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Lucknow News: इमरर्जेंसी में इंतजार, वार्ड में शिफि्टंग के लिए लंबी प्रतीक्षा
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नया बन रहा इमरजेंसी वार्ड और परेशान श्यामकली।
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विनीत चतुर्वेदी
लखनऊ। बेहतर इलाज की आस में डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान पहुंचने वाले गंभीर मरीजों और उनके परिजनों के लिए अस्पताल की इमरजेंसी ही बड़ी परेशानी बन चुकी है। अमर उजाला की मंगलवार को की गई पड़ताल में सामने आया कि मरीजों को एक से तीन दिन तक सिर्फ इमरजेंसी बेड पर अटका कर रखा जा रहा है। सुरक्षाकर्मियों के तीखे तेवर और वार्डों में समय पर शिफ्ट न करने की सुस्त रफ्तार ने बदइंतजामी को चरम पर पहुंचा दिया है। मंगलवार को इस अव्यवस्था का दर्द झेल रहे कुछ तीमारदारों ने आपबीती बताई।
केस -1: दो दिन बीते, पर वार्ड में जगह नहीं
रायबरेली से आईं मधु (परिवर्तित नाम) ने बताया कि उनकी मां को किडनी की गंभीर समस्या है। वह उन्हें बेहद नाजुक हालत में रविवार को लोहिया संस्थान लेकर आई थीं। डॉक्टरों ने भर्ती तो कर लिया, लेकिन मंगलवार तक संबंधित वार्ड में बेड नसीब नहीं हुआ। दो दिनों से यह परिवार इमरजेंसी के स्ट्रेचर और अव्यवस्था के बीच जिंदगी की जंग लड़ रहा है।
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केस - 2: इंतजार ने बिगाड़ीं सांसें, अंत में रेफर
बहराइच से आईं श्यामकली को सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। बहराइच से रेफर होकर यहां आईं श्यामकली को तुरंत वेंटिलेटर या आईसीयू सपोर्ट की जरूरत थी, लेकिन उन्हें इमरजेंसी में घंटों सिर्फ इंतजार की कतार में लगा दिया गया। जब स्थिति बेहद गंभीर हो गई, तो संस्थान ने उन्हें रेफर कर दिया।
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जरूरी व कीमती सामान बाहर रखने की भी मजबूरी
गोरखपुर से आए योगेंद्र ने बताया कि संस्थान परिसर में स्वास्थ्य कर्मियों से ज्यादा संख्या सुरक्षाकर्मियों की नजर आती है। ये सुरक्षाकर्मी तीमारदारों पर अनावश्यक राैब झाड़ते हैं। इनकी बेवजह टोकाटाकी से तीमारदारों को भटकना पड़ता है। बताया कि इमरजेंसी वार्ड से बाहर दूर गेट पर ही प्रवेश से पहले रुपये, जरूरी दस्तावेज और अन्य कीमती सामान वाला हैंडबैग भी रखवा लिया जाता है। ऐसे में जरूरत पड़ने पर आवश्यक सामान तक तुरंत पहुंचना मुश्किल हो जाता है।
बेड बढ़ेंगे तो बदहाली दूर होने की उम्मीद
वर्तमान में लोहिया संस्थान की इमरजेंसी में सिर्फ 47 बेड हैं। ऐसे में मरीजों को काफी परेशानी उठानी पड़ती है। अब यहां 45 नए बेड जोड़ने की तैयारी है। इसके बाद इमरजेंसी में 92 बेड उपलब्ध हो जाएंगे। बेड क्षमता लगभग दोगुनी होने से मरीजों को भर्ती करने में आसानी होगी, भीड़ का दबाव कम होगा। इलाज की व्यवस्था में भी सुधार आने की उम्मीद है।
Iकई बार मरीज की डायग्नोसिस स्पष्ट न होने तक मरीज को इमरजेंसी में एक-दो दिन रोकना पड़ जाता है। साथ ही नेफ्रो या न्यूरो जैसे जिस संबंधित वार्ड में मरीज को शिफ्ट किया जाना है, वहां बेड फुल होने से भी मरीज को इमरजेंसी में ही रखकर ट्रीटमेंट दिया जाता है।I
- डाॅ. भुवन चंद्र तिवारी, प्रवक्ता, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान

नया बन रहा इमरजेंसी वार्ड और परेशान श्यामकली।