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Indore: अब शुरू होगा दिवाली मिलन और अन्नकूटों का आयोजन, हंसदास मठ के प्राचीन विशाल कड़ाहे में बनेगी रामभाजी

Tue, 21 Oct 2025 06:11 PM IST
कमलेश सेन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर Published by: कमलेश सेन Updated Tue, 21 Oct 2025 06:11 PM IST
सार

Indore News: दीपावली के बाद इंदौर में अन्नकूट और दिवाली मिलन कार्यक्रमों की शुरुआत हो गई है। हंसदास मठ का 100 साल पुराना कड़ाहा इस उत्सव का केंद्र है, जहां हजारों भक्तों के लिए ‘रामभाजी’ बनती है, जो धार्मिक परंपरा और इतिहास से जुड़ी है।
 

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Indore: Diwali gatherings Annakut celebrations to begin, Rambhaji to be prepared in ancient huge cauldron
इंदौर में अन्नकूट और दिवाली मिलन कार्यक्रमों की हुई शुरुआत - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दीपावली के बाद अब इंदौर में दिवाली मिलन और अन्नकूटों के आयोजन बड़े पैमाने पर शुरू होंगे। बड़ा गणपति क्षेत्र में पीलियाखाल स्थित प्राचीन हंसदास मठ पर भी अन्नकूट महोत्सव का बड़ा आयोजन होता है। इस अन्नकूट महोत्सव में बनने वाले भोग प्रसाद का एक अलग ही महत्व है। अन्नकूट उत्सव में बनाई जाने वाली सब्जी जिसे राम भाजी कहते हैं, उसका विशेष महत्व होता है। हंसदास मठ में रामभाजी बनाने के लिए लोहे का 100 साल से ज्यादा पुराना विशाल कड़ाहा है।

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दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव में मंदिरों में विविध व्यंजनों का भोग लगाए जाने की प्राचीन परंपरा रही है। अन्नकूट की परंपरा मुख्यतः कृष्ण मंदिरों में होती है, समय के साथ बदलाव आया और अब अधिकतर मंदिरों में अन्नकूट होने लगे हैं। अन्नकूट उत्सव के दिन छप्पन भोग का भी आयोजन होता है। इसमें कई प्रकार की मिठाई, नमकीन और मिक्स सब्जियां बना कर भोग लगाया जाता है। अन्नकूट का यह सिलसिला कई दिनों तक चलता है।
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इंदौर का सबसे बड़ा कड़ाहा
हंसदास मठ के उत्तराधिकारी महामंडलेश्वर पंडित पवनदास महाराज का कहना है कि मंदिर के जिस कड़ाहा में रामभाजी बनती है, वह इंदौर का सबसे बड़ा कड़ाहा है। इसमें एक बार में इतनी सब्जी बनती है कि करीब 20 हजार व्यक्ति भोजन कर लें। यह कड़ाहा करीब 100 वर्ष पुराना है। पवनदास महाराज बताते हैं कि मंदिर में बड़े-बड़े प्राचीन बर्तन थे, जिनसे छह से सात क्विंटल तक भोजन पकाया जा सकता था। संभवत: इनमें दाल, चावल और खीर निर्मित की जाती थी। इससे जाहिर होता है कि मंदिरों में हजारों लोगों के भोजन प्रसाद के निर्माण की प्राचीन परंपरा रही है।
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महंत पवन दास महाराज का यह भी कहना है कि इंदौर नगर में कहीं भी बड़ा भोजन भंडारा या अन्नकूट होता है तो मठ का कड़ाहा ले जाते हैं। इतने बड़े बर्तन में निर्मित होने वाली सब्जी का स्वाद एक जैसा रहता है, सब्जी को लकड़ी के घोटे से घोटने के लिए स्टैंड का सहारा लेना होता है और कई व्यक्ति मिलकर इस कार्य को करते हैं।
 
1780 में हुई बाबा हंसदास ने की मठ की स्थापना
इंदौर नगर का विकास कान्ह और सरस्वती नदी के किनारे पर हुआ, इसलिए जूनी इंदौर क्षेत्र में मंदिरों की अधिकता है। इतिहासकार मानते हैं कि इन्हीं नदियों के किनारे साधु-संतों के आश्रम भी रहे हैं। पंचकुईया क्षेत्र में कई आश्रम भी प्राचीन हैं, जिसमें हंसदास मठ प्रमुख हैं। हंसदास मठ की स्थापना 1780 में देवी अहिल्या बाई के शासन काल में हुई, बाबा हंसदास 1780 से 1850 तक मठ के 70 वर्ष मठाधीश रहे। ऐसा माना जाता है कि बाबा हंसदास अपनी जमात लेकर भ्रमण करने वाले संत थे, उनकी जमात ने पीलियाखाल में डेरा डाला, नगर में उनकी प्रसिद्धि फैल गई। तब उस वक्त के तत्कालीन होल्कर राजा ने यह भूमि मठ के नाम कर और बाबा हंसदास को कुछ धन राशि भी दी, जिससे उन्होंने मठ स्थापित किया था। मठ की प्राचीनता इस बात से भी प्रतीत होती है कि विश्व के प्रसिद्ध नगर नियोजक सर पैट्रिक गिडीज द्वारा 1918 में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में हंसदास जी पूल, बगीचा और टैंक (पानी संग्रह का स्थान) का उल्लेख किया है। इसी तरह 1920 के करीब प्रकाशित इंदौर नगर की जानकारी की पुस्तिका में हंसदास मठ का उल्लेख है।

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पंचकुइया क्षेत्र में कई मंदिर और मठ
पंचकुईया नगर का प्राचीन क्षेत्र है, यहां कई मंदिर और संतों के आश्रम हैं। इसमें दास बगीची, गंगा बगीची और हंसदास मठ प्रमुख है। इस क्षेत्र में पंचकुईया (छोटे कुएं) होने से इसका नाम पंचकुईया पड़ा। पहले यह क्षेत्र वीरान और खाली था। उज्जैन में लगने वाले सिंहस्थ के पूर्व साधु-संत कई दिन इसी क्षेत्र में रहते थे और साधना करते थे।
 
होलकर खजाने से दी थी राशि
इंदौर के पहले नगर नियोजक पैट्रिक गिडीज ने हंसदास मठ के पास स्थित टैंक पर फुट ब्रिज निर्माण के लिए 2000 रुपये, पुल के सुधार कार्य के लिए 2000 और मठ के पास सड़क और मिस्त्री खाना निर्माण के किए 7000 रुपये के बजट का प्रावधान 1918 में अपनी रिपोर्ट में किया था।

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