{"_id":"5c013d7abdec2241cf75d7c6","slug":"bumper-voting-has-further-complicated-the-elections-of-madhya-pradesh","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"मतदान के इस आंकड़े ने तो मध्यप्रदेश की चुनाव पहेली को और उलझा दिया है...","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मतदान के इस आंकड़े ने तो मध्यप्रदेश की चुनाव पहेली को और उलझा दिया है...
गिरीश उपाध्याय
Updated Fri, 30 Nov 2018 07:09 PM IST
विज्ञापन
Shivraj singh Chouhan
- फोटो : social media
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मध्यप्रदेश विधानसभा का चुनाव एक तो वैसे ही इस बार बहुत उलझा हुआ था। उस पर मतदान के आंकड़ों ने चुनाव की पहेली को और उलझा दिया है। भाजपा के 15 साल के राज के बाद एंटी इन्कंबेंसी की हवा के बीच हुए इस चुनाव में शुरू से ही कई फैक्टर काम कर रहे थे। उम्मीदवारों के चयन से लेकर रूठों को मनाने और जनता को रिझाने की तमाम कोशिशों में दोनों ही प्रमुख दलों, सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को बहुत जतन करना पड़े।
ये तो कोई ज्यादा मतदान नहीं हुआ
प्रचार अभियान पूरा हो जाने के बाद सारी निगाहें इस बार मतदान के आंकड़ों पर लगी थीं। चुनाव आयोग की कोशिश थी कि इस बार 80 प्रतिशत का आंकड़ा छू लिया जाए। उसने इसके लिए जागरूकता के काफी प्रयास भी किए लेकिन ताजा सूचनाओं के मुताबिक यह आंकड़ा 75.05 प्रतिशत को ही छू सका है। पिछली बार यानी 2013 में प्रदेश में 72.13 फीसदी मतदान हुआ था। यानी इस बार पिछली बार की तुलना में 2.92 फीसदी का ही इजाफा हो सका है।
अगर मतदान के इन आंकड़ों का विश्लेषण करें तो सबसे पहले मैं जोर शोर से प्रचारित की जा रही रिकॉर्डतोड़ मतदान की बात से सहमत नहीं हूं। प्रतिशत के आंकड़े के हिसाब से इसे भले ही रिकॉर्डतोड़ की संज्ञा दी जा रही हो लेकिन मुझे इन आंकड़ों ने थोड़ा निराश किया है। मेरा मानना था कि जिस तरह इस बार मध्यप्रदेश में एंटी इन्कंबेंसी की हवा बताई जा रही है और माहौल को चार्ज्ड दिखाया जा रहा है, उसके चलते पिछले चुनाव की तुलना में कम से कम पांच से सात प्रतिशत का इजाफा होना चाहिए था।
विज्ञापन
क्या ये वाकई रिकॉर्डतोड़ मतदान था?
हम मतदान के आंकड़े देते समय एक और गलती करते हैं। हम सिर्फ प्रतिशत के गणित पर चले जाते हैं जो सांख्यिकी के हिसाब से तो ठीक है लेकिन चुनाव की सही स्थिति बताने के लिहाज से बिलकुल भी माफिक नहीं। मेरी बात को जरा यूं समझिए। इस बार प्रदेश में मतदाताओं की संख्या 5 करोड़ 4 लाख 3379 थी। इनके अलावा 62,172, सर्विस वोटर हैं। परंपरा है कि मतदान के आंकड़े देते समय सर्विस वोटर के आंकड़े शामिल नहीं किए जाते, वे मतगणना के बाद शामिल होते हैं।
तो चुनाव आयोग के 75.05 फीसदी मतदान के दावे के हिसाब से इस बार कुल 3 करोड़ 78 लाख 52213 लोगों ने वोट डाले। अब जो लोग इसे रिकॉर्डतोड़ या अभूतपूर्व मतदान बता रहे हैं वे जरा पुराने आंकड़ों पर नजर डाल लें। प्रदेश में 2008 के चुनाव में 2 करोड़ 52 लाख 24260 लोगों ने और 2013 में तीन करोड़ 38 लाख 98580 लोगों ने मतदान किया था। यानी 2008 की तुलना में 2013 में 86 लाख 74320 अधिक लोगों ने मतदान किया था जबकि, 2013 की तुलना में इस बार वोट डालने के लिए सिर्फ 39 लाख 53633 ज्यादा लोग ही निकले।
विज्ञापन
ये तो कोई ज्यादा मतदान नहीं हुआ
प्रचार अभियान पूरा हो जाने के बाद सारी निगाहें इस बार मतदान के आंकड़ों पर लगी थीं। चुनाव आयोग की कोशिश थी कि इस बार 80 प्रतिशत का आंकड़ा छू लिया जाए। उसने इसके लिए जागरूकता के काफी प्रयास भी किए लेकिन ताजा सूचनाओं के मुताबिक यह आंकड़ा 75.05 प्रतिशत को ही छू सका है। पिछली बार यानी 2013 में प्रदेश में 72.13 फीसदी मतदान हुआ था। यानी इस बार पिछली बार की तुलना में 2.92 फीसदी का ही इजाफा हो सका है।
विज्ञापन
अगर मतदान के इन आंकड़ों का विश्लेषण करें तो सबसे पहले मैं जोर शोर से प्रचारित की जा रही रिकॉर्डतोड़ मतदान की बात से सहमत नहीं हूं। प्रतिशत के आंकड़े के हिसाब से इसे भले ही रिकॉर्डतोड़ की संज्ञा दी जा रही हो लेकिन मुझे इन आंकड़ों ने थोड़ा निराश किया है। मेरा मानना था कि जिस तरह इस बार मध्यप्रदेश में एंटी इन्कंबेंसी की हवा बताई जा रही है और माहौल को चार्ज्ड दिखाया जा रहा है, उसके चलते पिछले चुनाव की तुलना में कम से कम पांच से सात प्रतिशत का इजाफा होना चाहिए था।
विज्ञापन
क्या ये वाकई रिकॉर्डतोड़ मतदान था?
हम मतदान के आंकड़े देते समय एक और गलती करते हैं। हम सिर्फ प्रतिशत के गणित पर चले जाते हैं जो सांख्यिकी के हिसाब से तो ठीक है लेकिन चुनाव की सही स्थिति बताने के लिहाज से बिलकुल भी माफिक नहीं। मेरी बात को जरा यूं समझिए। इस बार प्रदेश में मतदाताओं की संख्या 5 करोड़ 4 लाख 3379 थी। इनके अलावा 62,172, सर्विस वोटर हैं। परंपरा है कि मतदान के आंकड़े देते समय सर्विस वोटर के आंकड़े शामिल नहीं किए जाते, वे मतगणना के बाद शामिल होते हैं।
तो चुनाव आयोग के 75.05 फीसदी मतदान के दावे के हिसाब से इस बार कुल 3 करोड़ 78 लाख 52213 लोगों ने वोट डाले। अब जो लोग इसे रिकॉर्डतोड़ या अभूतपूर्व मतदान बता रहे हैं वे जरा पुराने आंकड़ों पर नजर डाल लें। प्रदेश में 2008 के चुनाव में 2 करोड़ 52 लाख 24260 लोगों ने और 2013 में तीन करोड़ 38 लाख 98580 लोगों ने मतदान किया था। यानी 2008 की तुलना में 2013 में 86 लाख 74320 अधिक लोगों ने मतदान किया था जबकि, 2013 की तुलना में इस बार वोट डालने के लिए सिर्फ 39 लाख 53633 ज्यादा लोग ही निकले।
समझना होगा वोटिंग का ये गणित
मतदान के लिए 2013 और 2018 में घर से निकलने वालों की संख्या के लिहाज से देखें तो लगता है कि लहर या हवा तो 2013 में ज्यादा थी जब उसके पिछले यानी 2008 के चुनाव की तुलना में कहीं अधिक लोग वोट डालने घर से बाहर निकले थे। पिछले चुनाव की तुलना में इस बार करीब करीब उतने ही ज्यादा लोग वोट डालने के लिए बाहर निकले जितने ज्यादा लोग पिछले चुनाव की तुलना में इस बार की मतदाता सूची में दर्ज हुए। एक बार को यह भी मान लें कि 2013 में सरकार के कामकाज को लेकर प्रोइन्कंबेंसी थी तो क्या यह माना जाए कि इस बार एंटी इन्कंबेंसी के तगड़े हो-हल्ले के बावजूद सरकार का विरोध करने उतने लोग बाहर नहीं निकले जितने पिछली बार उसका समर्थन करने के लिए निकले थे? फिर तो यह बात भाजपा के पक्ष में जाती है।
लेकिन दूसरी ओर यह भी सच है कि प्रदेश में इस बार 18 से 19 साल के, यानी बिलकुल ताजा ताजा वोटर बने युवाओं की संख्या 16 लाख 3073 और 20 से 29 आयु वर्ग के वोटरों की संख्या एक करोड़ 38 लाख 26251 थी। एंटी इन्कंबेंसी में सबसे ज्यादा बढ़-चढ़कर हिस्सा यही वर्ग लेता है। मध्यप्रदेश में ये ही वो वर्ग है जिसने कांग्रेस का पिछला शासनकाल या तो देखा ही नहीं या फिर वह इसी सरकार के काम को देखते हुए बड़ा हुआ। इस वर्ग में बेरोजगारी को लेकर खासा असंतोष है। 18 से 29 वर्ष की आयु वर्ग के इन वोटरों का आंकड़ा एक करोड़ 54 हजार 29324 होता है। अगर यह वर्ग बड़ी संख्या में वोट देने निकला है तो आसार परिवर्तन के बनते हैं।
इस बार प्रदेश की राजनीतिक स्थितियां भी पिछले चुनाव से अलग हैं। इस बार मैदान में भाजपा और कांग्रेस जैसे प्रदेश के परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों के अलावा सपाक्स और आम आदमी पार्टी जैसी पार्टियां और प्रभावशाली बागी भी चुनाव परिणामों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। ये लोग भले ही चुनाव न जीत पाएं लेकिन इनके द्वारा किया जाने वाला वोटों का विभाजन चुनावी हार-जीत को निश्चित रूप से प्रभावित करेगा। आम आदमी पार्टी जहां शहरी मतदाताओं के वोट काटेगी वहीं सपाक्स उस उच्च वर्ग के वोटों में सेंध लगाएगी जो परंपरागत रूप से अभी तक भाजपा का समर्थक रहा है। पेंच यह है कि ये दोनों ही कटौतियां भाजपा के खाते से होंगी जरूर पर वे कांग्रेस के खाते में जाती भी नजर नहीं आ रहीं।
लेकिन दूसरी ओर यह भी सच है कि प्रदेश में इस बार 18 से 19 साल के, यानी बिलकुल ताजा ताजा वोटर बने युवाओं की संख्या 16 लाख 3073 और 20 से 29 आयु वर्ग के वोटरों की संख्या एक करोड़ 38 लाख 26251 थी। एंटी इन्कंबेंसी में सबसे ज्यादा बढ़-चढ़कर हिस्सा यही वर्ग लेता है। मध्यप्रदेश में ये ही वो वर्ग है जिसने कांग्रेस का पिछला शासनकाल या तो देखा ही नहीं या फिर वह इसी सरकार के काम को देखते हुए बड़ा हुआ। इस वर्ग में बेरोजगारी को लेकर खासा असंतोष है। 18 से 29 वर्ष की आयु वर्ग के इन वोटरों का आंकड़ा एक करोड़ 54 हजार 29324 होता है। अगर यह वर्ग बड़ी संख्या में वोट देने निकला है तो आसार परिवर्तन के बनते हैं।
इस बार प्रदेश की राजनीतिक स्थितियां भी पिछले चुनाव से अलग हैं। इस बार मैदान में भाजपा और कांग्रेस जैसे प्रदेश के परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों के अलावा सपाक्स और आम आदमी पार्टी जैसी पार्टियां और प्रभावशाली बागी भी चुनाव परिणामों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। ये लोग भले ही चुनाव न जीत पाएं लेकिन इनके द्वारा किया जाने वाला वोटों का विभाजन चुनावी हार-जीत को निश्चित रूप से प्रभावित करेगा। आम आदमी पार्टी जहां शहरी मतदाताओं के वोट काटेगी वहीं सपाक्स उस उच्च वर्ग के वोटों में सेंध लगाएगी जो परंपरागत रूप से अभी तक भाजपा का समर्थक रहा है। पेंच यह है कि ये दोनों ही कटौतियां भाजपा के खाते से होंगी जरूर पर वे कांग्रेस के खाते में जाती भी नजर नहीं आ रहीं।
भाजपा को मिली थी 8 फीसदी की बढ़त
जहां तक 2013 के चुनाव की बात है, उसमें भाजपा ने 44.87 फीसदी वोटों के साथ 165 सीटें हासिल की थीं, जबकि कांग्रेस को 36.38 फीसदी वोटों के साथ 58 सीटें ही मिल सकी थीं। इस लिहाज से पिछली बार की तुलना में इस बार भाजपा के पास करीब सौ सीटों के साथ-साथ साढ़े आठ फीसदी वोटों की बढ़त का बफर भी मौजूद है। पिछले चुनाव में कांग्रेस व भाजपा के अलावा बाकी दलों, जिनमें बसपा, सपा, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी व निर्दलीय आदि शामिल हैं, ने 18.75 फीसदी वोटों पर कब्जा किया था। इस बार यदि इसमें सपाक्स और आम आदमी पार्टी के अलावा बागियों द्वारा लिया जाने वाला शेयर भी जोड़ें और यदि इन्होंने 6-7 फीसदी वोट भी ले लिए तो इनकी ये हिस्सेदारी कांग्रेस व भाजपा को बराबरी की टक्कर पर ला देगी।
ऐसे में, जैसा कि हल्ला है, एंटी इन्कंबेंसी का असर हुआ तो तय मानिए कि नुकसान भाजपा को ही उठाना पड़ेगा। वैसे एक मोटा अनुमान यह है कि पिछली बार की तुलना में ये जो 2.92 फीसदी अधिक वोटिंग हुआ है, वह एंटी इन्कंबेंसी का ही परिणाम है। शायद यही वजह है कि कांग्रेसी नेताओं के चेहरे पर चमक बढ़ी हुई है और भाजपा के नेता हालात को तौल रहे हैं। यकीन न आए तो मतदान के तुरंत बाद की दो घटनाओं को देख लीजिए। मतदान खत्म होते ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने तुरंत प्रेस कान्फ्रेंस कर, खुशी से उछलते हुए 140 सीटें जीतने का दावा कर मतदाताओं के प्रति आभार जताया, जबकि भाजपा की ओर से ऐसी कोई पहल नहीं हुई। अलबत्ता भाजपा का यह पूरा युद्ध अपने बूते पर लड़ने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का एक बयान जरूर सुनने को मिला जिसमें उन्होंने वोटिंग खत्म होने के बाद इतना भर कहा- हमें प्रदेश की जनता का प्यार और आशीर्वाद मिला...
आप इस बयान को ध्यान से देखें तो तय नहीं कर पाएंगे कि यह बयान गुजरे हुए समय के बारे में है या आने वाले समय के बारे में... इसीलिए मैंने कहा, इस मतदान ने चुनाव की पहेली को और जटिल बना दिया है।
ऐसे में, जैसा कि हल्ला है, एंटी इन्कंबेंसी का असर हुआ तो तय मानिए कि नुकसान भाजपा को ही उठाना पड़ेगा। वैसे एक मोटा अनुमान यह है कि पिछली बार की तुलना में ये जो 2.92 फीसदी अधिक वोटिंग हुआ है, वह एंटी इन्कंबेंसी का ही परिणाम है। शायद यही वजह है कि कांग्रेसी नेताओं के चेहरे पर चमक बढ़ी हुई है और भाजपा के नेता हालात को तौल रहे हैं। यकीन न आए तो मतदान के तुरंत बाद की दो घटनाओं को देख लीजिए। मतदान खत्म होते ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने तुरंत प्रेस कान्फ्रेंस कर, खुशी से उछलते हुए 140 सीटें जीतने का दावा कर मतदाताओं के प्रति आभार जताया, जबकि भाजपा की ओर से ऐसी कोई पहल नहीं हुई। अलबत्ता भाजपा का यह पूरा युद्ध अपने बूते पर लड़ने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का एक बयान जरूर सुनने को मिला जिसमें उन्होंने वोटिंग खत्म होने के बाद इतना भर कहा- हमें प्रदेश की जनता का प्यार और आशीर्वाद मिला...
आप इस बयान को ध्यान से देखें तो तय नहीं कर पाएंगे कि यह बयान गुजरे हुए समय के बारे में है या आने वाले समय के बारे में... इसीलिए मैंने कहा, इस मतदान ने चुनाव की पहेली को और जटिल बना दिया है।
