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खबरों के खिलाड़ी: इंदौर के सिस्टम में लीकेज, जब नल से आने वाले पानी से ही भरोसा टूट गया; तो फिर बचा ही क्या?

Wed, 07 Jan 2026 06:00 AM IST
राहुल कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर। Published by: राहुल कुमार Updated Wed, 07 Jan 2026 06:00 AM IST
सार

Indore Water Contamination: इंदौर की पहचान देश के सबसे साफ शहर के रूप में थी। अंधाधुंध विकास के बीच लंबे समय से यहां पीने के पानी को लेकर शिकायतें आती रहीं, लेकिन नेता, अफसर इसे टालते रहे। चिट्ठियां और फाइलें इधर से उधर घूमती रहीं। कमोबेश हर बड़े शहर में ऐसी ही स्थितियां हैं, लेकिन इसकी वजह क्या है, यह जानते हैं...

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Khabaron Ke Khiladi over Indore Water Contamination issue
खबरों के खिलाड़ी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी- इंदौर। तमगा देश के सबसे साफ शहर का, लेकिन इस पर एक ऐसा दाग लग गया, जिसे भुला पाना मुश्किल होगा। शहर के भागीरथपुरा इलाके में पिछले दिनों दूषित पानी पीने से कई जानें चली गईं। अब तक 17 मौतें हुई हैं। एक तरफ राजनीति हावी है। दूसरी तरफ, उन परिवारों की वेदना है, जिन्होंने अपनों को खो दिया।
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इस झकझोर देने वाली घटना के पीछे असली वजह क्या है, जिम्मेदारों से कहां चूक हुई, क्या इस घटना से बचा जा सकता था और इंदौर जैसा समृद्ध इतिहास वाला शहर इससे क्या सबक ले सकता है? अमर उजाला ने 'खबरों के खिलाड़ी' के जरिए इन्हीं सवालों के जवाब जानने की कोशिश की। इस चर्चा में उन वरिष्ठ पत्रकारों ने बतौर विश्लेषक हिस्सा लिया, जो बरसों तक शहर की नब्ज को परखते रहे हैं और शहर की तासीर और तंत्र को बखूबी समझते हैं। जानिए, इंदौर की घटना पर वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश हिंदुस्तानी, सतीश जोशी, अरविंद तिवारी, मुकेश तिवारी, राजेश राठौर और राजेश ज्वेल की राय।
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इंदौर में कहां चूक हुई?
सतीश जोशी: पहले शहर का आकार छोटा था। आबादी कम थी। एक नियोजित विस्तार होता है। एक अनियोजित विस्तार होता है। जहां अनियोजित विस्तार हुआ, वहां पानी और ड्रेनेज की लाइनें पुरानी थीं। उन्हें बदलने की व्यवस्था में लापरवाही हुई। कैग की रिपोर्ट भी यही कह रही थी। इसके बावजूद लापरवाही हुई। जनप्रतिनिधि अपने दायित्वों से दूर होते जा रहे हैं। प्रशासन पर नेताओं की पकड़ नहीं है। भ्रष्टाचार चरम पर है।

क्या अधिकारियों के बीच समन्वय नहीं रहा?
अरविंद तिवारी: महापौर खुद स्वीकार कर चुके हैं कि अधिकारी उनकी सुनते नहीं हैं। पुष्यमित्र भार्गव को बेहद कम उम्र में इंदौर का महापौर बनने का मौका मिला। चार आयुक्त उनके कार्यकाल में बदल गए। हर अधिकारी से उनका तालमेल नहीं बैठा। आखिर महापौर, नगर निगम आयुक्तों और नगर निगम के अफसरों के बीच तालमेल क्यों नहीं बैठ पा रहा? यह तो जांच का विषय हो गया। आप नौकरशाही से ऐसा क्या चाहते थे, जो वो नहीं कर पा रही थी? या नौकरशाही ऐसा क्या चाहती थी, जिसे आप नहीं करने देना चाहते थे? जनप्रतिनिधियों को तो स्थानीय व्यवस्था में तालमेल बैठाकर चलना ही पड़ता है। भागीरथपुरा ने तो हमारी आंखें खोल दी हैं। अब तो ऐसा लग रहा है कि पूरे इंदौर में दूषित पानी सप्लाई हो रहा है।

आखिर इस घटना का जिम्मेदार कौन है?

राजेश राठौर: जनप्रतिनिधि और अफसर, दोनों ही इस घटना के जिम्मेदार हैं। भागीरथपुरा के पार्षद कमल वाघेला ने जनवरी 2025 में पत्र लिखा था कि पीने के पानी की लाइन में ड्रेनेज का पानी मिल चुका है, लेकिन नर्मदा प्रोजेक्ट के अधिकारी लाइन डालने को तैयार नहीं हुए। एक पार्षद ने एक साल में 17 पत्र अलग-अलग विभागों को लिखे। यही पत्र मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को भी भेजे गए। असल में कोई एक पक्ष दोषी है ही नहीं। असल में अब राजनीति बाजारवाद का स्वरूप ले चुकी है। मुख्यमंत्री ने अधिकारी तो हटा दिए, लेकिन यह भी कहा कि जनप्रतिनिधियों की भी जवाबदारी है।

व्यवस्था चरमराई कैसे?
राजेश ज्वेल: मालवी में कहावत है कि ऊपरी बेल बूटा अंदर से पेंदा फूटा। इंदौर जैसे बड़े शहरों की कमोबेश यही स्थिति है। यह सारा काम ऊपरी चकाचौंध वाला है। सिर्फ मार्केटिंग-पैकेजिंग का काम हो रहा है। शहर के बाजार साफ हो गए। स्मार्ट सिटी बन गई, लेकिन अंदरूनी इलाकों में गंदगी मिलेगी। दुर्भाग्य है कि 17 लोगों की जान चली गई। पिछले कुछ वर्षों में राजनीति में नया ट्रेंड आया है। भोजन, भंडारे, कलश यात्रा, धार्मिक यात्राएं, हिंदू-मुस्लिम जैसे मुद्दों पर नेताओं को वोट मिल रहे हैं। जनप्रतिनिधियों ने सोच लिया कि जब इन मुद्दों पर वोट मिल रहे हैं, तो जनता के काम करने से मतलब क्या है? जनप्रतिनिधि पांच साल में धन संपदा मजबूत करने में लगे रहते हैं। जितने भी सम्मान इंदौर को मिले हैं, उनमें सारे प्रतिनिधि साफे बांधकर और कलफ लगे कुर्ते पहनकर अवॉर्ड लेने दिल्ली जाते हैं। जब अधिकारी आपकी सुनते नहीं, तो अवॉर्ड किस बात का ले रहे हैं? सम्मान लेने में और रील बनाने में आप आगे रहते हो, लेकिन जब जिम्मेदारी की बात आती है, तो अधिकारी जिम्मेदार हैं? 144 दिन तक एक फाइल एमआईसी में पड़ी रही।

कैलाश विजयवर्गीय जैसे दिग्गज नेता के होने के बावजूद भी शिकायतें आ रही थीं?
मुकेश तिवारी: भागीरथपुरा में जो हुआ, वो बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है। उसके बाद जो राजनीति हो रही है, वो भी शर्मनाक है। यह सिर्फ पाइपलाइन का लीकेज नहीं है, वास्तव में यह पूरे सिस्टम का लीकेज है। हमारा तंत्र सड़-गल गया है। इंदौर की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि जो नदियां कभी स्वच्छ हुआ करती थीं, वो नालों में तब्दील हो गईं। एक बड़ा हिस्सा है, जिसके पास से यह नाला गुजरता है। बस्तियां उनके आसपास बस गईं और उनके विकास के लिए कोई कार्य योजना नहीं बनी। आज विश्वास टूटा है। अगर नल से आने वाले पानी से भरोसा टूटेगा, तो फिर बचा ही क्या है? जब सिस्टम फेल होता है तो टॉप टू बॉटम सब जिम्मेदार हो जाते हैं।

क्या जिम्मेदारों को पद से हटना चाहिए?
प्रकाश हिंदुस्तानी: ये जो इंदौर के पूरे शरीर में खून खराब हो रहा था, वो एक फोड़े के रूप में सामने आया है। जिन नेताओं को जूते की नोंक पर रखना था, उन्हें हम सिर पर बैठा रहे हैं। इंदौर शहर जो लगातार आठ बार स्वच्छता में नंबर वन रहा, उसकी पोल खुल गई है। जिम्मेदार व्यक्तियों को इस्तीफा देना चाहिए। लोग जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रहे हैं। यहां तो एक ट्रेन में तीन-तीन इंजन की सरकार एक ही दिशा में जा रही है। फिर भी सिर्फ अधिकारियों पर ढोल रहे हैं। इससे काम नहीं चलेगा।

कांग्रेस अब प्रदर्शन कर रही है। अभी तक कांग्रेस कहां थी?
अरविंद तिवारी: इस शहर के असली जनप्रतिनिधि अब यहां के ब्यूरोक्रेट हो गए हैं। कांग्रेस तो परिदृश्य से एक सप्ताह तक गायब ही रही। कांग्रेस को जनता की कोई चिंता नहीं थी। जब कांग्रेस को लगा कि यह भाजपा नेताओं और सरकार को घेरने का अच्छा मौका है, तब कांग्रेस सक्रिय हुई। भागीरथपुरा श्रमिक एरिया है, वहां कांग्रेस का पुराना नेटवर्क है, फिर भी शुरुआती दौर में नेता कहां थे? उन्हें इस बात की भनक ही नहीं लग पाई? पिछले 10 साल से हम देख रहे हैं कि असली नेता ब्यूरोक्रेट हैं। चुने हुए जनप्रतिनिधियों को लगता है कि यदि कलेक्टर या कमिश्नर नाराज हो जाएगा, तो हम राजनीति नहीं कर पाएंगे। इंदौर के लिए यह घातक संकेत है। जिस शहर को सुरेश सेठ और महेश जोशी जैसे नेता मिले, वहां नेता इतने पंगू क्यों हो गए? कैलाश विजयवर्गीय भी अपने शुरुआती दौर में इसी भूमिका में थे। फिर बाद में क्या हुआ?

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इंदौर के भविष्य पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
राजेश राठौर: जबरदस्त गहरा असर पड़ना शुरू हो चुका है। एनआरआई चिंतित हैं कि इस शहर को आठ बार पुरस्कार कैसे मिला? अब तो लोग सवालिया निशान लगा रहे हैं कि कहीं फर्जी तो नहीं था, मैनेज कैसे करते थे? दिक्कत यह है कि इंदौर की जनता सो गई है क्योंकि जनप्रतिनिधियों से सवाल करने की हिम्मत खत्म हो चुकी है। उन्हें मुफ्त भंडारे मिल रहे हैं। जब वोट बिकाऊ हो जाएगा, तो जनता के काम से ध्यान हटना तय है। इंदौर में 30 साल से सांसद-विधायक भाजपा के बन रहे हैं। जब क्रिकेट मैच होता है, इंदौर के लोग तो राजवाड़ा में भीड़ लगा लेते हैं, लेकिन भागीरथपुरा के लिए जनता घर से नहीं निकल सकती?

कैलाश विजयवर्गीय के विवादास्पद बयान को आप कैसे देखते हैं?
राजेश ज्वेल: हमारे नेता बयान बहादुर तो हैं। कैलाश जी इस प्रकार के बयान देने के आदी हैं। मुख्यमंत्री इंदौर आए थे। मरीजों से मिले। रात को बैठक की, लेकिन किसी अधिकारी पर कारवाई नहीं की। जब कैलाश जी के बयान के बाद देशभर में हल्ला मचा और राहुल गांधी, अखिलेश यादव के ट्वीट आए, तब दिल्ली से प्रेशर बढ़ा और रात को मजबूरी में कमिश्नर और अन्य को हटाना पड़ा। गंदे पानी की शिकायत आज की नहीं है, मेरे पास 22-23 साल पुराना लेटर है जब कैलाश विजयवर्गीय के कार्यकाल में 900 से ज्यादा बोरिंग सैंपल खराब मिले थे।


भंडारे जैसे आयोजन और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर प्रदर्शन क्या इन समस्याओं से ध्यान भटकाते हैं?
सतीश जोशी: राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सवालों पर जुड़ना अच्छी बात है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि आप गंदा पानी पिलाएंगे तो चलेगा। इंदौर की नागरिक सुविधाओं के लिए जिन्हें काम करना है, उसमें कहां पर खामी आ रही है? जब तक सही अर्थ में शहर के बारे में सोचने वाले लोग आगे नहीं आएंगे, तब तक आप नेताओं से कुछ नहीं उम्मीद कर सकते।
प्रकाश हिंदुस्तानी: जब लोग बावड़ी में गिरकर मर गए थे, तब भी क्या हुआ? अब बस नेता प्रदर्शित कर रहे हैं कि वह जनता के लिए कुछ कर रहे हैं या कुछ करना चाहते हैं।


 
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