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सिंगरौली: पुल निर्माण के भुगतान में 33 लाख का घोटाला, 7 लाख का बिल बना 40 लाख, तत्कालीन अधिकारियों पर एफआईआर
Wed, 04 Nov 2026 03:46 PM IST
प्रिया वर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सिंगरौली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सिंगरौली
Published by: प्रिया वर्मा
Updated Wed, 04 Nov 2026 03:46 PM IST
सार
मयार नदी पुल निर्माण के अंतिम भुगतान में करीब 33 लाख रुपये की कथित हेराफेरी का मामला सामने आया है। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ ने जांच के बाद तत्कालीन SDO, उपयंत्री और ठेकेदार के खिलाफ FIR दर्ज की है।
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बिल भुगतान में 33 लाख की हेराफेरी
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
जिले में मयार नदी पुल निर्माण के अंतिम भुगतान में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी और हेराफेरी के मामले में आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ ने प्राथमिकी दर्ज की है। जांच एजेंसी ने सत्यापन के बाद तत्कालीन अनुविभागीय अधिकारी सुशील कुमार मिश्रा, तत्कालीन उपयंत्री चंद्रशेखर तिवारी और संबंधित ठेकेदार के विरुद्ध प्रकरण दर्ज किया है। आरोपियों ने स्वीकृत भुगतान की मूल राशि में फर्जी संशोधन कर लगभग 33 लाख रुपये का अतिरिक्त अवैध भुगतान प्राप्त करने के उद्देश्य से यह साजिश रची थी।
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7.37 लाख के भुगतान पर 40.91 लाख का बिल
जांच में सामने आया कि पुल निर्माण का अधिकृत अंतिम देयक 7 लाख 37 हजार 861 रुपये स्वीकृत किया गया था। विभागीय अधिकारियों और ठेकेदार ने आपस में सांठगांठ करके इस राशि को अनुचित रूप से बढ़ाकर 40 लाख 91 हजार 300 रुपये का फर्जी संशोधित बिल तैयार कर दिया। इस वित्तीय गड़बड़ी को छिपाने के लिए शासकीय कार्यालय के रिकॉर्ड से माप पुस्तिका क्रमांक 605 को गायब कर दिया गया। साथ ही माप पुस्तिका क्रमांक 606 और 734 में व्यापक काट-छांट कर दर्ज प्रविष्टियां भी बदल दीं। रीवा संभाग के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक डॉ. अरविंद ने बताया कि ऑडिट रिपोर्ट में गड़बड़ी सामने आने के बाद प्राथमिकी दर्ज की गई है।
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जुर्माने की राशि से बचने की रची साजिश
जांच रिपोर्ट के अनुसार मयार नदी पर बन रहे इस पुल निर्माण की स्वीकृत लागत 5 करोड़ 74 लाख रुपये तय की गई थी। निर्माण कार्य 5 फरवरी 2016 को प्रारंभ किया गया था और इसे 18 महीने की निर्धारित समयावधि में यानी 4 अप्रैल 2018 तक पूर्ण करना अनिवार्य था। हालांकि ठेकेदार ने निर्धारित समय सीमा का उल्लंघन किया और लगभग चार महीने के विलंब के बाद 1 अगस्त 2018 को कार्य पूरा किया। काम में हुई इस देरी के कारण दिसंबर 2018 में ठेकेदार पर 16 लाख 78 हजार 437 रुपये का जुर्माना लगाया गया था। आरोपियों ने इसी दंड राशि के भुगतान से बचने के लिए सरकारी कागजातों में हेरफेर किया।
माप पुस्तिकाओं से साक्ष्य मिटाने का प्रयास
जनवरी 2019 में तत्कालीन अनुविभागीय अधिकारी सुशील कुमार मिश्रा ने 7 लाख 37 हजार 861 रुपये का अंतिम देयक प्रस्तुत किया था। विभागीय लेखा परीक्षा रिपोर्ट और अन्य शासकीय अभिलेखों में जुर्माने की राशि दर्ज होने के बावजूद आरोपियों ने माप पुस्तिकाओं में अवैध बदलाव करके नया संशोधित देयक बना लिया। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ ने सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचाने और साक्ष्य नष्ट करने की इस साजिश में तीनों आरोपियों की संलिप्तता की पुष्टि करते हुए विधिक कार्रवाई शुरू की है।
