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शिक्षकों की उपलब्धि: पुरानी घड़ी से बना दिया वर्गमूल का मॉडल, गाकर पढ़ाया महाजनपद, कबाड़ से बना विज्ञान
Sat, 05 Sep 2026 04:12 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
Published by: Sandeep Kumar Tiwari
Updated Sat, 05 Sep 2026 04:12 PM IST
सार
शिक्षक दिवस पर सम्मानित शिक्षकों ने नवाचार से सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदली। किसी ने महाजनपद चालीसा से पढ़ाया, तो किसी ने कबाड़ से शिक्षण सामग्री बनाई। जनभागीदारी से गरीब बच्चों को 2 लाख से ज्यादा की सामग्री मिली, वहीं निजी स्कूलों जैसी सुविधाओं से सरकारी स्कूलों में नामांकन और उपस्थिति बढ़ी।
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शिक्षक शिवलाल दांगी और सुरेश चंद्र सोनी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
शिक्षक दिवस पर भोपाल में सम्मानित हुए शिक्षकों ने बताया कि सरकारी स्कूलों में बच्चों को जोड़ने के लिए सिर्फ किताब-कॉपी की पढ़ाई नहीं, बल्कि नए प्रयोग, अभिभावकों की भागीदारी और समाज के सहयोग को हथियार बनाया। किसी ने महाजनपद का पाठ चालीसा बनाकर बच्चों को गाकर याद कराया, तो किसी ने कबाड़ से शिक्षण सामग्री तैयार की। एक शिक्षक ने जनभागीदारी से गरीब बच्चों के लिए 2 लाख रुपए से अधिक की शैक्षणिक सामग्री जुटाई, जबकि गुना के शिक्षक ने सरकारी स्कूल में समर कैंप से लेकर आत्मरक्षा प्रशिक्षण तक शुरू कराया। भोपाल स्थित आरसीवीपी नरोन्हा प्रशासन एवं प्रबंधकीय अकादमी में शिक्षक दिवस पर राज्य स्तरीय सम्मान समारोह हुआ। राज्यपाल मंगुभाई पटेल और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की मौजूदगी में प्रदेश के शिक्षकों को सम्मानित किया गया। इनमें ऐसे शिक्षक भी शामिल रहे, जिन्होंने सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदलने के लिए अपने स्तर पर अलग-अलग प्रयोग किए।
महाजनपद पढ़ाना था, शिक्षक ने बना दी महाजनपद चालीसा
आगर मालवा के सुसनेर स्थित सांदीपनि विद्यालय के शिक्षक शिवलाल दांगी ने सामाजिक विज्ञान जैसे विषय को बच्चों के लिए रोचक बनाने का तरीका निकाला। महाजनपद जैसा बड़ा और कठिन पाठ बच्चों को समझाने के लिए उन्होंने उसे ‘महाजनपद चालीसा’ में बदल दिया। उनका कहना है कि बच्चे पढ़ने के बजाय गाकर चीजों को ज्यादा आसानी से याद करते हैं। उनका प्रयोग सिर्फ कक्षा तक सीमित नहीं है। स्कूल से जुड़े 30 पोषक गांवों में वे हर रविवार चौपाल लगाते हैं। करीब चार घंटे तक चलने वाली इन चौपालों में बच्चों के साथ अभिभावकों को भी जोड़ा जाता है। स्कूल में मिलने वाली सुविधाओं की जानकारी देने से लेकर बच्चों की पढ़ाई में अभिभावकों की भूमिका समझाने तक का काम यहीं होता है। दांगी के अनुसार, इसका असर बच्चों की उपस्थिति पर भी पड़ा है और विद्यालय में करीब 98 प्रतिशत उपस्थिति बनी रहती है।
जो बच्चे शिक्षक से डरते थे, उन्हें दोस्त बनाकर स्कूल लाईं रीना
सिवनी जिले की प्राथमिक शिक्षक रीना देवी कटरे ने स्कूल से दूरी बना चुके बच्चों को जोड़ने के लिए अलग तरीका अपनाया। उनका कहना है कि कुछ बच्चे स्कूल और शिक्षकों से डरते थे। उन्होंने ऐसे बच्चों से पढ़ाई कराने के बजाय पहले दोस्ती की, बातचीत की और उनका डर खत्म किया। धीरे-धीरे बच्चे नियमित रूप से स्कूल आने लगे। उन्होंने बेकार पड़ी वस्तुओं से शिक्षण सामग्री तैयार की। कबाड़ से जुगाड़ के जरिए बनाई गई इन सामग्रियों से बच्चों को खेल-खेल में विषय की अवधारणाएं समझाई जाती हैं। इससे बच्चों की पढ़ाई में रुचि बढ़ी।
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मजदूर परिवारों के बच्चों के लिए समाज ने खोली मदद की राह
राजगढ़ जिले के माचलपुर के प्राथमिक शिक्षक सुरेश चंद्र सोनी ने ऐसे बच्चों के लिए जनभागीदारी का मॉडल खड़ा किया, जिनके माता-पिता मजदूरी कर परिवार चलाते हैं। कक्षा में कई बार बच्चे पेंसिल, कॉपी नहीं होने की बात कहते थे। इसके बाद उन्होंने नगर के प्रबुद्ध लोगों, अधिकारियों और समाजसेवियों से सहयोग मांगा। जन्मदिन और पुण्यतिथि जैसे अवसरों पर लोग विद्यालय आने लगे और बच्चों के लिए शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराने लगे। तहसीलदार, पुलिस प्रशासन और चिकित्सा विभाग के अधिकारियों को भी इससे जोड़ा गया। सोनी के मुताबिक जनभागीदारी से अब तक 2 लाख रुपए से अधिक की शैक्षणिक सामग्री बच्चों को उपलब्ध कराई जा चुकी है। उनका कहना है कि हर सत्र की शुरुआत में बच्चों को वर्षभर की जरूरत की कॉपी और अन्य सामग्री उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है।
यह भी पढ़ें-मध्यप्रदेश में फिर झमाझम का अलर्ट: आज 19 जिलों में भारी बारिश, ग्वालियर-चंबल के 6 जिलों में स्कूल बंद
सरकारी स्कूल ने निजी स्कूलों से मुकाबले का मॉडल बनाया
गुना के माध्यमिक शिक्षक नरेंद्र भारद्वाज ने कम नामांकन की समस्या से निपटने के लिए घर-घर संपर्क शुरू किया। अभिभावकों की शिकायत थी कि सरकारी स्कूल में पढ़ाई और सुविधाएं निजी स्कूल जैसी नहीं होंगी। शिक्षक ने समाजसेवियों की मदद से स्कूल में ऐसी सुविधाएं जुटानी शुरू की। विद्यालय में वाटर कूलर, सैनिटाइजर,बालिकाओं के लिए आत्मरक्षा प्रशिक्षण और सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीन जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। वर्ष 2022-23 से गर्मी की छुट्टियों में समर कैंप भी शुरू किया गया। बच्चों को सिर्फ किताबों तक सीमित रखने के बजाय कला, संगीत, भ्रमण और व्यावसायिक गतिविधियों से भी जोड़ा गया। बैगलेस डे पर बच्चों को व्यवसायिक परिसरों में ले जाकर बाजार में कामकाज, ग्राहकों से बातचीत और व्यावहारिक कौशल की जानकारी दी जाती है।
यह भी पढ़ें-शिक्षक दिवस पर सीएम का बड़ा ऐलान: एमपी में पहली बार ऑफलाइन होगी टीईटी, डेढ़ लाख शिक्षक देंगे परीक्षा
पुरानी घड़ी से बना दिया वर्गमूल का मॉडल
भारद्वाज ने पढ़ाने के लिए कम लागत वाली शिक्षण सामग्री को भी अहम बनाया। पुरानी घड़ी जैसी बेकार वस्तुओं से गणित के मॉडल तैयार किए गए। वृत्त और कोण जैसी अवधारणाओं को समझाने के लिए भी कबाड़ से सामग्री बनाई गई। उनके अनुसार, बिना शिक्षण सामग्री के शिक्षक का कक्षा में जाना ऐसा है जैसे सैनिक बिना हथियार के मैदान में जाए। इन प्रयासों का असर नामांकन और बच्चों की उपलब्धियों में भी दिखाई देने का दावा किया गया। विद्यालय के बच्चे राष्ट्रीय मीन्स-कम-मेरिट जैसी परीक्षाओं में चयनित हो रहे हैं और आठवीं के बाद उत्कृष्ट विद्यालयों में भी पहुंच रहे हैं।
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महाजनपद पढ़ाना था, शिक्षक ने बना दी महाजनपद चालीसा
आगर मालवा के सुसनेर स्थित सांदीपनि विद्यालय के शिक्षक शिवलाल दांगी ने सामाजिक विज्ञान जैसे विषय को बच्चों के लिए रोचक बनाने का तरीका निकाला। महाजनपद जैसा बड़ा और कठिन पाठ बच्चों को समझाने के लिए उन्होंने उसे ‘महाजनपद चालीसा’ में बदल दिया। उनका कहना है कि बच्चे पढ़ने के बजाय गाकर चीजों को ज्यादा आसानी से याद करते हैं। उनका प्रयोग सिर्फ कक्षा तक सीमित नहीं है। स्कूल से जुड़े 30 पोषक गांवों में वे हर रविवार चौपाल लगाते हैं। करीब चार घंटे तक चलने वाली इन चौपालों में बच्चों के साथ अभिभावकों को भी जोड़ा जाता है। स्कूल में मिलने वाली सुविधाओं की जानकारी देने से लेकर बच्चों की पढ़ाई में अभिभावकों की भूमिका समझाने तक का काम यहीं होता है। दांगी के अनुसार, इसका असर बच्चों की उपस्थिति पर भी पड़ा है और विद्यालय में करीब 98 प्रतिशत उपस्थिति बनी रहती है।
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जो बच्चे शिक्षक से डरते थे, उन्हें दोस्त बनाकर स्कूल लाईं रीना
सिवनी जिले की प्राथमिक शिक्षक रीना देवी कटरे ने स्कूल से दूरी बना चुके बच्चों को जोड़ने के लिए अलग तरीका अपनाया। उनका कहना है कि कुछ बच्चे स्कूल और शिक्षकों से डरते थे। उन्होंने ऐसे बच्चों से पढ़ाई कराने के बजाय पहले दोस्ती की, बातचीत की और उनका डर खत्म किया। धीरे-धीरे बच्चे नियमित रूप से स्कूल आने लगे। उन्होंने बेकार पड़ी वस्तुओं से शिक्षण सामग्री तैयार की। कबाड़ से जुगाड़ के जरिए बनाई गई इन सामग्रियों से बच्चों को खेल-खेल में विषय की अवधारणाएं समझाई जाती हैं। इससे बच्चों की पढ़ाई में रुचि बढ़ी।
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मजदूर परिवारों के बच्चों के लिए समाज ने खोली मदद की राह
राजगढ़ जिले के माचलपुर के प्राथमिक शिक्षक सुरेश चंद्र सोनी ने ऐसे बच्चों के लिए जनभागीदारी का मॉडल खड़ा किया, जिनके माता-पिता मजदूरी कर परिवार चलाते हैं। कक्षा में कई बार बच्चे पेंसिल, कॉपी नहीं होने की बात कहते थे। इसके बाद उन्होंने नगर के प्रबुद्ध लोगों, अधिकारियों और समाजसेवियों से सहयोग मांगा। जन्मदिन और पुण्यतिथि जैसे अवसरों पर लोग विद्यालय आने लगे और बच्चों के लिए शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराने लगे। तहसीलदार, पुलिस प्रशासन और चिकित्सा विभाग के अधिकारियों को भी इससे जोड़ा गया। सोनी के मुताबिक जनभागीदारी से अब तक 2 लाख रुपए से अधिक की शैक्षणिक सामग्री बच्चों को उपलब्ध कराई जा चुकी है। उनका कहना है कि हर सत्र की शुरुआत में बच्चों को वर्षभर की जरूरत की कॉपी और अन्य सामग्री उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है।
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सरकारी स्कूल ने निजी स्कूलों से मुकाबले का मॉडल बनाया
गुना के माध्यमिक शिक्षक नरेंद्र भारद्वाज ने कम नामांकन की समस्या से निपटने के लिए घर-घर संपर्क शुरू किया। अभिभावकों की शिकायत थी कि सरकारी स्कूल में पढ़ाई और सुविधाएं निजी स्कूल जैसी नहीं होंगी। शिक्षक ने समाजसेवियों की मदद से स्कूल में ऐसी सुविधाएं जुटानी शुरू की। विद्यालय में वाटर कूलर, सैनिटाइजर,बालिकाओं के लिए आत्मरक्षा प्रशिक्षण और सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीन जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। वर्ष 2022-23 से गर्मी की छुट्टियों में समर कैंप भी शुरू किया गया। बच्चों को सिर्फ किताबों तक सीमित रखने के बजाय कला, संगीत, भ्रमण और व्यावसायिक गतिविधियों से भी जोड़ा गया। बैगलेस डे पर बच्चों को व्यवसायिक परिसरों में ले जाकर बाजार में कामकाज, ग्राहकों से बातचीत और व्यावहारिक कौशल की जानकारी दी जाती है।
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पुरानी घड़ी से बना दिया वर्गमूल का मॉडल
भारद्वाज ने पढ़ाने के लिए कम लागत वाली शिक्षण सामग्री को भी अहम बनाया। पुरानी घड़ी जैसी बेकार वस्तुओं से गणित के मॉडल तैयार किए गए। वृत्त और कोण जैसी अवधारणाओं को समझाने के लिए भी कबाड़ से सामग्री बनाई गई। उनके अनुसार, बिना शिक्षण सामग्री के शिक्षक का कक्षा में जाना ऐसा है जैसे सैनिक बिना हथियार के मैदान में जाए। इन प्रयासों का असर नामांकन और बच्चों की उपलब्धियों में भी दिखाई देने का दावा किया गया। विद्यालय के बच्चे राष्ट्रीय मीन्स-कम-मेरिट जैसी परीक्षाओं में चयनित हो रहे हैं और आठवीं के बाद उत्कृष्ट विद्यालयों में भी पहुंच रहे हैं।
