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बेटियों को गोद लेने का बढ़ा चलन: 5 साल में सबसे ज्यादा बच्चों को मिला परिवार, 57% बेटियां, वेटिंग 3 साल तक
Fri, 25 Sep 2026 02:25 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
Published by: Sandeep Kumar Tiwari
Updated Fri, 25 Sep 2026 02:25 PM IST
सार
मध्य प्रदेश में बच्चों को गोद लेने का चलन तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2025-26 में 221 बच्चों को परिवार मिला, जो पांच साल में सबसे ज्यादा है। खास बात यह है कि इनमें 125 बेटियां हैं। लगातार दूसरे साल बेटियों की संख्या बेटों से ज्यादा रही। हालांकि परिवारों की बढ़ती संख्या के कारण बच्चों के लिए प्रतीक्षा अवधि भी बढ़कर कई मामलों में ढाई से तीन साल तक पहुंच गई है।
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मातृछाया भोपाल
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मध्य प्रदेश में बच्चों को गोद लेने के प्रति परिवारों का रुझान तेजी से बढ़ा है। बीते पांच साल में वर्ष 2025-26 के दौरान प्रदेश में सबसे ज्यादा 221 बच्चों को परिवार मिला। इनमें 125 बेटियां और 96 बेटे हैं। यानी गोद लिए गए हर 100 बच्चों में करीब 57 बेटियां हैं। लगातार दूसरे साल बेटियों की संख्या बेटों से ज्यादा रही है। केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (कारा) के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024-25 में प्रदेश में 133 बच्चों को गोद लिया गया था। इस बार यह संख्या 88 बढ़कर 221 हो गई। इनमें 207 बच्चों को देश में और 14 बच्चों को विदेश में परिवार मिला। दत्तक ग्रहण के मामले में मध्य प्रदेश अब देश में 13वें से नौवें स्थान पर पहुंच गया है।
बेटियों को अपनाने में भी बढ़ी परिवारों की दिलचस्पी
सामाजिक कार्यकर्ता प्रीति साहू के मुताबिक पहले कई परिवार सिर्फ बेटे को गोद लेने की इच्छा रखते थे, लेकिन अब बेटियों को लेकर भी परिवार आगे आ रहे हैं। कारा के पंजीयन में परिवारों को लड़की, लड़का या कोई पसंद नहीं का विकल्प मिलता है। उन्होंने बताया कि कई ऐसे परिवार भी हैं, जिनके यहां पहले से एक बेटा है और वे परिवार पूरा करने के लिए बेटी को गोद लेना चाहते हैं। वहीं, ऐसे दंपती भी हैं जिनके बच्चे नहीं हैं और वे बेटी को अपनाने की इच्छा लेकर आ रहे हैं।
परिवार बढ़े तो लंबी हुई बच्चों की प्रतीक्षा
बच्चे को गोद लेने के इच्छुक परिवारों की संख्या बढ़ने के साथ प्रतीक्षा अवधि भी लंबी हो गई है। प्रीति साहू के अनुसार नए पंजीयन के बाद प्रतीक्षा सूची में करीब 1500 के आसपास परिवार हो सकते हैं। छोटे बच्चों के लिए कई मामलों में परिवारों को ढाई से तीन साल, साढ़े तीन साल और कुछ मामलों में चार साल तक इंतजार करना पड़ रहा है। मातृ छाया सेवा भारती के अनुसार, पहले पंजीयन के बाद करीब एक से डेढ़ साल में बच्चा मिल जाता था, लेकिन अब इच्छुक परिवारों की संख्या बढ़ने से कई मामलों में ढाई से तीन साल तक इंतजार करना पड़ रहा है।
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संस्थान में रहने वाला हर बच्चा गोद लेने के लिए उपलब्ध नहीं
बच्चे को गोद लेने के इच्छुक परिवार बढ़ने के बावजूद बच्चों की उपलब्धता सीमित है। संस्थान में रहने वाला हर बच्चा तत्काल दत्तक ग्रहण के लिए उपलब्ध नहीं होता। कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही बच्चे को दत्तक ग्रहण के लिए कानूनी रूप से मुक्त घोषित किया जाता है। इसके अलावा बच्चे की उम्र और स्वास्थ्य को लेकर परिवारों की प्राथमिकताएं भी प्रतीक्षा अवधि को प्रभावित करती हैं।
महाराष्ट्र सबसे आगे, एमपी नौवें नंबर पर
वर्ष 2025-26 में महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 792 बच्चों को गोद लिया गया। गुजरात में 547, तमिलनाडु में 501, कर्नाटक में 377, ओडिशा में 308, तेलंगाना में 307, पश्चिम बंगाल में 237 और उत्तर प्रदेश में 231 बच्चों को परिवार मिला। मध्य प्रदेश 221 बच्चों के साथ नौवें स्थान पर रहा। राजस्थान 172 दत्तक ग्रहण के साथ दसवें स्थान पर रहा।
यह भी पढ़ें-गणेश विसर्जन आज: भोपाल में 1500 झांकियों के साथ निकलेगा चल समारोह, रात तक बदली रहेगी ट्रैफिक व्यवस्था
ऑनलाइन पंजीयन से शुरू होती है प्रक्रिया
बच्चा गोद लेने के इच्छुक परिवार कारा के पोर्टल पर ऑनलाइन पंजीयन करते हैं। इसके बाद जरूरी दस्तावेज जमा किए जाते हैं। संस्था की ओर से परिवार का होम वेरिफिकेशन किया जाता है। इसमें परिवार की आर्थिक, भावनात्मक और चिकित्सकीय स्थिति की जांच शामिल होती है। रिपोर्ट के आधार पर परिवार प्रतीक्षा सूची में आता है और तय प्रक्रिया के तहत बच्चे का दत्तक ग्रहण होता है। रिश्तेदार के बच्चे को गोद लेने के मामले में भी अब निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होता है। मिशन वात्सल्य के माध्यम से रिलेटिव अडॉप्शन की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा पुनर्विवाह के मामलों में सौतेले पिता या माता के जरिए बच्चे को कानूनी रूप से गोद लेने का प्रावधान भी है।
विदेश भेजने से पहले भारत में परिवार तलाशने की कोशिश
विदेशी दत्तक ग्रहण के मामलों में एनआरआई, विदेशी नागरिक और ओसीआई श्रेणी के परिवार शामिल होते हैं। पहले कोशिश होती है कि बच्चे को भारत में ही परिवार मिले। विशेष जरूरत या चिकित्सकीय समस्या वाले बच्चों के मामले में भी पहले देश में ही परिवार तलाशने की कोशिश की जाती है। भारत में परिवार नहीं मिलने पर तय प्रक्रिया के तहत अंतरराष्ट्रीय दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
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बेटियों को अपनाने में भी बढ़ी परिवारों की दिलचस्पी
सामाजिक कार्यकर्ता प्रीति साहू के मुताबिक पहले कई परिवार सिर्फ बेटे को गोद लेने की इच्छा रखते थे, लेकिन अब बेटियों को लेकर भी परिवार आगे आ रहे हैं। कारा के पंजीयन में परिवारों को लड़की, लड़का या कोई पसंद नहीं का विकल्प मिलता है। उन्होंने बताया कि कई ऐसे परिवार भी हैं, जिनके यहां पहले से एक बेटा है और वे परिवार पूरा करने के लिए बेटी को गोद लेना चाहते हैं। वहीं, ऐसे दंपती भी हैं जिनके बच्चे नहीं हैं और वे बेटी को अपनाने की इच्छा लेकर आ रहे हैं।
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परिवार बढ़े तो लंबी हुई बच्चों की प्रतीक्षा
बच्चे को गोद लेने के इच्छुक परिवारों की संख्या बढ़ने के साथ प्रतीक्षा अवधि भी लंबी हो गई है। प्रीति साहू के अनुसार नए पंजीयन के बाद प्रतीक्षा सूची में करीब 1500 के आसपास परिवार हो सकते हैं। छोटे बच्चों के लिए कई मामलों में परिवारों को ढाई से तीन साल, साढ़े तीन साल और कुछ मामलों में चार साल तक इंतजार करना पड़ रहा है। मातृ छाया सेवा भारती के अनुसार, पहले पंजीयन के बाद करीब एक से डेढ़ साल में बच्चा मिल जाता था, लेकिन अब इच्छुक परिवारों की संख्या बढ़ने से कई मामलों में ढाई से तीन साल तक इंतजार करना पड़ रहा है।
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संस्थान में रहने वाला हर बच्चा गोद लेने के लिए उपलब्ध नहीं
बच्चे को गोद लेने के इच्छुक परिवार बढ़ने के बावजूद बच्चों की उपलब्धता सीमित है। संस्थान में रहने वाला हर बच्चा तत्काल दत्तक ग्रहण के लिए उपलब्ध नहीं होता। कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही बच्चे को दत्तक ग्रहण के लिए कानूनी रूप से मुक्त घोषित किया जाता है। इसके अलावा बच्चे की उम्र और स्वास्थ्य को लेकर परिवारों की प्राथमिकताएं भी प्रतीक्षा अवधि को प्रभावित करती हैं।
महाराष्ट्र सबसे आगे, एमपी नौवें नंबर पर
वर्ष 2025-26 में महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 792 बच्चों को गोद लिया गया। गुजरात में 547, तमिलनाडु में 501, कर्नाटक में 377, ओडिशा में 308, तेलंगाना में 307, पश्चिम बंगाल में 237 और उत्तर प्रदेश में 231 बच्चों को परिवार मिला। मध्य प्रदेश 221 बच्चों के साथ नौवें स्थान पर रहा। राजस्थान 172 दत्तक ग्रहण के साथ दसवें स्थान पर रहा।
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ऑनलाइन पंजीयन से शुरू होती है प्रक्रिया
बच्चा गोद लेने के इच्छुक परिवार कारा के पोर्टल पर ऑनलाइन पंजीयन करते हैं। इसके बाद जरूरी दस्तावेज जमा किए जाते हैं। संस्था की ओर से परिवार का होम वेरिफिकेशन किया जाता है। इसमें परिवार की आर्थिक, भावनात्मक और चिकित्सकीय स्थिति की जांच शामिल होती है। रिपोर्ट के आधार पर परिवार प्रतीक्षा सूची में आता है और तय प्रक्रिया के तहत बच्चे का दत्तक ग्रहण होता है। रिश्तेदार के बच्चे को गोद लेने के मामले में भी अब निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होता है। मिशन वात्सल्य के माध्यम से रिलेटिव अडॉप्शन की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा पुनर्विवाह के मामलों में सौतेले पिता या माता के जरिए बच्चे को कानूनी रूप से गोद लेने का प्रावधान भी है।
विदेश भेजने से पहले भारत में परिवार तलाशने की कोशिश
विदेशी दत्तक ग्रहण के मामलों में एनआरआई, विदेशी नागरिक और ओसीआई श्रेणी के परिवार शामिल होते हैं। पहले कोशिश होती है कि बच्चे को भारत में ही परिवार मिले। विशेष जरूरत या चिकित्सकीय समस्या वाले बच्चों के मामले में भी पहले देश में ही परिवार तलाशने की कोशिश की जाती है। भारत में परिवार नहीं मिलने पर तय प्रक्रिया के तहत अंतरराष्ट्रीय दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
