MP Election 2023: BJP का मजबूत गढ़ रहा है विंध्य, जानिए इस बार किसके सामने क्या हैं चुनौतियां
प्रदेश की राजनीति में विंध्य इलाके का अलग ही मिजाज रहा है। यहां की 30 सीटों में से 24 पर भाजपा का कब्जा है। ब्राह्मण, आदिवासियों का वर्चस्व है, वहीं ओबीसी वर्ग भी सियासत पलटने का माद्दा रखता है। लेकिन अब भाजपा अपने मजबूत गढ़ को बचाने की चुनौती देख रही है।
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विस्तार
मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। आज से 38 दिन बाद यानी 17 नवंबर को सरकार का भविष्य लिखा जाएगा। प्रदेश की राजनीति में विंध्य इलाके का अलग ही मिजाज रहा है। इसे भाजपा का गढ़ माना जाता है। बीते चार चुनाव के आंकड़े भी इसकी गवाही देते हैं। यहां की 30 सीटों में से 24 पर भाजपा का कब्जा है। यहां जातिगत राजनीति प्रभावी रहती है। इस इलाके में ब्राह्मण, आदिवासियों का वर्चस्व है। ओबीसी वर्ग भी सियासत पलटने का माद्दा रखता है। हालांकि, इस बार भाजपा के सामने गढ़ बचाने की चुनौतियां हैं। इस रिपोर्ट में जानते हैं कि आखिर क्या हैं वह कारण, जो भाजपा के लिए चुनौती बने हुए हैं।
जहां कांग्रेस और बीजेपी दोनों की राजनीति के केंद्र विंध्य में अपना पूरा जोर लगा रही हैं तो अन्य दलों का प्रभाव भी इस चुनाव में असर डालेगा। तेजी से आगे बढ़ रही आम आदमी पार्टी पर सबकी नजरें रहेंगी। बसपा-सपा भी अपनी खोई जमीन तलाश रही हैं। इलाका वैसे तो पिछले कई चुनावों से भाजपा का गढ़ बना हुआ है। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिलने के बाद भी पार्टी यहां ज्यादा सीटें नहीं जीत सकी थी।
विंध्य की सियासत का मिजाज
सबसे पहले जानते हैं कि विंध्य का सियासी मिजाज कैसा है। इस इलाके में जातिगत समीकरण हावी है। ब्राह्मण, ओबीसी और गौंड समुदाय का दबदबा है। विंध्य में सतना, रीवा, सीधी, शहडोल, अनुपपूर, सिंगरौली, उमरिया जिले आते हैं। बीते चार चुनावों की बात करें तो भाजपा ही यहां मजबूत स्थिति में नजर आती है। यहां 30 विधानसभा सीटें आती हैं। 2003 के चुनाव में 28 में से 18 सीटें भाजपा के खाते में थीं। 2008 में भाजपा ने 24 सीटों पर कब्जा जमाया था, 2013 के चुनावों में थोड़े कमजोर प्रदर्शन के साथ 17 सीटें हासिल की थीं तो 2018 के चुनावों में यहां से भाजपा ने फिर 24 सीटें जीती थीं। 2018 में कांग्रेस ने भले सरकार बना ली हो पर इस इलाके में उसे यहां से मात्र 6 सीटें मिली थी, जबकि 2013 में उसके पास 11 सीटें थीं। इस क्षेत्र में बहुजन समाज पार्टी का भी अच्छा खासा दबदबा है। कई बार बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस का खेल बिगाड़ने का काम किया है। हाल ही हुए नगरीय निकाय चुनाव में कांग्रेस ने रीवा महापौर सीट पर कब्जा जमा लिया। सिंगरौली सीट पर आम आदमी पार्टी काबिज हो गई। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने डैमेज कंट्रोल करने के लिए सतना जिले के मैहर को जिला बनाने की घोषणा की। विंध्य के ही मऊगंज को जिला बनाया जा चुका है।
विंध्य में जातिवार वोटरों का गणित
रीवा में ब्राह्मण वोटर ज्यादा हैं। 34 प्रतिशत ब्राह्मणों के साथ 26 फीसदी ओबीसी प्रभाव डालेंगे। सतना में पिछड़ा वर्ग के मतदाता सर्वाधिक हैं। यहां ओबीसी 23 प्रतिशत हैं, तो सवर्ण 22 प्रतिशत। सीधी में ओबीसी वोटर का प्रतिशत 27 है और इसके बाद ब्राह्मण (18%) आते हैं। सिंगरौली में 25 फीसदी पिछड़ा वर्ग हैं, तो 24 प्रतिशत आबादी के साथ आदिवासी दूसरे नंबर पर हैं। शहडोल में आदिवासी सबसे ज्यादा हैं। यहां 43 प्रतिशत मतदाता आदिवासी हैं। इसके बाद 21 प्रतिशत ओबीसी वोटर हैं। अनूपपुर में 34 प्रतिशत वोटर आदिवासी तो 24 प्रतिशत ओबीसी हैं। उमरिया में 45 प्रतिशत आदिवासी वोटर हैं और 22 प्रतिशत वोटर पिछड़ा वर्ग से आते हैं। पूरे विंध्य इलाके में रीवा में सबसे ज्यादा सवर्ण (34%) तो सिंगरौली में सबसे कम वोटर सामान्य वर्ग (9%) से हैं। पिछड़ा वर्ग की बात करें तो सबसे ज्यादा आदिवासी वोटर (27%) सीधी में हैं तो सबसे कम शहडोल (21%) में। आदिवासी वोटर (45%) उमरिया में सबसे अधिक हैं तो सतना (12%) में सबसे कम। दलित मतदाता (17%) सतना में सर्वाधिक हैं तो अनूपपुर (8%) और उमरिया (8%) में सबसे कम।
BJP के सामने यह हैं चुनौतियां
1. कद्दावर नेताओं की अनदेखी
विंध्य के कद्दावर नेताओं की अनदेखी हुई है। संतुलन नहीं बन पाने की वजह से इलाके में भाजपा उपचुनाव और मेयर चुनाव हार गई। विंध्य प्रदेश की मांग उठा रहे मैहर के भाजपा विधायक नारायण त्रिपाठी का टिकट कट गया है। नारायण त्रिपाठी बगावत करते हुए अलग पार्टी बनाने और सभी 30 सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान कर चुके हैं। भाजपा ने सीधी सीट से कद्दावर और सबसे मजबूत नेता केदारनाथ शुक्ला का टिकट काट दिया, जिसे लेकर वह भी बगावत की मशाल थाम रहे हैं।
2. कांग्रेस का बढ़ता फोकस
विंध्य इलाका भले ही अब भाजपा का गढ़ हो पर किसी जमाने में कांग्रेस का यहां दबदबा था। 2018 के बाद से ही यहां कांग्रेस ने फोकस बढ़ा दिया है। विंध्य इलाके को कांग्रेस ने चुनौती के तौर पर लिया और पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह ने घर वापसी अभियान चलाकर पुराने कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया। करीब एक साल पहले से अजय सिंह राहुल जमीनी स्तर पर रणनीति बनाने में जुटे हैं। पिछड़ा वर्ग को साधने के लिए पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल को सेंट्रल वर्किंग कमेटी सहित चुनाव संबंधी सभी महत्वपूर्ण समितियों में शामिल करके सियासी संदेश दिया। विंध्य क्षेत्र में कांग्रेस ने दो जनआक्रोश यात्रा निकालकर भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने की हरसंभव कोशिश की है। अब राहुल गांधी की जनसभा के जरिए सियासी समीकरण साधने की कोशिश की है। सीधी के पेशाब कांड के बाद आदिवासियों और ब्राह्मणों की नाराजगी का फायदा उठाने की कोशिश हो रही है। राहुल की आदिवासी इलाके ब्यौहारी में सभा कराई गई, ताकि आदिवासियों को साधा जा सके।
3. सीधी पेशाब कांड
विंध्य इलाके के सीधी जिले का बहुचर्चित पेशाब कांड भी इस चुनाव में असर डाल सकता है। सूबे के शहडोल जिले में आदिवासी वोटर बड़ी संख्या में है। आदिवासी पर भाजपा नेता द्वारा पेशाब करने के मामले को लेकर कांग्रेस हमलावर रही है। हालांकि, भाजपा ने डैमेज कंट्रोल करने की भरसक कोशिश भी की है। मुख्यमंत्री शिवराज ने पीड़ित को सीएम हाउस बुलाकर पैर तक धोए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यहां सभा कर चुके हैं। आदिवासी बहुल इलाके में ये कितना कारगर रहा, ये वक्त ही बताएगा। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि चुनाव में इसका असर पड़ेगा।
4. ब्राह्मणों की नाराजगी दूर करने की कोशिश
सीधी पेशाब कांड के डैमेज कंट्रोल में भाजपा ने खुद को आदिवासियों का हितैषी बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी। शिवराज सरकार ने सीधी कांड के आरोपी के घर पर बुलडोजर चलवा दिया। माना जा रहा है कि इससे ब्राह्मण समाज नाराज हुआ। इलाके की 18 सीटें सामान्य कोटे से हैं, इसलिए भाजपा ब्राह्मणों की नाराजगी साधने की कोशिश कर रही है। पार्टी ने चुनाव से तीन महीने पहले इलाके के राजेंद्र शुक्ल को मंत्री पद देकर ब्राह्मण समाज को साधने की कोशिश की। गिरीश गौतम को विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया था। इस तरह इस क्षेत्र के ब्राह्मणों को खुश करने की कोशिश की जा रही है। दिक्कत ये है कि इस कसरत से राजपूत समाज नाराज़ हो गया तो विंध्य में ब्राह्मण बनाम राजपूत के वर्चस्व की लड़ाई भी देखने को मिल सकती है।
5. तीसरे फ्रंट की बढ़ती ताकत
विंध्य क्षेत्र से आम आदमी पार्टी (आप) ने नगरीय निकाय चुनाव में सिंगरौली के महापौर का चुनाव जीत कर एंट्री कर ली। अब पार्टी सिंगरौली, सतना और रीवा में आक्रामक तरीके से प्रचार कर रही है। अरविंद केजरीवाल, भगवंत मान लगाातार इलाके पर नजर जमाए हुए हैं। 10 अक्टूबर को मान की सभा भी है। आम आदमी पार्टी भाजपा कार्यकर्ताओं की नाराजगी का फायदा उठाने की कोशिश में है। इसके अलावा यहां निर्दलीय प्रत्याशी भी खासा प्रभाव डालते हैं। 2008 के चुनावों में सूबे की तीन सीटें निर्दलीयों के खाते में गई थी, वहीं 2013 में दो सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी जीते थे। उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे इलाकों में बसपा भी सक्रिय है। 2008 में एक सीट जीतने के बाद बसपा भले ही जीत न पाई हो, त्रिकोणीय मुकाबलों की वजह जरूर रही है।
