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स्वतंत्रता सेनानी की दर्द भरी दास्तां: जो अंग्रेजों से न हारा, उसे देश की सरकार ने हरा दिया

Sat, 14 Aug 2021 11:12 AM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Sat, 14 Aug 2021 11:12 AM IST
सार

स्वतंत्रता सेनानी स्व. द्वारका प्रसाद वर्मा भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल में रहे थे। लेकिन, जब देश आजाद हुआ तो सरकार से पेंशन पाने के लिए वह भटकते रहे। परेशान होकर 2002 में उन्होंने खुद काे आग के हवाले कर लिया। 

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Painful tale of freedom fighter The government of the country defeated the one who did not lose to the British
स्व. द्वारका प्रसाद की पत्नी चंपावती - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

देश की स्वतंत्रता के लिए स्व. द्वारका प्रसाद वर्मा जेल गए थे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान दस दिन तक सलाखों में रहे। यातनाएं सहीं। भूखे-प्यासे आजादी का सपना संजोते रहे। लेकिन, उन्होंने कभी अंग्रेजों के आगे हार नहीं मानी। 

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जब देश आजाद हुआ तो उन्हें लगा कि शायद उनके संघर्षों पर विराम लगेगा। लेकिन, देश की सरकार उनको उनके हक की पेंशन तक न दे पायी। वे दर-दर भटकते रहे। गुहार लगाते रहे। लेकिन, जब कुछ न हुआ तो अंग्रेजों से हार न मानने वाला यह सेनानी खुद की सरकार से हार गया और खुद को आग के हवाले कर दिया। 
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बैतूल में मवेशी चराकर गुजारा कर रहीं पत्नी 
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी द्वारका प्रसाद वर्मा की पत्नी चंपाबाई अब मध्यप्रदेश के बैतूल में एक झोपड़ी में रहती हैं। उनका गुजारा दूसरों के मवेशी चराकर होता है। जैसे-तैसे दो वक्त की रोटी मिल जाती है, उसी से उनका पेट भी भर जाता है। वह बताती हैं कि पेंशन के लिए उनके पति बहुत दौड़े। लेकिन, जब उन्हें कोई उम्मीद न दिखी तो 2002 में खुद को आग के हवाले करके उन्होंने आत्महत्या कर ली। दो बेटे थे, उन्होंने भी किनारा कर लिया। इसके बाद भी सरकार ने उनपर ध्यान नहीं दिया। 
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मदद के नाम पर थमा दिया बस का फ्री पास 
चंपाबाई कहती हैं कि उन्हें मदद के नाम पर बस का पास थमा दिया गया था। लेकिन, उसका क्या करें, यह समझ नहीं आता। वह बताती हैं कि हर राष्ट्रीय पर्व पर उन्हें आमंत्रित किया तो जाता है। लेकिन, इसके बाद सरकार हाल पूछना भी भूल जाती है। 

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