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Indore News: बिना सीमेंट के बना दुनिया का सबसे ताकतवर कांक्रीट, IIT का चौंकाने वाला आविष्कार
Wed, 16 Jul 2025 08:01 PM IST
अर्जुन रिछारिया
अमर उजाला, डिजिटल डेस्क, इंदौर
अमर उजाला, डिजिटल डेस्क, इंदौर
Published by: अर्जुन रिछारिया
Updated Wed, 16 Jul 2025 08:01 PM IST
सार
Indore News: आईआईटी इंदौर ने जियोपॉलिमर तकनीक से ऐसा कांक्रीट तैयार किया है जिसमें पारंपरिक सीमेंट का उपयोग नहीं हुआ है। इसकी मदद से भारत में हरित निर्माण की दिशा में बड़ी क्रांति संभव है।
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डॉ. अभिषेक राजपूत
- फोटो : अमर उजाला, डिजिटल डेस्क, इंदौर
विस्तार
आईआईटी इंदौर के वैज्ञानिकों ने पारंपरिक सीमेंट का पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को देखते हुए एक नया और प्रभावी आविष्कार किया है। संस्थान के सिविल इंजीनियरिंग विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अभिषेक राजपूत और उनकी शोध टीम ने ऐसा कांक्रीट विकसित किया है जिसमें एक भी ग्राम सीमेंट का उपयोग नहीं किया गया, फिर भी इसकी मजबूती किसी भी पारंपरिक कांक्रीट से कम नहीं है।
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जियोपॉलिमर तकनीक से तैयार हुआ सीमेंट मुक्त कांक्रीट
इस कांक्रीट को 'जियोपॉलिमर तकनीक' से तैयार किया गया है। इस तकनीक में सीमेंट के स्थान पर फ्लाई ऐश और ग्राउंड ग्रेन्युलेटेड ब्लास्ट फर्नेस स्लैग (GGBS) जैसे औद्योगिक अपशिष्टों का प्रयोग किया गया है। इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले सीमेंट की जरूरत खत्म होती है, बल्कि औद्योगिक कचरे का भी सही उपयोग होता है।
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मजबूती और टिकाऊपन में भी अव्वल
आईआईटी इंदौर का दावा है कि यह नया कांक्रीट पारंपरिक कांक्रीट की तुलना में कहीं ज्यादा मजबूत और टिकाऊ है। खास बात यह है कि इसे तैयार करने में पानी की आवश्यकता भी काफी कम होती है, जिससे जल संरक्षण में भी मदद मिलती है। इसका उपयोग मकानों से लेकर बहुमंजिला इमारतों तक, हर निर्माण कार्य में किया जा सकता है।
कार्बन उत्सर्जन में मिलेगी बड़ी राहत
रिपोर्ट्स के अनुसार, सीमेंट इंडस्ट्री दुनिया के कुल कार्बन डाईऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जन में करीब 8% का योगदान देती है। हर वर्ष लगभग 2.5 अरब टन CO₂ केवल सीमेंट उत्पादन से वातावरण में छोड़ी जाती है। आईआईटी इंदौर की इस खोज से निर्माण क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन में भारी कटौती संभव हो सकेगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह तकनीक भविष्य में ‘ग्रीन कंस्ट्रक्शन’ यानी पर्यावरण अनुकूल निर्माण की दिशा में एक बड़ी क्रांति ला सकती है।
एसजीएसआईटीएस की छात्रा की अनोखी पहल
इस दिशा में इंदौर की एसजीएसआईटीएस कॉलेज की छात्रा सोनल रामटेककर ने भी एक अनोखा प्रयोग किया था। वर्ष 2023 में सोनल ने प्लास्टिक कचरे का उपयोग कर विशेष प्रकार का कांक्रीट विकसित किया, जो सामान्य कांक्रीट की तुलना में दो गुना हल्का और तीन गुना अधिक मजबूत था। डेढ़ साल की रिसर्च के बाद तैयार इस फॉर्मूले को अमेरिकी संस्था American Society of Civil Engineers के जर्नल में भी प्रकाशित किया गया था। सोनल द्वारा किए गए बीम टेस्ट में यह कांक्रीट 50 टन तक का भार आसानी से झेलने में सक्षम रहा।
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इस कांक्रीट को 'जियोपॉलिमर तकनीक' से तैयार किया गया है। इस तकनीक में सीमेंट के स्थान पर फ्लाई ऐश और ग्राउंड ग्रेन्युलेटेड ब्लास्ट फर्नेस स्लैग (GGBS) जैसे औद्योगिक अपशिष्टों का प्रयोग किया गया है। इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले सीमेंट की जरूरत खत्म होती है, बल्कि औद्योगिक कचरे का भी सही उपयोग होता है।
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मजबूती और टिकाऊपन में भी अव्वल
आईआईटी इंदौर का दावा है कि यह नया कांक्रीट पारंपरिक कांक्रीट की तुलना में कहीं ज्यादा मजबूत और टिकाऊ है। खास बात यह है कि इसे तैयार करने में पानी की आवश्यकता भी काफी कम होती है, जिससे जल संरक्षण में भी मदद मिलती है। इसका उपयोग मकानों से लेकर बहुमंजिला इमारतों तक, हर निर्माण कार्य में किया जा सकता है।
कार्बन उत्सर्जन में मिलेगी बड़ी राहत
रिपोर्ट्स के अनुसार, सीमेंट इंडस्ट्री दुनिया के कुल कार्बन डाईऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जन में करीब 8% का योगदान देती है। हर वर्ष लगभग 2.5 अरब टन CO₂ केवल सीमेंट उत्पादन से वातावरण में छोड़ी जाती है। आईआईटी इंदौर की इस खोज से निर्माण क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन में भारी कटौती संभव हो सकेगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह तकनीक भविष्य में ‘ग्रीन कंस्ट्रक्शन’ यानी पर्यावरण अनुकूल निर्माण की दिशा में एक बड़ी क्रांति ला सकती है।
एसजीएसआईटीएस की छात्रा की अनोखी पहल
इस दिशा में इंदौर की एसजीएसआईटीएस कॉलेज की छात्रा सोनल रामटेककर ने भी एक अनोखा प्रयोग किया था। वर्ष 2023 में सोनल ने प्लास्टिक कचरे का उपयोग कर विशेष प्रकार का कांक्रीट विकसित किया, जो सामान्य कांक्रीट की तुलना में दो गुना हल्का और तीन गुना अधिक मजबूत था। डेढ़ साल की रिसर्च के बाद तैयार इस फॉर्मूले को अमेरिकी संस्था American Society of Civil Engineers के जर्नल में भी प्रकाशित किया गया था। सोनल द्वारा किए गए बीम टेस्ट में यह कांक्रीट 50 टन तक का भार आसानी से झेलने में सक्षम रहा।
