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योगीराज@2.0 : जनता को अब सरकार के एजेंडे का इंतजार, चुनाव के दौरान तमाम समस्याओं को उठाया

Sat, 12 Mar 2022 12:16 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव महेंद्र तिवारी, अमर उजाला, लखनऊ
महेंद्र तिवारी, अमर उजाला, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Sat, 12 Mar 2022 12:16 PM IST
सार

छुट्टा गोवंश से फसलों का बड़ा नुकसान हो रहा है। योगी सरकार ने इस समस्या के समाधान के लिए बड़ी संख्या में गोवंश संरक्षण केंद्र खोले। सैकड़ों करोड़ के बजट जारी किए। पर, इस समस्या का समाधान नहीं हो पाया। किसान पूरी ठंड रात-रात जगकर फसल रखाते नजर आए।

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Yogiraj @ 2.0 : The public-janardan is waiting for the agenda of their government, farmers, youth, corruption and the conduct of MLAs have a direct effect on the elections.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। - फोटो : amar ujala

विस्तार

18 वीं विधानसभा के चुनाव में ऐतिहासिक जनादेश पाने के बाद योगी सरकार की दूसरी पारी शुरू होने वाली है। इसी के साथ नई पारी में काम की प्राथमिकताओं के एजेंडे पर भी माथापच्ची शुरू हो गई है। इसमें जनता से किए गए वादे तो होंगे ही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा चुनाव प्रचार के दौरान जनता के बीच से आने वाले मुद्दों के समाधान को लेकर की गई घोषणाएं भी होंगी। नई सरकार पर उन मुद्दों पर भी प्राथमिकता से काम की जिम्मेदारी है, जिन पर रणनीति के तहत चुप्पी साधे रखी गईं। कई मुद्दे ऐसे हैं जो चुनाव भर प्रत्याशियों से लेकर रणनीतिकारों व स्टार प्रचारकों को बेचैन किए रहे। पर, जनता ने कई वजहों से नाराजगी व्यक्त करने के बावजूद वोट दे दिया। प्रचंड जनादेश के साथ सत्ता में वापसी के बाद ऐसे मुददों की पुनरावृत्ति रोकने व उनके समाधान पर भी नजरें होंगी। इन मुद्दों की उपेक्षा अगले लोकसभा चुनाव में फिर चुनौती के रूप में सामने आ सकती है।  

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छुट्टा गोवंश की समस्या का समाधान हो सबसे बड़ी प्राथमिकता
छुट्टा गोवंश से फसलों का बड़ा नुकसान हो रहा है। योगी सरकार ने इस समस्या के समाधान के लिए बड़ी संख्या में गोवंश संरक्षण केंद्र खोले। सैकड़ों करोड़ के बजट जारी किए। पर, इस समस्या का समाधान नहीं हो पाया। किसान पूरी ठंड रात-रात जगकर फसल रखाते नजर आए। हालात ये रहे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी चुनावी सभाओं में इस समस्या के समाधान के लिए अपनी ओर से आश्वासन देना पड़ा। नतीजा ये हुआ कि आम किसानों ने मोदी की बात पर भरोसा किया और सरकार से नाराजगी के बावजूद भाजपा के पक्ष में वोट किया। इस मुददे पर सबसे प्राथमिकता पर काम कर समाधान करना होगा। मौजूदा व्यवस्था में पशुपालन विभाग के जरिए पशुओं को पकड़ने व रखरखाव की दोषपूर्ण व्यवस्था को खत्म कर जवाबदेह विभाग के जरिए समाधान का मैकेनिज्म डवलप करना होगा।
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समय से गन्ना मूल्य न मिले तो ब्याज दिलाने के वादे पर हो अमल
पश्चिम यूपी में विपक्षी दलों ने गन्ना मूल्य भुगतान में देरी का मुददा उठाया। सरकार ने हजारों करोड़ रुपये गन्ना मूल्य भुगतान के आंकड़े देकर इन आरोपों से पार पाने की कोशिश की। मगर, सच्चाई ये है कि 2017 के चुनाव संकल्प पत्र में 15 दिन के भीतर गन्ना मूल्य भुगतान व ऐसा न होने पर ब्याज दिलाने का वादा सरकार पूरा नहीं कर पाई। भाजपा ने इस बार घोषणा पत्र में 14 दिन में गन्ना मूल्य भुगतान न होने पर ब्याज दिलाने का वादा किया है। पार्टी नेताओं ने जगह-जगह किसानों को ये आश्वासन दिए हैं। नई सरकार को इस वादे पर प्राथमिकता से अमल करना चाहिए।
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एमएसपी पर फसल खरीद की अड़चनें हों दूर
न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसलों की बंपर खरीद हो रही है। मगर, खरीद प्रणाली में खामियों की वजह से किसानों को अभी भी उपज बेचने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। पूरे चुनाव में किसानों के बीच यह मुद्दा रहा। बड़ी संख्या में किसान यह शिकायत करते नजर आए कि उन्हें या तो किसी प्रभावशाली व्यक्ति की सिफारिश कराकर उपज बेचनी पड़ी या बाजार में कम मूल्य पर बेच देनी पड़ी। चुनाव के दौरान कई प्रगतिशील किसानों की ओर से धान की जगह चावल खरीद के विकल्प पर विचार का सुझाव आया है। इसकी व्यवहारिकता पर विचार किया जा सकता है। इससे स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर चावल तैयार करने वाली छोटी-छोटी मिलों को स्थापित करने का अवसर बढ़ेगा, जिससे बड़े स्तर पर रोजगार पैदा हो सकेगा।

भर्तियों में अभ्यर्थियों के मुद्दे
पूरे चुनाव बेरोजगारी का मुद्दा छाया रहा। खासकर सरकारी भर्तियों में चयन आयोग के जिम्मेदार लोगों व एक्सपर्ट पर मिलीभगत कर भर्ती परीक्षा में अस्पष्ट तथा बड़ी संख्या में त्रुटिपूर्ण सवाल पूछने की बात करते युवा मिले। युवाओं का आरोप है कि हिंदी व अंग्रेजी में एक ही सवाल में स्पेलिंग त्रुटि कर सवाल को विवादित बनाया जाता है। इसके बाद अपने हिसाब से उसकी व्याख्या कर उसे गलत-सही साबित करने का खेल होता है। इससे भर्तियां विवादित होती हैं और युवा कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाने को मजबूर होते हैं। भर्ती प्रणाली की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है। इसके अलावा भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक होने व भर्तियां पूरी करने में कई-कई वर्ष लगाने का मामला उठा। आउटसोर्सिंग भर्तियों से असुरक्षित भविष्य की चिंता जताने वाले युवा भी खूब मिले। इन मुद्दों पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

पुरानी पेंशन के मुद्दे का तोड़

प्रदेश के लाखों कर्मचारियों ने पुरानी पेंशन का मुद्दा बनाया। सपा ने इसे अपने घोषणापत्र में शामिल किया था। चुनाव बाद ईवीएम में भले इसका स्पष्ट असर नहीं दिखा, लेकिन बैलेट के वोट ने कर्मचारियों की आवाज सामने ला दी है। बताया जा रहा है कि पूर्व के चुनावों में बैलट वोटों में भाजपा का दबदबा हुआ करता था। इस बार बड़ी संख्या में सीटों पर सपा प्रत्याशियों को बैलेट वोट ज्यादा मिले हैं। कई सीटों का फैसला बैलट वोट के जरिए हुआ। सपा की सीटों में बड़ी बढ़ोत्तरी में कर्मचारियों की भूमिका का आकलन किया जा रहा है। इसके अलावा कर्मचारियों का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी था, जो मुद्दे के पक्ष में होने के बावजूद संघ-भाजपा की पृष्ठभूमि, बेहतर कानून-व्यवस्था व गवर्नेंस के नाम पर भाजपा को वोट किया। ऐसे में कर्मचारियों में बुढ़ापे की लाठी के तौर पर देखी जा रही पुरानी पेंशन से जुड़े मुद्दे का तार्किक व स्वीकार्य समाधान करना चाहिए। लंबे समय तक इस मुद्दे को लटकाने से बात बनने वाली नहीं है। कई दूसरे राज्यों ने पुरानी पेंशन बहाली का एलान कर माहौल बनाने का काम शुरू कर दिया है। इसके अलावा कर्मचारियों की पदोन्नति, एसीपी स्वीकृति, वेतन विसंगति जैसी समस्याओं के समाधान की पुख्ता व्यवस्था तय समयसीमा में अफसरों की जिम्मेदारी के साथ की जानी चाहिए।
 
महंगाई पर नियंत्रण को बनाया जाए मैकेनिज्म
पूरे चुनाव के दौरान महंगाई की समस्या छाई रही। गरीबों ने मुफ्त राशन, विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत नकद हस्तांतरण जैसे लाभों की वजह से विपक्ष के इन बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। हालांकि, तमाम लोग यह मुद्दा उठाते मिले। पर, मध्यवर्ग हर जगह महंगाई की चर्चा करता नजर आया। आवश्यक वस्तुओं व खाद्य पदार्थों की लगातार बढ़ती कीमतों के साथ चुनाव बाद डीजल व पेट्रोल की कीमत में वृद्धि की आशंका जताते मिले। आवश्यक वस्तुओं की महंगाई पर नियंत्रण को लेकर एक मैकेनिज्म बनाने की जरूरत है, जिससे थोक व फुटकर सामानों की बिक्री में जमीन-आसमान का अंतर न रहे। गरीब परिवारों को इसी होली पर पहले गैस सिलेंडर का इंतजार है।

भ्रष्टाचार रोकने के लिए इंड-टू-इंड हो संस्थागत सुधार
आम लोगों ने सरकारी दफ्तरों व तहसीलों में भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए संस्थागत सुधारों के प्रयासों को सराहा है। ऑनलाइन सुविधाओं, ई-सिस्टम की पहल से तमाम सहूलियतें गिनाई हैं। लेकिन, सरकारी सिस्टम में प्रारंभ से अंत तक (इंड-टू-इंड) ई-सिस्टम की जगह रूट लेवल छोड़ कर बनाने से आने वाली समस्याएं भी गिनाई गईं हैं। मसलन, तहसीलों में अभी भी शिकायतों के निस्तारण व अन्य सुविधाओं से संबंधित कार्यों में लेखपालों व राजस्व निरीक्षकों से प्रारंभ स्तर पर मैनुअल रिपोर्ट ली जाती है। कागज में टीम से कार्य की बात होती है लेकिन मौके पर केवल लेखपाल के  पल्ले छोड़कर लोगों को परेशान होने के लिए छोड़ दिया जाता है। ऐसे में तहसील प्रशासन की फील्ड से जुड़े कार्मिकों को प्रत्येक आदेश-निर्देश, कार्यवाही लिखित व ऑनलाइन दी जाए तथा पैमाइश विजुअल साक्ष्य के साथ किए जाने की व्यवस्था होने के सुझाव दिए गए हैं। इसी तरह अन्यय विभागों में इंड-टू-इंड पहल होनी चाहिए।

नए विधायकों को प्रशिक्षण की जरूरत
हाल के वर्षों में देखा गया है कि आम तौर पर नए विधायक काफी खर्चा करने के बाद चुनकर आते हैं। ऐसे में वह सबसे पहले अपनी माली हालत सुधारने में जुट जाते हैं। जनता को एक ही पंचवर्षीय कार्यकाल में नजर आने लगता है कि, उनका विधायक कहां से कहां पहुंच गया। कितनी संपत्ति थी और कितनी बना ली? जनता की जगह घर-परिवार व रिश्तेदारों को कहां-कहां फायदा पहुंचाया? ऐसे तमाम विधायक व मंत्री शासन-सत्ता के लाभ व विधानसभा और सचिवालय की चकाचौंध में क्षेत्र से कटने लगते हैं। पहली बार जीते विधायकों को मंत्री बनाने के चलन से यह समस्या और उभर आई है। बिना किसी संसदीय अनुभव सीधे मंत्री बनाने से उनकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है और कई लोग क्षेत्र व सरकार में संतुलन बनाने में सफल नहीं हो पाते। दूसरा, पहली बार के विधायक को मंत्री बनाने से कई-कई बार जीतने के बावजूद अवसर न पाने वाले वरिष्ठ विधायकों में कुंठा भी बढ़ती है। आज सोशल मीडिया के जमाने में कुछ भी छिपा नहीं रहता। ऐसे विधायक सत्ता विरोधी लहर की वजह बन जाते हैं। इस विधानसभा चुनाव में विधायकों की छवि बड़े मुद्दे के रूप में उभरी। पूरे प्रदेश में जनता खुले तौर पर कहती मिली कि यदि मौजूदा प्रतिनिधि का टिकट काटकर नए को दे दिया जाए तो वह जरूर समर्थन देगी। सरकार की जगह प्रत्याशी से नाराजगी है। इस फीडबैक पर सत्ताधारी दल को बड़ी संख्या में अपने विधायकों के टिकट काटने पड़े। आवश्यकता होने के बावजूद जहां टिकट नहीं काटा जा सका, वहां स्टार प्रचारकों को प्रत्याशियों की छवि को नजरंदाज कर अपने नाम पर वोट मांगने पड़े। इसके लिए विधायकों के आचरण पर निगहबानी व समय-समय पर प्रशिक्षण दिए जाने की जरूरत है।

ये मुद्दे भी अहम
- बेटियों व महिलाओं ने कानून-व्यवस्था में सुधार पर भरोसा जताया जिसे लगातार बेहतर करने के प्रयास हों।
- माफियाओं व दबंगों के खिलाफ कार्रवाई से बनी ‘बुलडोजर बाबा’ की छवि कायम रखना व कार्रवाई में भेदभाव के आरोप से बचा जाए।
- मोदी व योगी सरकार की गरीबों के मददगार की छवि उभरी है। गरीबों की स्थिति पर लगातार नजर और आवश्यकतानुसार मदद।
- आम मतदाताओं में धारणा बनाने वाले प्रकरणों में खराब संदेश देने वाले फैसलों से बचने की कोशिश व पारदर्शी कार्रवाई।

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