मियां भोपाली के झोले-बतोले: अफसरी छोड़ सियासत की पिच पे बेटिंग के ख्वाहिशमंद ये अफसर...!
मध्यप्रदेश के एक और आईएएस अफसर ने राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐलान किया है। इस घटना को मियां भोपाली ने अपने अलग ही अंदाज में देखा और पेश किया।
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को खां, अपने मधपिरदेश में आजकल अफसरों को सियासी पार्टी बनाने का शोक चर्रा रिया हे। हाल में एक ओर आला अफसर ने नोकरी से ताबड़तोड़ इस्तीफा देके अपनी नई सियासी पार्टी बनाने का एलान कर डाला। ये पार्टी कित्ती चलेगी, पब्लिक उसे कित्ती घास डालेगी, ये तो वक्त बताएगा मगर इस्तीफा देने वाले साहब में जोश भोत हे ओर उम्मीदें भी। वो अफसर का चोला उतार के नेता के अवतार में आना चाह रिए हें। अलबत्ता इस हिंदुस्तान की तारीख में सिरफ दो मामले ई ऐसे रिए हें के जब सरकारी मुलाजमत से इ्स्तीफा देके सियासी अखाड़े में कूदे अफसर नेता बनने में कामयाब रिए हों।
मियां, यूं तो मधपिरदेश में अफसरों के बीच नोकरी में इस्तीफा देने का सिलसिला पुराना हेगा। सरकारी हुकम बजाते-बजाते अचानक कोई अफसर को इलहाम होता हेगा के उसे इस गुलामी से आजाद होके खुद का नया आशियाना बनाना चाहिए। एसे में हर साल दो- चार अफसर नोकरी को अलविदा के रिए हें। पिछले महीने एक सीनीयर आईएएस अफसर वरदमूर्ति मिशरा ने ताबड़तोड़ रिटायमेंट की अर्जी लगाई। इस्तीफे में देरी न हो, इसके लिए तीन माह की तनख्वाह भी एडवांस जमा करवा दी ओर दफ्तर जाना भी बंद कर दिया। केते हें के साहब पिरदेश की सरकार के रवैए से नाखुश थे। उन्होंने सरकार पर सीधा इल्जाम लगाया के वो झूठे आंकड़ों पर अपनी सियासत कर रई हे। पिरदेश का विकास रूक गया हे। हालांकि अपने इस्तीफे की वजह जनाब ने ‘निजी’ बताई। वैसे मिशरा जी एमपीपीएससी से सलेक्ट होके आए थे और इसी साल उन्हें आईएएस मिली थी। लेकिन उनका मन ऊब गया। मिशराजी ने इस्तीफे का असल राज बताते हुए पत्ते खोले के वो अब फुल टाइम सियासत करना चाहते हैं। इसी मकसद से नई पार्टी बनाने जा रिए हेंगे, जिसका एलान खां, जल्द होगा। जनाब की तमन्ना अब आम आदमी की खातिर लड़ने की हेगी।
मिशराजी अपने नेक मकसद में कित्ते कामयाब होंगे, ये या तो वो खुद जानते हेंगे या फिर खुदा जानता हेगा। क्योंकि अफसर का सियासतदान में तब्दील होना कीमती पत्थर को हीरे में बदलने जेसा हे। मियां, इस मुल्क में पेले भी कई अफसरों ने नेता बनने की चाहत में मुलाजिमत छोड़ी ओर किसी पार्टी में शुमार हो गए या फिर खुद की पार्टी बना ली। मगर राजनीति के ऐसे अलग आशियाने टिकते बाज दफा ई हें। हिंदुस्तान की बीते डेढ़ सो साल की तारीख में केवल दो मोके ऐसे रिए के जब कोई माजी अफसर ने सियासी पार्टी बनाई ओर वो चली भी। पेली मिसाल अंगरेजी राज में आईसीएस अफसर ए.ओ. ह्यूम की मिलती हे, जिन्होंने नोकरी छो़ड़ने के बाद इंडियन नेताओं के साथ मिलकर 1885 में कांग्रेस पार्टी बनाई,जो 137 साल बाद भी कायम हेगी। ह्यूम साहब शुरू में कुछ साल कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी भी रिए थे। उसके बाद कुछ अोर अफसरों ने गाहे बगाहे अपना अलग आशियाना बनाने की तर्ज पे छोटी मोटी सियासी पार्टियां बनाईं, लेकिन वक्त के धारे में वो सब गुम हो गईं।
उसके बाद 21वीं सदी में अरविंद केजरीवाल वाहिद एसे माजी सरकारी अफसर हेंगे, जिन्होंने भिरष्टाचार के मुद्दे पर दिल्ली में ‘आम आदमी पार्टी’ बनाई ओर महज दस साल में ये पार्टी अब दो सूबों में सत्तनशीन हेगी। खुद केजरीवाल तीसरी दफा दिल्ली पिरदेश के मुखमंतरी हेंगे। नोकरी छोड़ सियासत में आने वाले एक ओर कामयाब अफसर अजीत जोगी थे। वो कलेक्टरी से इस्तीफा देके कांगरेस में शामिल हो गए थे ओर बाद में नए बने छत्तीसगढ़ सूबे के मुखमंतरी भी बन गए। लेकिन कुर्सी से हटने ओर कांग्रेस से पंगा होने के बाद जोगी साहब ने अपनी ‘छत्तीसगढ़ कांग्रेस’ बनाई मगर उनकी दुकान पिट गई। उनकी मोत के बाद छत्तीसगढ़ कांग्रेस के छत्तीस नामलेवा भी नई बचे। इसी तरह जम्मू-कश्मीर में एक आईएएस टाॅपर रिए शाह फेजल ने ‘जम्मू एंड कशमीर मूवमेंट’ नाम की पार्टी लांच करी थी। दावा था के वो इसके जरिए सूबे की हवा बदलेंगे। मगर सूबा की हवा बदलती इसके पेशतर पार्टी की हवा निकल गई ओर जनाब वापस नोकरी में लोट आए, क्योंकि उनका इस्तीफा सरकार ने मंजूर नई करा था।
यूं नोकरी से इस्तीफे तो एमपी के दूसरे अफसर देते रिए हें। छह साल पेले एक काबिल आईएएस अफसर पिरवेश शर्मा ने सरकारी मुलाजिमत को अलविदा के दिया ओर खुद का ‘सब्जीवाला’ स्टार्ट अप चालू करा। पिरदेश के एक ओर आईएएस रोमन सैनी ने महज आठ साल की नोकरी के बाद खुद की अनएकेडेमी नाम की वेबसाइट शुरू करी। उनके पेले स्वरणमाला रावला, धीरज माथुर, गोरी सिंह ने भी रिटारमेंट के पेले नोकरी से इस्तीफा दिया ओर आराम से घर बेठ गए। अब देखना ये हे खां, के अपने मिशराजी सियासत के पिच पे कितनी कामयाब बेटिंग कर पाते हें।
. - बतोलेबाज
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