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MP High Court: पति के आत्महत्या मामले में पत्नी को राहत, हाईकोर्ट ने दिए एफआईआर खारिज करने के आदेश
Tue, 26 Mar 2024 10:04 PM IST
अरविंद कुमार
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: अरविंद कुमार
Updated Tue, 26 Mar 2024 10:04 PM IST
सार
पति के आत्महत्या मामले में पत्नी को राहत मिल गई है। जबलपुर हाईकोर्ट ने एफआईआर खारिज करने के आदेश दिए हैं।
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मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
पति के आत्महत्या करने के मामले में पत्नी को हाईकोर्ट से राहत मिली है। जस्टिस जीएस अहलूवालिया ने पत्नी के खिलाफ दर्ज आत्महत्या के लिए उकसाने के आपराधिक प्रकरण को खारिज करने के आदेश जारी किये हैं। एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा गया है कि सरकारी अधिवक्ता तथा शिकायतकर्ता के अधिवक्ता यह साबित नहीं कर पाये हैं कि मामले में याचिकाकर्ता के खिलाफ धारा- 306 का अपराध कैसे बनता है।
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याचिकाकर्ता निशा साकेत की तरफ से दायर की गयी आपराधिक पुनर्विचार याचिका में कहा गया था कि उसकी शादी साल अप्रैल 2016 में प्रीतम साकेत से हुई थी। उसके पति को पिता की मौत होने के कारण पाॅली प्रोजेक्ट में अनुकंपा नियुक्ति मिली थी। उसके पति ने जुलाई 2021 में आत्महत्या कर ली थी। पुलिस ने अनावेदक सास की शिकायत पर धारा-306 के तहत उसके खिलाफ प्रकरण दर्ज किया था, जिसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गयी थी। हाईकोर्ट ने याचिका की सुनवाई के दौरान पाया कि उसके खिलाफ जिला न्यायालय में आरोप तय हो गये हैं। हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायालय के समक्ष पक्ष प्रस्तुत करने के आदेश जारी किये थे, जिसके कारण उक्त पुनर्विचार याचिका दायर की गयी है।
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एकलपीठ ने याचिका की सुनवाई के दौरान पाया कि याचिकाकर्ता पर आरोप है कि वह समय पर खाना नहीं बनाती थी, जिसके कारण उसके पति को भूखे ड्यूटी पर जाना पड़ता था। पति के जाने के बाद वह बच्चों को पड़ोसियों के पास छोड़कर बाजार चली जाती थी। क्राइम पेट्रोल सीरियल देखती थी और विरोध करने पर पति से लड़ती थी। अपने बड़े भाई की शादी में याचिकाकर्ता नाच रही थी। पति ने विरोध किया तो वह लड़ने लगी, जिसके बाद पति अपने बच्चों के साथ पाली लौट आया था और फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
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एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि ऐसे विवाद आमतौर पर हर घर में होते हैं। धारा-306 के अपराध में आत्महत्या के लिए उकसाने के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कृत्यों का सबूत होना चाहिए। शिकायतर्का तथा सरकारी अधिवक्ता मामले में यह साबित नहीं कर पाये, जिसे आत्महत्या के उकसाने का अनुमान लगाया जा सकता है। एकलपीठ ने जिला न्यायालय द्वारा तय किये गये आरोप तथा एफआईआर को निरस्त करने के आदेश जारी किये हैं।
