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...जब लविवि में 1937 में ही फहरा दिया गया था तिरंगा, पढ़ें आजादी से पहले का यह रोचक किस्सा
Thu, 15 Aug 2019 03:02 PM IST
Amulya Rastogi
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: Amulya Rastogi
Updated Thu, 15 Aug 2019 03:02 PM IST
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national flag
- फोटो : Social Media
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1947 में देश को आजादी मिलने के बाद हर सरकारी इमारत पर झंडा फहराया जाने लगा। हालांकि, लविवि में इससे 10 साल पहले ही तिरंगा फहरा दिया गया था। इसका श्रेय जाता है लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे जय नारायण श्रीवास्तव को। उन्होंने जान हथेली पर रखकर कला प्रांगण में जाकर अंग्रेजों का झंडा बदल दिया था।
लविवि का छात्रसंघ स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान के लिए भी जाना जाता है। इसके कई पदाधिकारियों ने आंदोलन करने पर जेल की हवा भी खाई। स्वर्गीय जय नारायण श्रीवास्तव के पुत्र धर्मेंद्र नारायण (सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में एडीजी) ने बताया कि उन्होंने बाबूजी से पूरी कहानी सुनी है। वे बताते थे कि वर्ष 1937 में लविवि के एक कार्यक्रम में गवर्नर जनरल सर हेटली तथा मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को शामिल होना था।
स्वतंत्रता आंदोलन का दौर था, इसलिए कई दिन पहले से सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई थी। बाबूजी ने साथियों के साथ तय किया कि भवन पर तिरंगा ही फहराया जाएगा। इसके लिए वे एक दिन पहले ही चोरी-छिपे कला प्रांगण की छत पर जाकर बैठ गए।
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जंग-ए-आजादी की यादें संजोए है राज्य संग्रहालय, मानों इतिहास आंखों के सामने चल रहा हो
जब गवर्नर जनरल और सीएम के आने का समय हुआ, उससे पहले उन्होंने ब्रिटिश झंडे को तिरंगे से बदल दिया। इसके बाद जब झंडा फहराया गया तो तिरंगा देखकर सभी आश्चर्यचकित रह गये। लोेगों को पता चल गया कि इसके पीछे उन्हीं का हाथ था, लेकिन कोई ठोस सबूत नहीं था।
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लविवि का छात्रसंघ स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान के लिए भी जाना जाता है। इसके कई पदाधिकारियों ने आंदोलन करने पर जेल की हवा भी खाई। स्वर्गीय जय नारायण श्रीवास्तव के पुत्र धर्मेंद्र नारायण (सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में एडीजी) ने बताया कि उन्होंने बाबूजी से पूरी कहानी सुनी है। वे बताते थे कि वर्ष 1937 में लविवि के एक कार्यक्रम में गवर्नर जनरल सर हेटली तथा मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को शामिल होना था।
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स्वतंत्रता आंदोलन का दौर था, इसलिए कई दिन पहले से सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई थी। बाबूजी ने साथियों के साथ तय किया कि भवन पर तिरंगा ही फहराया जाएगा। इसके लिए वे एक दिन पहले ही चोरी-छिपे कला प्रांगण की छत पर जाकर बैठ गए।
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जंग-ए-आजादी की यादें संजोए है राज्य संग्रहालय, मानों इतिहास आंखों के सामने चल रहा हो
जब गवर्नर जनरल और सीएम के आने का समय हुआ, उससे पहले उन्होंने ब्रिटिश झंडे को तिरंगे से बदल दिया। इसके बाद जब झंडा फहराया गया तो तिरंगा देखकर सभी आश्चर्यचकित रह गये। लोेगों को पता चल गया कि इसके पीछे उन्हीं का हाथ था, लेकिन कोई ठोस सबूत नहीं था।
छात्रसंघ ने थामी भारत छोड़ो आंदोलन की बागडोर
जय नारायण श्रीवास्तव को 1941-42 में लविवि छात्रसंघ का अध्यक्ष चुना गया। इसके बाद वर्ष 1942-43 में एमएम जफर को यह जिम्मेदारी मिली। 1942 में जब गांधीजी के कहने पर देश भर में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ तो छात्रसंघ के पूर्व और वर्तमान पदाधिकारियों ने इसकी बागडोर थामी। छात्रसंघ भवन से इसके लिए मार्च निकाला गया। इस पर लाठीचार्ज भी हुआ। गिरफ्तारी के बाद दोनों को काफी समय तक जेल में भी रहना पड़ा।
मिली स्वतंत्रता सेनानी की उपाधि
अंग्रेजों से लोहा लेने वाले जय नारायण श्रीवास्तव को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की उपाधि भी दी गई। उत्तर प्रदेश सरकार ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर जारी पुस्तिका में उन पर दो पृष्ट की जानकारी दी है। इसके अनुसार जनपद बाराबंकी से उन्होंने कक्षा आठ से ही अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। इस वजह से उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया था।
इसके बाद कांग्रेस से जुड़कर वे स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे। स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उन्होंने किसी भी प्रकार की सुविधा लेने से इनकार कर दिया। धर्मेंद्र बताते हैं कि वर्ष 1975 में जब बाबूजी लेबर कोर्ट से जज के रूप में सेवानिवृत्त हुए तो उनके बैंक खाते में महज 60 रुपये थे। जब उनसे पूछा जाता कि इस आंदोलन के लिए उनमें ऊर्जा कहां से आती थी वे दो पंक्तियां सुनाते थे- मुझे समंदर से तू साहिल पर न ले जा, मुझे उस ओर ले चल तू जिधर तूफान आने वाला है.....।
मिली स्वतंत्रता सेनानी की उपाधि
अंग्रेजों से लोहा लेने वाले जय नारायण श्रीवास्तव को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की उपाधि भी दी गई। उत्तर प्रदेश सरकार ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर जारी पुस्तिका में उन पर दो पृष्ट की जानकारी दी है। इसके अनुसार जनपद बाराबंकी से उन्होंने कक्षा आठ से ही अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। इस वजह से उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया था।
इसके बाद कांग्रेस से जुड़कर वे स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे। स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उन्होंने किसी भी प्रकार की सुविधा लेने से इनकार कर दिया। धर्मेंद्र बताते हैं कि वर्ष 1975 में जब बाबूजी लेबर कोर्ट से जज के रूप में सेवानिवृत्त हुए तो उनके बैंक खाते में महज 60 रुपये थे। जब उनसे पूछा जाता कि इस आंदोलन के लिए उनमें ऊर्जा कहां से आती थी वे दो पंक्तियां सुनाते थे- मुझे समंदर से तू साहिल पर न ले जा, मुझे उस ओर ले चल तू जिधर तूफान आने वाला है.....।