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मोबाइल के दौर में खिलौनों की वापसी: भोपाल में सजी बचपन की दुनिया, देशभर के कारीगरों ने दिखाई परंपरा की ताकत
Sat, 21 Mar 2026 06:35 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari
न्यूज डेस्क,अमर उजाला भोपाल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला भोपाल
Published by: Sandeep Kumar Tiwari
Updated Sat, 21 Mar 2026 06:35 PM IST
सार
भोपाल के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में आयोजित कार्यक्रम में देशभर के कारीगर पारंपरिक खिलौनों के जरिए खोते बचपन को फिर से जीवंत करने की कोशिश कर रहे हैं। मोबाइल युग के बीच यह आयोजन संस्कृति, कला और विरासत को बचाने की अहम पहल बनकर सामने आया है।
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खिलौनों की प्रदर्शनी
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
जहां एक ओर बच्चों का बचपन मोबाइल स्क्रीन में सिमटता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर भोपाल में पारंपरिक खिलौनों के जरिए उसी बचपन को फिर से जिंदा करने की कोशिश हो रही है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में चल रहे खास आयोजन में देशभर के कारीगर अपनी कला और विरासत को सामने ला रहे हैं। मानव संग्रहालय के 49वें स्थापना दिवस पर इस बार भारतीय संस्कृति और विरासत कार्यक्रम के तहत खिलौना संस्कृति को केंद्र में रखा गया है। यहां देश के सात राज्यों के पारंपरिक खिलौनों और गुड़ियों की प्रदर्शनी लगाई गई है, जो दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है।
7 राज्यों के कारीगर, हर स्टॉल एक कहानी
मध्य प्रदेश के बुधनी, अलीराजपुर और झाबुआ के साथ कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गुजरात और राजस्थान से आए कारीगर इस प्रदर्शनी का हिस्सा हैं। कहीं लकड़ी के रंग-बिरंगे खिलौने हैं, तो कहीं मिट्टी की गुड़िया और पारंपरिक कठपुतलियां हर स्टॉल अपने आप में एक अलग संस्कृति और कहानी बयां कर रहा है।
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पीढ़ियों से जुड़ा हुनर, अब पहचान की तलाश
बुधनी से आईं रूपल विश्वकर्मा बताती हैं कि उनके परिवार में यह काम पीढ़ियों से चला आ रहा है। हालांकि बाजार सीमित है, लेकिन यह कला उनके लिए आज भी पहचान और आत्मनिर्भरता का जरिया है। इस प्रदर्शनी से उन्हें अपने हुनर को नई पहचान मिलने की उम्मीद है।
GI टैग वाले खिलौने, दुनिया तक पहुंच
कर्नाटक के चन्नापटना से आए कारीगर सैयद नियाजुल्लाह पारंपरिक खिलौनों को वैश्विक पहचान दिला रहे हैं। उनके खिलौनों को GI टैग मिला है और वे ऑर्गेनिक रंगों का उपयोग करते हैं, जो बच्चों के लिए सुरक्षित हैं। वे बताते हैं कि तकनीक ने काम आसान किया है, लेकिन हाथों की कला का महत्व आज भी कायम है।
यह भी पढे़ं-एमपी में साइबर ठगी का जाल गहरा, 4 साल में 1054 करोड़ साफ, नेता प्रतिपक्ष ने सिस्टम पर उठाए सवाल
कठपुतली कला को नया रूप देने की कोशिश
राजस्थान के जयपुर से आए बिल्लू राम भट्ट पारंपरिक कठपुतली कला को आधुनिक अंदाज में पेश कर रहे हैं। उनका कहना है कि पहले जहां हर आयोजन में कठपुतली नाच होता था, अब इसकी मांग घटी है, लेकिन नए किरदारों और कहानियों से इसे फिर से लोकप्रिय बनाने की कोशिश जारी है।
यह भी पढे़ं-एमपी में बारिश का दौर जारी, पूर्वी क्षेत्र के 14 जिलों में आज भी अलर्ट, तापमान मे आई गिरावट
सिर्फ प्रदर्शनी नहीं, संस्कृति का पूरा उत्सव
कार्यक्रम में अलविलक्कु दीप प्रज्वलन (केरल परंपरा), एथनिक फूड फेस्टिवल और लोक-सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी आकर्षण का केंद्र हैं। साथ ही संग्रहालय की लाइब्रेरी में खिलौनों पर आधारित पुस्तकों की विशेष प्रदर्शनी भी लगाई गई है।आयोजकों के मुताबिक हर साल एक नई थीम चुनी जाती है और इस बार खिलौनों को केंद्र में रखने का उद्देश्य उन परंपराओं को बचाना है, जो आधुनिक जीवनशैली में धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं।
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7 राज्यों के कारीगर, हर स्टॉल एक कहानी
मध्य प्रदेश के बुधनी, अलीराजपुर और झाबुआ के साथ कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गुजरात और राजस्थान से आए कारीगर इस प्रदर्शनी का हिस्सा हैं। कहीं लकड़ी के रंग-बिरंगे खिलौने हैं, तो कहीं मिट्टी की गुड़िया और पारंपरिक कठपुतलियां हर स्टॉल अपने आप में एक अलग संस्कृति और कहानी बयां कर रहा है।
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पीढ़ियों से जुड़ा हुनर, अब पहचान की तलाश
बुधनी से आईं रूपल विश्वकर्मा बताती हैं कि उनके परिवार में यह काम पीढ़ियों से चला आ रहा है। हालांकि बाजार सीमित है, लेकिन यह कला उनके लिए आज भी पहचान और आत्मनिर्भरता का जरिया है। इस प्रदर्शनी से उन्हें अपने हुनर को नई पहचान मिलने की उम्मीद है।
GI टैग वाले खिलौने, दुनिया तक पहुंच
कर्नाटक के चन्नापटना से आए कारीगर सैयद नियाजुल्लाह पारंपरिक खिलौनों को वैश्विक पहचान दिला रहे हैं। उनके खिलौनों को GI टैग मिला है और वे ऑर्गेनिक रंगों का उपयोग करते हैं, जो बच्चों के लिए सुरक्षित हैं। वे बताते हैं कि तकनीक ने काम आसान किया है, लेकिन हाथों की कला का महत्व आज भी कायम है।
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कठपुतली कला को नया रूप देने की कोशिश
राजस्थान के जयपुर से आए बिल्लू राम भट्ट पारंपरिक कठपुतली कला को आधुनिक अंदाज में पेश कर रहे हैं। उनका कहना है कि पहले जहां हर आयोजन में कठपुतली नाच होता था, अब इसकी मांग घटी है, लेकिन नए किरदारों और कहानियों से इसे फिर से लोकप्रिय बनाने की कोशिश जारी है।
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कार्यक्रम में अलविलक्कु दीप प्रज्वलन (केरल परंपरा), एथनिक फूड फेस्टिवल और लोक-सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी आकर्षण का केंद्र हैं। साथ ही संग्रहालय की लाइब्रेरी में खिलौनों पर आधारित पुस्तकों की विशेष प्रदर्शनी भी लगाई गई है।आयोजकों के मुताबिक हर साल एक नई थीम चुनी जाती है और इस बार खिलौनों को केंद्र में रखने का उद्देश्य उन परंपराओं को बचाना है, जो आधुनिक जीवनशैली में धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं।
