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बाल संरक्षण फंड से तीन सालों में खर्च नहीं हुए 33 करोड़ रुपये, बच्चों के पास पर्याप्त कपड़े तक नहीं

Thu, 20 Sep 2018 02:53 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Updated Thu, 20 Sep 2018 02:53 PM IST
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From child protection fund rs. 33 crore unspend in three years in MP
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मध्यप्रदेश की समेकित बाल संरक्षण योजना (आईसीपीएस) के फंड से बीते तीन सालों में 33 करोड़ रुपये से अधिक का बजट खर्च नहीं किया गया है। ऐसे समय में जब बच्चे आश्रय गृह में भी सुरक्षित नहीं हैं, उन्हें न केवल सुरक्षा की बल्कि मूलभूत आवश्यकताओं के पूरा किए जाने की भी जरूरत है। 18 साल से ऊपर के बच्चों को आश्रय गृह और शिक्षा तक से वंचित रहना पड़ता है।

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यह जानकारी आरटीआई द्वारा दाखिल किए गए जवाब में कही गई है। आरटीआई को ये जानकारी राज्य के महिला एवं बाल विकास विभाग ने दी। आईसीपीएस के अंतर्गत अनाथ और अपराध में शामिल बच्चों को देखभाल, संरक्षण और पुर्नवास के लिए सहायता दी जाती है।
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दस्तावेजों के मुताबिक आईसीपीएस के अंतर्गत बजट के साल 2016-2017 में 12 करोड़ रुपये खर्च नहीं हुए। यह आंकड़ा साल 2015-16 में 13.87 करोड़ रुपये था। 2014-15 में आंकड़ा 8 करोड़ रुपये था। बता दें यह योजना महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली भारत सरकार की एक विस्तृत योजना है। जिसका उद्देश्य देश में बच्चों के लिए एक संरक्षणकारी वातावरण तैयार करना है, यह एक केंद्रीय रूप से प्रायोजित योजना है।
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इसका आधे से ज्यादा बजट केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकार को दिया जाता है। साल 2014-15 में 18.89 करोड़ रुपये का बजट केंद्रीय मंत्रालय की ओर से जारी किया गया था। इसके बाद साल 2015-16 में बजट को बढ़ाकर 29.12 करोड़ रुपये कर दिया गया। लेकिन उपयोग केवल 21.70 करोड़ रुपये ही किए गए। साल 2016-17 में 28.32 करोड़ रुपये जारी किए गए लेकिन केवल 21.85 करोड़ ही खर्च हुए।

From child protection fund rs. 33 crore unspend in three years in MP

जब इस बारे में बच्चों से बात की गई तो कुछ और ही कहानी सामने आई। एक मीडिया वेबसाइट द्वारा की गई केस स्टडी से पता चला कि बच्चों के पास पर्याप्त कपड़े तक नहीं हैं। अडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज (एडीजी) द्वारा डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विस अथॉरिटी तो अगस्त 13, 2018 में एक खत लिखा गया।

उसमें उन्होंने कहा कि महिला एवं बाल विकास विभाग के अंतर्गत आने वाले जिन आश्रय गृहों में लड़कियां रह रही हैं, वहां उनके पास पर्याप्त इनरवियर और कपड़े तक नहीं हैं। यह खत एडीजी ने उन आश्रय गृहों का दौरा करने के बाद लिखा। उन्होंने कहा कि बच्चों की मदद की जाए ताकि उनकी आधारभूत आवश्यकताएं पूरी हो सकें।

वहीं भोपाल के सरकारी आश्रय गृह में रहने वाले 20 साल के अनाथ बबलू का कहना है कि वह पढ़ने लिखने में बहुत अच्छा है। वह अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहता है। लेकिन उसके 18 साल का होते ही उसे आश्रय गृह छोड़कर चले जाने को कहा गया।

पुनर्वास सेवाओं की कमी के कारण बच्चों को स्कूल तक छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता है। वह जब अपने रिश्तेदारों के घर जाते हैं तो वह भी उन्हें अपने पास रखने से मना कर देते हैं। वहीं अगर बबलू की बात करें तो उसके 10वीं की बोर्ड परीक्षा में अच्छे अंक आए थे। जिसके बाद सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक समूह ने उसकी आगे की पढ़ाई में सहायता करने को कहा। अब बबलू शारदा विद्या मंदिर स्कूल में पढ़ रहा है और 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है।

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