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मध्य प्रदेश: सम्राट मिहिर भोज क्षत्रिय थे या गुर्जर, जांच समिति ने हाईकोर्ट में सौंपी सीलबंद रिपोर्ट
Fri, 25 Sep 2026 10:12 PM IST
दिनेश शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ग्वालियर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ग्वालियर
Published by: दिनेश शर्मा
Updated Fri, 25 Sep 2026 10:12 PM IST
सार
सम्राट मिहिर भोज की जातीय पहचान को लेकर चल रहे विवाद में हाईकोर्ट द्वारा गठित जांच समिति ने सीलबंद रिपोर्ट अदालत में पेश कर दी है। मामला 2021 में प्रतिमा के नामपट्ट पर ‘गुर्जर’ शब्द लिखे जाने के बाद शुरू हुआ था। अगली सुनवाई में समिति के निष्कर्षों पर अदालत विचार करेगी।
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मप्र हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
सम्राट मिहिर भोज की जातीय पहचान को लेकर चल रहे विवाद में उच्च न्यायालय के निर्देश पर गठित जांच समिति ने अपनी सीलबंद रिपोर्ट अदालत में सौंप दी है। राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता विवेक खेडकर ने सुनवाई के दौरान पीठ को सूचित किया कि समिति ने गहन पड़ताल के बाद अपनी रिपोर्ट लिफाफे में बंद कर प्रस्तुत कर दी है। लगभग पांच वर्ष से लंबित इस संवेदनशील मामले में अब अगली सुनवाई के दौरान रिपोर्ट में शामिल निष्कर्षों पर विस्तार से विचार किया जाएगा। वर्ष 2021 में दायर जनहित याचिका के तहत शुरू हुई इस प्रक्रिया में अदालत का भावी निर्णय दोनों पक्षों की सामाजिक दावेदारी की दिशा तय करेगा।
2021 में शुनरू हुआ था विवाद
विवाद की शुरुआत वर्ष 2021 में ग्वालियर नगर में सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा के नामपट्ट पर ‘गुर्जर’ शब्द लिखे जाने के बाद हुई थी। इस कदम से गुर्जर और क्षत्रिय समाज के बीच तीखा विवाद खड़ा हो गया था, जिसके बाद राहुल साहू ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने 24 सितंबर 2021 को एक उच्चस्तरीय समिति गठित की थी। इस समिति की अध्यक्षता ग्वालियर के संभाग आयुक्त को सौंपी गई थी, जबकि ग्वालियर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक को इसका उपाध्यक्ष बनाया गया था। इसके अतिरिक्त निष्पक्षता बनाए रखने के लिए समिति में गुर्जर समाज और क्षत्रिय समाज के एक-एक अधिकृत प्रतिनिधि को भी सदस्य के रूप में शामिल किया गया था।
समिति को ऐतिहासिक अभिलेखों, उपलब्ध साहित्य और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर दोनों समाजों द्वारा प्रस्तुत दावों का गहन अध्ययन करना था। इसके साथ ही समिति के समक्ष यह सांविधानिक प्रश्न भी जांच के लिए रखा गया था कि सार्वजनिक धन से स्थापित किसी राष्ट्रीय नायक की प्रतिमा के साथ किसी विशिष्ट जाति का उल्लेख करना सांविधानिक मूल्यों और भावना के अनुरूप है या नहीं।
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ये भी पढ़ें-एमपी: गुणवत्ता जांच भी पास नहीं कर पाईं ग्वालियर की सड़कें, सैंपल फेल होने पर हाईकोर्ट ने NHAI-PWD को फटकारा
साक्ष्यों का संकलन और प्रक्रियागत आपत्तियां
शासन द्वारा अदालत में प्रस्तुत की गई अद्यतन स्थिति रिपोर्ट के अनुसार समिति ने अपनी जांच के दौरान अनेक प्रतिष्ठित इतिहासकारों के शोध पत्रों, विभिन्न स्थानों से जुटाए गए साक्ष्यों और दोनों समाजों की ओर से दिए गए औपचारिक अभ्यावेदनों को अपनी रिपोर्ट में शामिल किया है। इन समस्त सामग्रियों के विश्लेषण के बाद ही सीलबंद रिपोर्ट को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया है।
दूसरी ओर, सुनवाई के दौरान अरुणोदय सिंह ने स्वयं को सम्राट मिहिर भोज का वंशज बताते हुए जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने अदालत के समक्ष आपत्ति जताई कि समिति ने अंतिम रिपोर्ट तैयार करने से पहले उनका पक्ष नहीं सुना। हालांकि, राज्य सरकार के प्रतिनिधि ने अदालत को स्पष्ट किया कि समिति अपनी जांच पूरी कर सीलबंद रिपोर्ट पहले ही न्यायालय में प्रस्तुत कर चुकी है। वहीं, विधायक साहब सिंह गुर्जर की ओर से उपस्थित पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता राजीव शर्मा ने पक्ष रखा कि उनके क्षेत्र में गुर्जर समाज की बड़ी आबादी है और लोग अपनी समस्याएं लेकर जनप्रतिनिधि के पास आते हैं, इसलिए विधायक को निशाना बनाया जा रहा है।
ऐतिहासिक साक्ष्यों तथा कानूनी पहलुओं पर तय होगी कार्रवाई
वर्तमान में इस विवाद से जुड़े क्षेत्रों में उच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 2021 में जारी किए गए कानून और व्यवस्था संबंधी निर्देश पूरी तरह प्रभावी हैं। उस समय अदालत ने स्थानीय प्रशासन को सार्वजनिक स्थानों पर शांति और सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के कड़े निर्देश जारी किए थे, साथ ही दोनों समाजों के लोगों से संयम बनाए रखने की अपेक्षा की थी। अब अगली सुनवाई में उच्च न्यायालय सीलबंद लिफाफे को खोलकर समिति के निष्कर्षों का परीक्षण करेगा और ऐतिहासिक साक्ष्यों तथा कानूनी पहलुओं के आधार पर आगे की कार्रवाई तय करेगा।
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2021 में शुनरू हुआ था विवाद
विवाद की शुरुआत वर्ष 2021 में ग्वालियर नगर में सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा के नामपट्ट पर ‘गुर्जर’ शब्द लिखे जाने के बाद हुई थी। इस कदम से गुर्जर और क्षत्रिय समाज के बीच तीखा विवाद खड़ा हो गया था, जिसके बाद राहुल साहू ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने 24 सितंबर 2021 को एक उच्चस्तरीय समिति गठित की थी। इस समिति की अध्यक्षता ग्वालियर के संभाग आयुक्त को सौंपी गई थी, जबकि ग्वालियर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक को इसका उपाध्यक्ष बनाया गया था। इसके अतिरिक्त निष्पक्षता बनाए रखने के लिए समिति में गुर्जर समाज और क्षत्रिय समाज के एक-एक अधिकृत प्रतिनिधि को भी सदस्य के रूप में शामिल किया गया था।
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समिति को ऐतिहासिक अभिलेखों, उपलब्ध साहित्य और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर दोनों समाजों द्वारा प्रस्तुत दावों का गहन अध्ययन करना था। इसके साथ ही समिति के समक्ष यह सांविधानिक प्रश्न भी जांच के लिए रखा गया था कि सार्वजनिक धन से स्थापित किसी राष्ट्रीय नायक की प्रतिमा के साथ किसी विशिष्ट जाति का उल्लेख करना सांविधानिक मूल्यों और भावना के अनुरूप है या नहीं।
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साक्ष्यों का संकलन और प्रक्रियागत आपत्तियां
शासन द्वारा अदालत में प्रस्तुत की गई अद्यतन स्थिति रिपोर्ट के अनुसार समिति ने अपनी जांच के दौरान अनेक प्रतिष्ठित इतिहासकारों के शोध पत्रों, विभिन्न स्थानों से जुटाए गए साक्ष्यों और दोनों समाजों की ओर से दिए गए औपचारिक अभ्यावेदनों को अपनी रिपोर्ट में शामिल किया है। इन समस्त सामग्रियों के विश्लेषण के बाद ही सीलबंद रिपोर्ट को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया है।
दूसरी ओर, सुनवाई के दौरान अरुणोदय सिंह ने स्वयं को सम्राट मिहिर भोज का वंशज बताते हुए जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने अदालत के समक्ष आपत्ति जताई कि समिति ने अंतिम रिपोर्ट तैयार करने से पहले उनका पक्ष नहीं सुना। हालांकि, राज्य सरकार के प्रतिनिधि ने अदालत को स्पष्ट किया कि समिति अपनी जांच पूरी कर सीलबंद रिपोर्ट पहले ही न्यायालय में प्रस्तुत कर चुकी है। वहीं, विधायक साहब सिंह गुर्जर की ओर से उपस्थित पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता राजीव शर्मा ने पक्ष रखा कि उनके क्षेत्र में गुर्जर समाज की बड़ी आबादी है और लोग अपनी समस्याएं लेकर जनप्रतिनिधि के पास आते हैं, इसलिए विधायक को निशाना बनाया जा रहा है।
ऐतिहासिक साक्ष्यों तथा कानूनी पहलुओं पर तय होगी कार्रवाई
वर्तमान में इस विवाद से जुड़े क्षेत्रों में उच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 2021 में जारी किए गए कानून और व्यवस्था संबंधी निर्देश पूरी तरह प्रभावी हैं। उस समय अदालत ने स्थानीय प्रशासन को सार्वजनिक स्थानों पर शांति और सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के कड़े निर्देश जारी किए थे, साथ ही दोनों समाजों के लोगों से संयम बनाए रखने की अपेक्षा की थी। अब अगली सुनवाई में उच्च न्यायालय सीलबंद लिफाफे को खोलकर समिति के निष्कर्षों का परीक्षण करेगा और ऐतिहासिक साक्ष्यों तथा कानूनी पहलुओं के आधार पर आगे की कार्रवाई तय करेगा।
