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Bhopal: आरजीपीवी के बाद अब बरकतउल्ला सवालों के घेरे में, प्रशासनिक खींचतान से प्रवेश, परीक्षा और पढ़ाई पर संकट
Fri, 24 Jul 2026 07:47 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
Published by: Sandeep Kumar Tiwari
Updated Fri, 24 Jul 2026 07:47 PM IST
सार
बरकतउल्ला विश्वविद्यालय भी प्रशासनिक अस्थिरता, बदलते फैसलों और लगातार बढ़ते विवादों के कारण चर्चा में है। पूर्व कुलगुरु प्रो. एसके जैन के इस्तीफे के बाद प्रभारी कुलगुरु प्रो. विवेक शर्मा भी पद छोड़ चुके हैं। बीएड कॉलेजों की संबद्धता, बीबीए-एमबीए प्रवेश, काउंसलिंग और बीएड परीक्षाओं से जुड़े विवादों ने हजारों विद्यार्थियों का भविष्य अधर में डाल दिया है।
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बीयू भोपाल
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मध्यप्रदेश में उच्च शिक्षा व्यवस्था लगातार सवालों के घेरे में है। राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (आरजीपीवी) के बाद अब राजधानी का बरकतउल्ला विश्वविद्यालय भी विवादों, प्रशासनिक अस्थिरता और बदलते फैसलों के कारण सुर्खियों में है। पिछले डेढ़ महीने में विश्वविद्यालय में दो कुलगुरु बदलने से लेकर बीएड कॉलेजों की संबद्धता, बीबीए-एमबीए प्रवेश प्रक्रिया, परीक्षाओं और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर जिस तरह के घटनाक्रम सामने आए हैं, उसने हजारों विद्यार्थियों के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालात ऐसे बने कि उच्च शिक्षा विभाग को सीधे हस्तक्षेप करना पड़ा और अब विश्वविद्यालय की कमान अपर मुख्य सचिव (उच्च शिक्षा) अनुपम राजन को सौंपनी पड़ी है।
एसके जैन के कार्यकाल से शुरू हुआ विवादों का सिलसिला
बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में मौजूदा संकट की पृष्ठभूमि पूर्व कुलगुरु प्रो. एसके जैन के कार्यकाल में ही तैयार हो गई थी। विश्वविद्यालय में परीक्षा संबंधी अनियमितताओं, प्रशासनिक फैसलों, संविदा शिक्षकों की नियुक्ति और अन्य मामलों को लेकर लगातार विवाद सामने आते रहे। इन मुद्दों को लेकर छात्र संगठनों और शिक्षकों ने विरोध प्रदर्शन किए। मामला उच्च शिक्षा विभाग तक पहुंचा और विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे। बढ़ते विवादों के बीच उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार स्वयं विश्वविद्यालय पहुंचे थे। उन्होंने अधिकारियों, शिक्षकों और छात्र प्रतिनिधियों से चर्चा कर व्यवस्थाओं में सुधार के निर्देश दिए थे। इसके कुछ समय बाद प्रो. एसके जैन ने कुलगुरु पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे के बाद 19 जून को प्रो. विवेक शर्मा को प्रभारी कुलगुरु बनाया गया, लेकिन वे भी एक महीने के भीतर पद छोड़ने को मजबूर हो गए। राजभवन ने गुरुवार को प्रो. विवेक शर्मा का इस्तीफा स्वीकार कर लिया। उन्होंने व्यक्तिगत और स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए पद छोड़ा था। नियमित कुलगुरु की नियुक्ति तक अनुपम राजन विश्वविद्यालय के कुलगुरु का दायित्व संभालेंगे। लगातार दो कुलगुरुओं के कार्यकाल विवादों के बीच समाप्त होने से विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
एक महीने में फैसले बदले, बढ़ता गया विवाद
प्रो. विवेक शर्मा के कार्यकाल में सबसे बड़ा विवाद बीएड कॉलेजों की संबद्धता और निरंतरता को लेकर सामने आया। कार्यपरिषद ने पहले हलफनामे के आधार पर कई कॉलेजों को सशर्त निरंतरता देने का निर्णय लिया, लेकिन बाद में कुछ कॉलेजों में गंभीर अनियमितताओं की शिकायतें आने पर फैसला बदल दिया गया। मामला राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) तक पहुंचा, जहां जांच शुरू हो चुकी है। इसके बाद बीबीए और एमबीए कॉलेजों की प्रवेश प्रक्रिया भी विवादों में आ गई। आरोप लगे कि कार्यपरिषद की अंतिम मंजूरी से पहले ही कॉलेजों की सूची तकनीकी शिक्षा संचालनालय को भेज दी गई। बाद में निर्णय बदलने से 71 कॉलेज पहले चरण की काउंसलिंग से बाहर हो गए, जिससे 19,260 सीटों पर प्रवेश प्रभावित हुआ और हजारों विद्यार्थी असमंजस में पड़ गए।
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बीएड परीक्षा पर भी संशय
विश्वविद्यालय की परेशानियां यहीं खत्म नहीं हो रही हैं। 27 जुलाई से प्रस्तावित बीएड परीक्षाओं को लेकर भी संशय की स्थिति बनी हुई है। सूत्रों के अनुसार, उत्तरपुस्तिकाओं की छपाई का काम समय पर पूरा नहीं हो पाया है। यदि समय पर छपाई और वितरण नहीं हुआ तो परीक्षा कार्यक्रम में बदलाव करना पड़ सकता है। हालांकि विश्वविद्यालय की ओर से अब तक इस पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है।
प्रशासनिक दबाव और बढ़ते सवाल
हालांकि प्रो. विवेक शर्मा ने इस्तीफे की वजह स्वास्थ्य और व्यक्तिगत कारण बताए हैं, लेकिन विश्वविद्यालय से जुड़े सूत्रों का कहना है कि लगातार बढ़ते विवाद, संबद्धता के मामले, कार्यपरिषद के बदलते फैसले और प्रवेश प्रक्रिया को लेकर पैदा हुई स्थिति के कारण प्रशासनिक दबाव लगातार बढ़ रहा था। कुलगुरु कार्यपरिषद के अध्यक्ष भी होते हैं, इसलिए अंतिम जिम्मेदारी भी उन्हीं पर आती है। बीएड कॉलेजों का मामला प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंचने और एनसीटीई की जांच शुरू होने के बाद स्थिति और संवेदनशील हो गई। इसी दौरान कुछ कॉलेजों को औपचारिक मंजूरी से पहले प्रवेश प्रक्रिया में शामिल करने और कुछ को बाहर रखने के आरोप भी लगे। संविदा शिक्षकों की नियुक्ति जैसे मुद्दों ने भी विवाद को और बढ़ाया।
यह भी पढ़ें-जेपी अस्पताल में बवाल: 21 कर्मचारियों को नौकरी से निकाला, दी आत्मदाह की चेतावनी, अस्पताल की व्यवस्था चरमराई
विद्यार्थियों का भविष्य सबसे ज्यादा प्रभावित
बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में लगातार बदलते फैसलों का सबसे बड़ा असर विद्यार्थियों पर पड़ा है। कहीं प्रवेश अटका है, कहीं काउंसलिंग रुकी हुई है और अब परीक्षाओं पर भी अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। आरजीपीवी के बाद प्रदेश के एक और बड़े विश्वविद्यालय में सामने आए घटनाक्रम यह संकेत दे रहे हैं कि यदि विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं की गई तो इसका सीधा असर उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और लाखों विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ेगा।
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एसके जैन के कार्यकाल से शुरू हुआ विवादों का सिलसिला
बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में मौजूदा संकट की पृष्ठभूमि पूर्व कुलगुरु प्रो. एसके जैन के कार्यकाल में ही तैयार हो गई थी। विश्वविद्यालय में परीक्षा संबंधी अनियमितताओं, प्रशासनिक फैसलों, संविदा शिक्षकों की नियुक्ति और अन्य मामलों को लेकर लगातार विवाद सामने आते रहे। इन मुद्दों को लेकर छात्र संगठनों और शिक्षकों ने विरोध प्रदर्शन किए। मामला उच्च शिक्षा विभाग तक पहुंचा और विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे। बढ़ते विवादों के बीच उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार स्वयं विश्वविद्यालय पहुंचे थे। उन्होंने अधिकारियों, शिक्षकों और छात्र प्रतिनिधियों से चर्चा कर व्यवस्थाओं में सुधार के निर्देश दिए थे। इसके कुछ समय बाद प्रो. एसके जैन ने कुलगुरु पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे के बाद 19 जून को प्रो. विवेक शर्मा को प्रभारी कुलगुरु बनाया गया, लेकिन वे भी एक महीने के भीतर पद छोड़ने को मजबूर हो गए। राजभवन ने गुरुवार को प्रो. विवेक शर्मा का इस्तीफा स्वीकार कर लिया। उन्होंने व्यक्तिगत और स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए पद छोड़ा था। नियमित कुलगुरु की नियुक्ति तक अनुपम राजन विश्वविद्यालय के कुलगुरु का दायित्व संभालेंगे। लगातार दो कुलगुरुओं के कार्यकाल विवादों के बीच समाप्त होने से विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
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एक महीने में फैसले बदले, बढ़ता गया विवाद
प्रो. विवेक शर्मा के कार्यकाल में सबसे बड़ा विवाद बीएड कॉलेजों की संबद्धता और निरंतरता को लेकर सामने आया। कार्यपरिषद ने पहले हलफनामे के आधार पर कई कॉलेजों को सशर्त निरंतरता देने का निर्णय लिया, लेकिन बाद में कुछ कॉलेजों में गंभीर अनियमितताओं की शिकायतें आने पर फैसला बदल दिया गया। मामला राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) तक पहुंचा, जहां जांच शुरू हो चुकी है। इसके बाद बीबीए और एमबीए कॉलेजों की प्रवेश प्रक्रिया भी विवादों में आ गई। आरोप लगे कि कार्यपरिषद की अंतिम मंजूरी से पहले ही कॉलेजों की सूची तकनीकी शिक्षा संचालनालय को भेज दी गई। बाद में निर्णय बदलने से 71 कॉलेज पहले चरण की काउंसलिंग से बाहर हो गए, जिससे 19,260 सीटों पर प्रवेश प्रभावित हुआ और हजारों विद्यार्थी असमंजस में पड़ गए।
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बीएड परीक्षा पर भी संशय
विश्वविद्यालय की परेशानियां यहीं खत्म नहीं हो रही हैं। 27 जुलाई से प्रस्तावित बीएड परीक्षाओं को लेकर भी संशय की स्थिति बनी हुई है। सूत्रों के अनुसार, उत्तरपुस्तिकाओं की छपाई का काम समय पर पूरा नहीं हो पाया है। यदि समय पर छपाई और वितरण नहीं हुआ तो परीक्षा कार्यक्रम में बदलाव करना पड़ सकता है। हालांकि विश्वविद्यालय की ओर से अब तक इस पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है।
प्रशासनिक दबाव और बढ़ते सवाल
हालांकि प्रो. विवेक शर्मा ने इस्तीफे की वजह स्वास्थ्य और व्यक्तिगत कारण बताए हैं, लेकिन विश्वविद्यालय से जुड़े सूत्रों का कहना है कि लगातार बढ़ते विवाद, संबद्धता के मामले, कार्यपरिषद के बदलते फैसले और प्रवेश प्रक्रिया को लेकर पैदा हुई स्थिति के कारण प्रशासनिक दबाव लगातार बढ़ रहा था। कुलगुरु कार्यपरिषद के अध्यक्ष भी होते हैं, इसलिए अंतिम जिम्मेदारी भी उन्हीं पर आती है। बीएड कॉलेजों का मामला प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंचने और एनसीटीई की जांच शुरू होने के बाद स्थिति और संवेदनशील हो गई। इसी दौरान कुछ कॉलेजों को औपचारिक मंजूरी से पहले प्रवेश प्रक्रिया में शामिल करने और कुछ को बाहर रखने के आरोप भी लगे। संविदा शिक्षकों की नियुक्ति जैसे मुद्दों ने भी विवाद को और बढ़ाया।
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विद्यार्थियों का भविष्य सबसे ज्यादा प्रभावित
बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में लगातार बदलते फैसलों का सबसे बड़ा असर विद्यार्थियों पर पड़ा है। कहीं प्रवेश अटका है, कहीं काउंसलिंग रुकी हुई है और अब परीक्षाओं पर भी अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। आरजीपीवी के बाद प्रदेश के एक और बड़े विश्वविद्यालय में सामने आए घटनाक्रम यह संकेत दे रहे हैं कि यदि विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं की गई तो इसका सीधा असर उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और लाखों विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ेगा।
