चार साल से परिवार से दूर है प्रो.चेतन सोलंकी, कपड़ों पर नहीं करते प्रेस,पहनते है फटे मोजे,जानिए आखिर क्यों
सोलंकी ने इस बारे में कहा कि मैने 11 साल तक यात्रा के दौरान घर नहीं जाने का संकल्प लिया है। मेरी पत्नी और दो बेटियां कभी-कभी मुझसे मिलने आ जाती है। फोन पर अक्सर चर्चा होती है।
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सोलर मैन के नाम से देश में मशहूर हो चुके आईआईटी मुंबई के प्रोफेसर चेतन सिंह सोलंकी ने संकल्प लिया है कि वे 11 सालों तक अपने घर और परिवार से दूर रहकर देशभर में सोलर ऊर्जा के प्रति लोगों को साक्षर करेंगे और कार्बन उत्सर्जन कम करने के लोगों को प्रेरित करेंगे। परिवार से वे चार साल से दूर है। वे इंदौर से 80 किलोमीटर दूर खरगोन के निवासी है।
इन दिनों वे इंदौर में डेरा डाले हुए है। वे 100 दिन तक एनर्जी स्वराज यात्रा निकाल रहे है। उनके इस अभियान को नगर निगम की भी मदद मिली है। चेतन खुद प्रेस किए हुए कपड़े नहीं पहनते। मोजे यदि जरा से फट जाए तो उसे ही पहनते है।
चेतन सिंह सोलंकी ने अमर उजाला से चर्चा में कहा कि हमारा उद्देश्य है कि इंदौर में सोलर साक्षर लोगों की बड़ी फौज तैयार कर कार्बन उत्सर्जन कम करे। इंदौर दिखने वाले कचरे की सफाई में तो नंबर वन है, लेकिन न दिखने वाले कचरे से हम अंजान है।
ग्रीन हाउस गैसेस, कार्बन डाई आक्साईड दिखती नहीं है, लेकिन पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती है। इंदौर में एक परिवार सालभर में डेढ़ सौ से 180 किलो कचरा निकालता है, लेकिन देश का औसत देखे तो सालभर में एक परिवार दस हजार किलो ग्रीन हाउस गैसेस उत्सर्जित करता है, जो दिखने वाले कचरे से ज्यादा खतरनाक है। उससे ग्लोबल वार्मिंग हो रही है। मौसम चक्र अनियमित हो रहे है। हमारी कोशिश है कि इंदौर में बिजली का दस से पंद्रह प्रतिशत तक बिजली का उपयोग हो।
लोग पर्यावरण के प्रति जागरुक रहे। जब उसने पूछा गया कि आप अपने यात्रा के कारण परिवार से दूर रहते है। कितना कठिन होता है परिवार से दूर रहना? सोलंकी ने इस बारे में कहा कि मैने 11 साल तक यात्रा के दौरान घर नहीं जाने का संकल्प लिया है। मेरी पत्नी और दो बेटियां कभी-कभी मुझसे मिलने आ जाती है। फोन पर अक्सर चर्चा होती है।
ग्लोबल वार्मिंग बड़ा गंभीर मुद्दा है। भारत में जब बड़ा यज्ञ करना होता है तो बड़ी आहूति देना पड़ती है, इसलिए मैने 11 साल तक घर नहीं जाने का संकल्प लिया हैै। परिवार के स्पोर्ट के बिना मैं यह नहीं कर सकता था। मेरी पत्नी को माता और पिता दोनों की भूमिका अदा करना पड़ती है। मुझसे ज्यादा बड़ा त्याग उनका है।
आप बगैर प्रेस किए हुए कपड़े पहनते है। फटे मौजे में नज आते है। इससे क्या संदेश देना चाहते है। इस सवाल पर वे कहते है कि मैसेज यही है कि हमारा विज्ञान, तकनीक में आगे बढ़ सकता है, लेकिन धरती का आकार नहीं बढ़ सकता है। धरती पर पानी, हवा मिट्टी को बढ़ाया नहीं जा सकता। मेरे घर में फ्रीज,गिजर नहीं है। प्रकृति को हम दे नहीं सकते, तो अपनी आवश्यकताएं समिति रखना चाहिए।
