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व्याख्यानमाला: डॉ. कोठेकर बोलीं- देवी अहिल्या ने कभी घाटे की अर्थव्यवस्था नहीं चलाई, उनकी अर्थ नीति सीखने लायक
Thu, 05 Sep 2024 07:53 PM IST
दिनेश शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर
Published by: दिनेश शर्मा
Updated Thu, 05 Sep 2024 07:53 PM IST
सार
डॉ. मनीषा कोठेकर ने कहा कि देवी अहिल्या बाई का कालखंड देखें तो उन्होंने कुशलता, कौशल, पराक्रम के गुणों का विकास किया। कोठेकर ने कहा कि देवी अहिल्या ने महिला होने का कभी फायदा नहीं उठाया।
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अभ्यास मंडल की व्याख्यानमाला को संबोधित करतीं डॉ. मनीषा कोठेकर
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
इंदौर में अभ्यास मंडल की वार्षिक व्याख्यानमाला का समापन गुरुवार को हुआ। नागपुर से आई वरिष्ठ समाजसेवी डॉ. मनीषा कोठेकर ने 'भारतीय स्त्री का प्रतिमान देवी अहिल्या बाई' विषय पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि भारत के इतिहास में कोई भी सदी ऐसी नहीं है जिसमें महिला के पराक्रम, कुशल नेतृत्व की गाथा न हो।
डॉ. मनीषा कोठेकर ने कहा कि देवी अहिल्या बाई का कालखंड देखें तो उन्होंने कुशलता, कौशल, पराक्रम के गुणों का विकास किया। कोठेकर ने कहा कि देवी अहिल्या ने महिला होने का कभी फायदा नहीं उठाया। प्रजाहित, देश हित और धर्म का पालन उन्होंने किया। वे खुद के परिवार के प्रति कठोर रही, लेकिन प्रजा के लिए दयालु शासक थी। उनके राज में हैप्पीनेस इंडेक्स सबसे अच्छा था। अहिल्या की अर्थव्यस्था कभी घाटे की नहीं रही। उनकी अर्थनीति सीखने लायक है। उनके शासन में हमेशा कोष में वृद्धि हुई। कर प्रणाली की वे ज्ञाता थीं। न्यायिक व्यवस्था में भी वे निपूर्ण थीं।
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डॉ. मनीषा कोठेकर ने कहा कि देवी अहिल्या बाई का कालखंड देखें तो उन्होंने कुशलता, कौशल, पराक्रम के गुणों का विकास किया। कोठेकर ने कहा कि देवी अहिल्या ने महिला होने का कभी फायदा नहीं उठाया। प्रजाहित, देश हित और धर्म का पालन उन्होंने किया। वे खुद के परिवार के प्रति कठोर रही, लेकिन प्रजा के लिए दयालु शासक थी। उनके राज में हैप्पीनेस इंडेक्स सबसे अच्छा था। अहिल्या की अर्थव्यस्था कभी घाटे की नहीं रही। उनकी अर्थनीति सीखने लायक है। उनके शासन में हमेशा कोष में वृद्धि हुई। कर प्रणाली की वे ज्ञाता थीं। न्यायिक व्यवस्था में भी वे निपूर्ण थीं।
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अभ्यास मंडल की व्याख्यानमाला में उपस्थित श्रोता
- फोटो : अमर उजाला
ससुर मल्हार राव थे अहिल्याबाई के असली गुरु
अहिल्याबाई के सबसे बड़े गुरु उनके ससुर मल्हार राव थे। अहिल्या को उन्होंने युद्ध कौशल, राजनीति, पत्र व्यवहार, प्रबंधन सिखाया। सास गौतमा बाई ने भी उन्हें सत्रह विभागों के बारे में पारंगत किया। मल्हारराव ने पेशवा से अपनी परिवार की महिलाओं के लिए कुछ गांव की जागीर दिलवाई और खासगी कोष भी बनाया। अहिल्या बाई ने उस कोष से ही धर्म के काम किए। धर्मशालाएं, घाट बनवाए।
डॉ. कोठेकर ने कहा कि अहिल्या बाई ने कभी पेशवा के दरबार में जाकर जी-हुजूरी नहीं की, वे पेशवा का सम्मान करती थीं लेकिन पेशवा के गलत निर्णय पर वे आपत्ति भी जाहिर करती थीं। कार्यक्रम का संचालन माला ठाकुर ने किया। आभार रामेश्वर गुप्ता ने माना।
अहिल्याबाई के सबसे बड़े गुरु उनके ससुर मल्हार राव थे। अहिल्या को उन्होंने युद्ध कौशल, राजनीति, पत्र व्यवहार, प्रबंधन सिखाया। सास गौतमा बाई ने भी उन्हें सत्रह विभागों के बारे में पारंगत किया। मल्हारराव ने पेशवा से अपनी परिवार की महिलाओं के लिए कुछ गांव की जागीर दिलवाई और खासगी कोष भी बनाया। अहिल्या बाई ने उस कोष से ही धर्म के काम किए। धर्मशालाएं, घाट बनवाए।
डॉ. कोठेकर ने कहा कि अहिल्या बाई ने कभी पेशवा के दरबार में जाकर जी-हुजूरी नहीं की, वे पेशवा का सम्मान करती थीं लेकिन पेशवा के गलत निर्णय पर वे आपत्ति भी जाहिर करती थीं। कार्यक्रम का संचालन माला ठाकुर ने किया। आभार रामेश्वर गुप्ता ने माना।
