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विकासनगर अग्निकांड : पेट भर रहा, पर जिंदगी खाली-खाली
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विकासनगर अग्निकांड।
लखनऊ। विकास नगर की जली हुई बस्ती में अब सबसे बड़ा सच यही है कि पेट तो भर रहा है, लेकिन जिंदगी अब भी खाली है। नगर निगम की ओर से सुबह-शाम भोजन मिल रहा है, समाजसेवी भी मदद कर रहे हैं, लेकिन जिन चीजों से जिंदगी चलती है, वही अब यहां सबसे ज्यादा गायब है।
मीना अपनी गर्भवती बहू नीलू के पास बैठी चिंता में डूबी हैं। वह कहती हैं कि आठवां महीना चल रहा है… अभी तक कोई डॉक्टर देखने नहीं आया। मजबूरन जमीन पर लेटना पड़ रहा है। एक तख्त या फोल्डिंग मिल जाए तो थोड़ी राहत मिल जाए। अजय गाड़ी चलाकर परिवार चलाते हैं। वह अब काम पर नहीं जा पा रहे। बोले-घर में न बर्तन बचे, न गैस चूल्हा, लोग खाना दे रहे हैं, लेकिन कब तक? अपने हाथ से कुछ बनाने का भी सहारा नहीं बचा।
पास ही बैठीं शांति और माया ने बताया कि वह लोग आसपास के घरों में काम करके गुजारा करती हैं। प्रशासन रैन बसेरों में जाने की बात करता है, लेकिन वह दूर है। वहां रहेंगे तो रोज काम पर आना संभव नहीं होगा। हमें यहीं रहकर जिंदगी संभालनी है।
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15 अप्रैल को हुए अग्निकांड ने इन लोगों से सिर्फ घर नहीं छीना, बल्कि आत्मनिर्भर जिंदगी का आधार भी छीन लिया है। पेट भरने से आगे बढ़कर जिंदगी को फिर से खड़ा करना इन परिवारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। चार दिन बाद भी विकासनगर की यह बस्ती यही कह रही है, रोटी मिल जाना काफी नहीं, जीने के लिए सहारा भी चाहिए।
मदद मिल रही, मगर अधूरी
ज्योति ने बताया कि नगर निगम भोजन दे रहा है, जबकि समाजसेवी संगठन दूध, बिस्कुट, पानी, कपड़े और लंच पैकेट बांट रहे हैं। इससे भूख जरूर मिट रही है, लेकिन जिंदगी चलाने के लिए जरूरी साधन बर्तन, गैस चूल्हा, अनाज, बिस्तर और बिजली अब भी नही हैं, जबकि सबसे ज्यादा जरूरत इन्हीं सामानों की है।
पीड़ित परिवार की संख्या के नंबर लगाए
प्रभावित परिवारों की सही गणना के लिए प्रशासन ने तिरपाल तानकर रहने वाले परिवारों का चिह्नांकन शुरू कर दिया है। इसके लिए उनके तिरपाल में नंबर लिखी पट्टिकां लगाई जा रही हैं। पीड़ितों के नाम के आगे भी उस नंबर को अंकित किया जा रहा है।
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मीना अपनी गर्भवती बहू नीलू के पास बैठी चिंता में डूबी हैं। वह कहती हैं कि आठवां महीना चल रहा है… अभी तक कोई डॉक्टर देखने नहीं आया। मजबूरन जमीन पर लेटना पड़ रहा है। एक तख्त या फोल्डिंग मिल जाए तो थोड़ी राहत मिल जाए। अजय गाड़ी चलाकर परिवार चलाते हैं। वह अब काम पर नहीं जा पा रहे। बोले-घर में न बर्तन बचे, न गैस चूल्हा, लोग खाना दे रहे हैं, लेकिन कब तक? अपने हाथ से कुछ बनाने का भी सहारा नहीं बचा।
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पास ही बैठीं शांति और माया ने बताया कि वह लोग आसपास के घरों में काम करके गुजारा करती हैं। प्रशासन रैन बसेरों में जाने की बात करता है, लेकिन वह दूर है। वहां रहेंगे तो रोज काम पर आना संभव नहीं होगा। हमें यहीं रहकर जिंदगी संभालनी है।
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15 अप्रैल को हुए अग्निकांड ने इन लोगों से सिर्फ घर नहीं छीना, बल्कि आत्मनिर्भर जिंदगी का आधार भी छीन लिया है। पेट भरने से आगे बढ़कर जिंदगी को फिर से खड़ा करना इन परिवारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। चार दिन बाद भी विकासनगर की यह बस्ती यही कह रही है, रोटी मिल जाना काफी नहीं, जीने के लिए सहारा भी चाहिए।
मदद मिल रही, मगर अधूरी
ज्योति ने बताया कि नगर निगम भोजन दे रहा है, जबकि समाजसेवी संगठन दूध, बिस्कुट, पानी, कपड़े और लंच पैकेट बांट रहे हैं। इससे भूख जरूर मिट रही है, लेकिन जिंदगी चलाने के लिए जरूरी साधन बर्तन, गैस चूल्हा, अनाज, बिस्तर और बिजली अब भी नही हैं, जबकि सबसे ज्यादा जरूरत इन्हीं सामानों की है।
पीड़ित परिवार की संख्या के नंबर लगाए
प्रभावित परिवारों की सही गणना के लिए प्रशासन ने तिरपाल तानकर रहने वाले परिवारों का चिह्नांकन शुरू कर दिया है। इसके लिए उनके तिरपाल में नंबर लिखी पट्टिकां लगाई जा रही हैं। पीड़ितों के नाम के आगे भी उस नंबर को अंकित किया जा रहा है।

विकासनगर अग्निकांड।

विकासनगर अग्निकांड।

विकासनगर अग्निकांड।

विकासनगर अग्निकांड।

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विकासनगर अग्निकांड।

विकासनगर अग्निकांड।

विकासनगर अग्निकांड।

विकासनगर अग्निकांड।

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विकासनगर अग्निकांड।

विकासनगर अग्निकांड।

विकासनगर अग्निकांड।

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