Jabalpur News: बंधुआ मजदूर जैसे करवा रहे डॉक्टरों से कार्य, हाईकोर्ट ने कहा लौटाएं शैक्षणिक दस्तावेज
हाईकोर्ट ने रूरल बॉन्ड के तहत शैक्षणिक दस्तावेज जब्त करने पर मेडिकल छात्रों को अंतरिम राहत दी है। छात्रों की याचिका में भारी जुर्माने और अव्यवस्थित ग्रामीण सेवाओं का हवाला दिया गया। कोर्ट ने दस्तावेज लौटाने के आदेश दिए, जबकि अंतिम निर्णय याचिका पर विचार के बाद होगा।
विस्तार
रूरल बॉन्ड के नाम पर डॉक्टरों से उनके शैक्षणिक दस्तावेज जमा करवाकर जबरन ग्रामीण क्षेत्रों में बंधुआ मजदूरों की तरह कार्य करवाने को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि बॉन्ड की शर्तों के चलते छात्रों पर भारी जुर्माना लगाया जा रहा है, जिससे कई छात्र मानसिक दबाव में आत्महत्या तक कर रहे हैं।
मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैत और न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगलपीठ ने इस मामले में सुनवाई करते हुए संबंधित मेडिकल कॉलेजों को छात्रों के शैक्षणिक दस्तावेज तत्काल लौटाने के आदेश दिए हैं। हालांकि, याचिका पर अंतिम निर्णय बाद में सुनाया जाएगा।
ये भी पढ़ें- फिल्म अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनौत को एमपी-एमएलए कोर्ट से राहत, जानें क्या था मामला
डॉ. वैभव दुआ, डॉ. पुष्पेन्द्र सिंह और डॉ. पुलकित शर्मा द्वारा दायर याचिका में बताया गया कि उन्होंने एमबीबीएस के बाद एक वर्ष ग्रामीण क्षेत्र में सेवा दी थी और फिर वर्ष 2022 में चिरायु मेडिकल कॉलेज से पीजी में दाखिला लिया। दाखिले के समय उनसे एक बॉन्ड भरवाया गया, जिसमें पांच साल तक ग्रामीण क्षेत्र में सेवा देना अनिवार्य किया गया। शर्तों का उल्लंघन करने पर ₹50 लाख का जुर्माना निर्धारित किया गया था और जुर्माना न भरने की स्थिति में शैक्षणिक दस्तावेज रोक लिए जाते हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संघी ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी करते हुए बताया कि इस मुद्दे को लोकसभा में भी उठाया गया था। इसके बाद नेशनल मेडिकल कमीशन ने बॉन्ड व्यवस्था को अव्यवहारिक और अनुचित करार देते हुए राज्य सरकार को पत्र भेजा था। कमीशन द्वारा गठित नेशनल टास्क फोर्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि बॉन्ड की भारी भरकम राशि के कारण कई मेडिकल छात्र डिप्रेशन में आकर आत्महत्या कर रहे हैं।
ये भी पढ़ें- लोकतंत्र सेनानी की पत्नी के उपचार व्यय के भुगतान पर विचार करें, कोर्ट का जबलपुर कलेक्टर को निर्देश
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि एमबीबीएस, पीजी और ग्रामीण सेवा के दौरान डॉक्टरों की उम्र 35 से अधिक हो जाती है, और यदि वे सुपर स्पेशलाइजेशन करना चाहें तो उम्र 40 के पार हो जाती है। ऐसे में करियर के लिए समय सीमित रह जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं की कमी और अव्यवस्था के कारण डॉक्टर वहां काम नहीं करना चाहते। मवेशियों की मौजूदगी और संक्रमण के खतरे से मरीजों की मौत होने पर डॉक्टरों को दोषी ठहराया जाता है।
युगलपीठ ने मामले की गंभीरता को समझते हुए दस्तावेज लौटाने के आदेश तो दिए हैं, लेकिन अंतिम निर्णय याचिका पर विचार के बाद ही दिया जाएगा।
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.
