे पर पुलिस ने उसे फंसाया है। डॉक्टर हेमंत वर्मा के पुलिस से अच्छे संबंध थे।
हत्या का कोई चश्मदीद नहीं था
सुनवाई के दौरान बेंच ने पाया कि हत्या का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है। प्रकरण में डॉ. हेमंत वर्मा तथा उसका ड्राइवर मुख्य गवाह है। अभियोजन के अनुसार याचिकाकर्ता ने 19 सितम्बर 2008 को होशंगाबाद जाने के लिए रेजिडेंट डॉक्टर हेमंत वर्मा से उनकी टोयोटा क्वालिस गाडी मांगी थी। डॉ. वर्मा ने ड्राइवर राम प्रसाद को चंद्रेश के साथ जाने को कहा था। हॉस्टल से याचिकाकर्ता ने अपना बिस्तरबंद गाडी में रखा था। चंद्रेश ने ड्राइवर को पचमढ़ी चलने को कहा था। जब ड्राइवर ने पचमढ़ी की दर्शन मजार के पास गाड़ी रोकी, तब उसे कुछ गिरने की आवाज आई। गाड़ी की डिक्की खुली थी और बिस्तरबंद नहीं था। रात को जब दोनों भोपाल लौट आए तो ड्राइवर ने डॉ. वर्मा को घटना की जानकारी दी।
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डॉ. वर्मा ने लिखा था पुलिस अधिकारी को पत्र
डॉ. वर्मा ने ड्राइवर से सुनी बातों के आधार पर भोपाल आईजी को पत्र लिखा था। इसमें बताया था कि पिपरिया की रहने वाली एक लड़की का चंद्रेश के घर आना-जाना था। चंद्रेश ने उनकी कार का इस्तेमाल लाश को ठिकाने लगाने के लिए किया है। डॉ. वर्मा ने बयान में कहा है कि चंद्रेश को 20 सितंबर 2008 को पुलिस अपने साथ ले गई थी। वहीं, गिरफ्तारी 25 सितंबर 2008 को दिखाई गई। डॉ. वर्मा ने यह भी कहा कि 19 सितंबर को वे इंदौर गए थे। विवेचना अधिकारी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह क्यों इंदौर गए थे। जब उन्हें इंदौर जाना था तो अपनी गाड़ी चंद्रेश को क्यों दे दी? ड्राइवर ने यह कहा था कि बिस्तरबंद भारी था, जबकि उसने चढ़ाने-उतारने में कोई मदद नहीं की। तब उसे कैसे पता चला कि बिस्तरबंद भारी था? उसने यह भी कहा था कि पचमढ़ी टोल नाका में गाड़ी में चार व्यक्ति बैठे थे।
चंद्रेश को दोषी साबित करने की जल्दबाजी
बेंच ने कहा कि डॉ. हेमंत वर्मा और उनके ड्राइवर से जांच अधिकारी और अभियोजन ने सही तरीके से पूछताछ नहीं की। उन्होंने सिर्फ चंद्रेश को दोषी साबित करने के लिए कार्यवाही की। सच जानने का प्रयास नहीं किया। बेंच ने बुधवार को आदेश पारित किया और कहा कि याचिकाकर्ता ने 4,700 से अधिक दिन जेल में गुजारे हैं। सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का हवाला देते हुए चंद्रेश को मुआवजा देने के आदेश दिए। 90 दिन में याचिकाकर्ता को मुआवजा नहीं चुकाया तो 9 प्रतिशत प्रति वर्ष के हिसाब से ब्याज देना होगा।
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जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सुनीता यादव की बेंच ने कहा कि डॉक्टर बनने के बाद याचिकाकर्ता हर साल कम से कम 3 लाख रुपये कमाई करता। उसने अपने जीवन के 14 साल जेल में काटे हैं। सरकार उसे 42 लाख रुपये मुआवजे के तौर पर प्रदान करें। दरअसल, याचिकाकर्ता चंद्रेश मर्सकोले की तरफ से दायर की गई अपील में कहा गया था कि वह गांधी मेडिकल कॉलेज, भोपाल में एमबीबीएस अंतिम साल का छात्र था। एक लडकी की हत्या के आरोप में उसे कोर्ट ने जून 2009 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। अपील में कहा गया था कि चंद्रेश निर्दोष है। अस्पताल के रेजिडेंट डॉक्टर हेमंत वर्मा के इशारे पर पुलिस ने उसे फंसाया है। डॉक्टर हेमंत वर्मा के पुलिस से अच्छे संबंध थे।
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हत्या का कोई चश्मदीद नहीं था
सुनवाई के दौरान बेंच ने पाया कि हत्या का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है। प्रकरण में डॉ. हेमंत वर्मा तथा उसका ड्राइवर मुख्य गवाह है। अभियोजन के अनुसार याचिकाकर्ता ने 19 सितम्बर 2008 को होशंगाबाद जाने के लिए रेजिडेंट डॉक्टर हेमंत वर्मा से उनकी टोयोटा क्वालिस गाडी मांगी थी। डॉ. वर्मा ने ड्राइवर राम प्रसाद को चंद्रेश के साथ जाने को कहा था। हॉस्टल से याचिकाकर्ता ने अपना बिस्तरबंद गाडी में रखा था। चंद्रेश ने ड्राइवर को पचमढ़ी चलने को कहा था। जब ड्राइवर ने पचमढ़ी की दर्शन मजार के पास गाड़ी रोकी, तब उसे कुछ गिरने की आवाज आई। गाड़ी की डिक्की खुली थी और बिस्तरबंद नहीं था। रात को जब दोनों भोपाल लौट आए तो ड्राइवर ने डॉ. वर्मा को घटना की जानकारी दी।
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डॉ. वर्मा ने लिखा था पुलिस अधिकारी को पत्र
डॉ. वर्मा ने ड्राइवर से सुनी बातों के आधार पर भोपाल आईजी को पत्र लिखा था। इसमें बताया था कि पिपरिया की रहने वाली एक लड़की का चंद्रेश के घर आना-जाना था। चंद्रेश ने उनकी कार का इस्तेमाल लाश को ठिकाने लगाने के लिए किया है। डॉ. वर्मा ने बयान में कहा है कि चंद्रेश को 20 सितंबर 2008 को पुलिस अपने साथ ले गई थी। वहीं, गिरफ्तारी 25 सितंबर 2008 को दिखाई गई। डॉ. वर्मा ने यह भी कहा कि 19 सितंबर को वे इंदौर गए थे। विवेचना अधिकारी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह क्यों इंदौर गए थे। जब उन्हें इंदौर जाना था तो अपनी गाड़ी चंद्रेश को क्यों दे दी? ड्राइवर ने यह कहा था कि बिस्तरबंद भारी था, जबकि उसने चढ़ाने-उतारने में कोई मदद नहीं की। तब उसे कैसे पता चला कि बिस्तरबंद भारी था? उसने यह भी कहा था कि पचमढ़ी टोल नाका में गाड़ी में चार व्यक्ति बैठे थे।
चंद्रेश को दोषी साबित करने की जल्दबाजी
बेंच ने कहा कि डॉ. हेमंत वर्मा और उनके ड्राइवर से जांच अधिकारी और अभियोजन ने सही तरीके से पूछताछ नहीं की। उन्होंने सिर्फ चंद्रेश को दोषी साबित करने के लिए कार्यवाही की। सच जानने का प्रयास नहीं किया। बेंच ने बुधवार को आदेश पारित किया और कहा कि याचिकाकर्ता ने 4,700 से अधिक दिन जेल में गुजारे हैं। सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का हवाला देते हुए चंद्रेश को मुआवजा देने के आदेश दिए। 90 दिन में याचिकाकर्ता को मुआवजा नहीं चुकाया तो 9 प्रतिशत प्रति वर्ष के हिसाब से ब्याज देना होगा।
