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बीजेपी में बगावत तो कांग्रेस में भितरघात
हरीश लखेड़ा, भोपाल
Updated Sat, 16 Nov 2013 06:11 PM IST
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मध्य प्रदेश में हैट्रिक बनाने के कोशिशों में जुटी भाजपा के लिए बागी मुसीबत बन गए हैं। गुटबाजी में फंसी कांग्रेस भितरघात के खतरे से हलकान है।
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दोनों दलों के नेताओं की धड़कनें तेज हो गई हैं। नेताओं के बागी तेवर और भितरघात चुनाव के नतीजों में बड़ा उलटफेर कर सकते हैं।
विधानसभा चुनाव प्रचार के केवल 8 दिन रह गए हैं। दोनों दलों के लिए इन मुसीबतों से निपटना भारी पड़ रहा है। पिछली दफा 5.28 फीसदी मतों से पिछड़ी कांग्रेस के लिए इस अंतर को पाटना एक चुनौती है, तो भाजपा के लिए इसे कायम रखना।
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कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इसलिए मार्च से ही चुनावी तैयारी शुरू करा दी थी, लेकिन गुटों में उलझे यहां पार्टी क्षत्रपों के चलते कांग्रेस आंतरिक कलह से मुक्त नहीं हो पाई। इससे शिवराज सरकार खासतौर पर मंत्रियों व विधायकों के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी का फायदा कांग्रेस नहीं उठा पा रही है।
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पार्टी ने पिछले चुनावों की तुलना में इस बार अच्छे उम्मीदवारों को उतारा है। इसके बावजूद कांग्रेस की मुश्किलें कम नहीं हैं। कांग्रेस के दिग्विजय सिंह, कमलनाथ से लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया को लोग अब दिल्ली वाले कह कर पुकारते हैं।
पिछले पांच सालों में कांग्रेस के नेता मुद्दों पर कहीं लड़ते नहीं दिखे। उज्जैन में ही प्रदेश सरकार के आला अफसरों के भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर हुए। लेकिन कांग्रेस उन्हें भुना पाने में नाकाम रही। मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं कर पाना भी कांग्रेस की राह में एक बड़ा रोड़ा माना जा रहा है।
हालांकि पार्टी की तरफ से यह भी दलील दी जा रही है कि सिंधिया के नाम का ऐलान हो जाने पर कांग्रेस में गुटबाजी और तेज हो जाती।
दूसरी तरफ भाजपा को शिवराज की स्वच्छ छवि, नरेंद्र मोदी के कारण बने सियासी माहौल और अपने संगठन पर भरोसा है।
मगर, भाजपा की मुश्किल यह है कि एक तो उसके सामने दस साल की एंटी इन्कंबेंसी है। दूसरा, पार्टी कार्यकर्ता मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों व विधायकों से खुश नहीं हैं। शिवराज की आम लोगों में तो भले मानस की छवि है, लेकिन कार्यकर्ताओं में धारणा यह है कि वे सत्ता को बांटना नहीं जानते।
इसका सबूत यह है कि पांच वर्षों के दौरान वे सरकार के विभिन्न निगमों के लिए अध्यक्ष तय नहीं कर पाए।
मध्य प्रदेश में भी भाजपा में चर्चा है कि जिस तरह एक दशक पहले केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार कार्यकर्ताओं को खुश रखने में नाकाम रही थी, वही हाल शिवराज सरकार का है। इसलिए कार्यकताओं की बेरुखी भाजपा को यहां महंगी पड़ सकती है।
