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उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी बोले, 'पॉपुलैरिटी की चाहत न रखें जज'

Thu, 14 Apr 2016 09:56 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 14 Apr 2016 09:56 PM IST
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Vice president Hamid Ansari's speech on foundation day of Allahabad highcourt.
उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी - फोटो : amar ujala

उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कहा कि न्यायाधीशों को अपने दायित्वों का निर्वहन निष्पक्षता और तटस्थता के साथ करना चाहिए। कितना भी उकसाया जाए वे भावनाओं में बहकर निर्णय न सुनाएं। अदालतें लोकप्रियता पाने की कोशिश भी न करें।

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उन्होंने ग्लोबलाइजेशन के दौर में न्यायिक व्यवस्था में बदलाव पर जोर दिया। कहा कि बदलती दुनिया से हम जितनी जल्दी तालमेल बैठा लेंगे, वादकारियों, अधिवक्ताओं और जजों के लिए उतना ही बेहतर होगा। अंतत: इसका लाभ जनता को ही मिलेगा।
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हामिद अंसारी बृहस्पतिवार को हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ की गोमतीनगर में बनी नई बिल्डिंग में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 150वें स्थापना वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे। इस मौके पर राज्यपाल राम नाईक और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाघीश डॉ. डीवाई चन्द्रचूड़ भी मौजूद थे।
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उप राष्ट्रपति ने कहा, कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार न्यायाधीशों को अपनी जिम्मेदारियां तटस्थता व निष्पक्षता से निभानी चाहिए। युगों-युगों से हर देश और हर न्याय तंत्र का यही आदेश रहा है। जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह न्यायपालिका से भी अपेक्षा रहती है कि ईमानदारी का पालन हर स्तर पर किया जाए।

'जजों को बेहतर ढंग से प्रशिक्षित किया जाए'

Vice president Hamid Ansari's speech on foundation day of Allahabad highcourt.

उपराष्ट्रपति के अनुसार, जजों को इस तरह प्रशिक्षित करना चाहिए कि उनके अवचेतन मस्तिष्क में बैठी निष्ठाओं को समाप्त किया जा सके ताकि न्याय करते समय वे अपनी भावनाओं को परे रख सकें, किसी उकसावे में न आएं।

जहां तक हमारे विविधता और जटिलताओं वाले समाज में सामाजिक जागरूकता का प्रश्न है तो इसका जवाब संविधान के शब्दों और आत्मा में मिलेगा। नागरिकों की आकांक्षाओं, न्याय, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की तलाश में मिलेगा।

‘पापुलर’ होने की चाहत स्वेच्छाचार की अनुमति
उप राष्ट्रपति ने कहा, देश में न्यायिक रूप से सक्रिय रहे जस्टिस कृष्णा अय्यर ने ‘न्यायिक सक्रियता’ की सीमाएं तय कर दी थीं। उन्होंने नागरिक स्वतंत्रताओं के अमेरिकी प्रवक्ता एलन बार्थ से सहमति जताते हुए कहा था कि किसी अदालत को प्रसिद्धि की चाहत नहीं रखनी चाहिए।

जब न्यायालय ‘पापुलर’ होने की इच्छा रखता है तो वह स्वेच्छाचारी व्यवहार की अनुमति देता है। अदालत में लोकप्रियता की चाहत इस बात की गारंटी नहीं है कि किसी अन्य अवसर पर उनकी अपनी इच्छाएं नहीं होंगी।

मजबूत करना होगा कानून का राज

Vice president Hamid Ansari's speech on foundation day of Allahabad highcourt.
उपराष्ट्रपति को लखनऊ हाईकोर्ट की एक तस्वीर देकर सम्मानित किया गया

उन्होंने कहा,  बहुत बार कहा गया है कि विश्वास को गहरा करने के लिए विश्वास के मौलिक तत्वों पर पुनर्विचार करना चाहिए। नागरिकों के दृढ़ विश्वासों में एक विश्वास कानून का राज (रूल ऑफ लॉ) है।

प्रो. उपेन्द्र बख्शी के हवाले से कहा कि कानून का शासन सत्ता को जवाबदेह, शासन को न्यायपूर्ण और राज्य को नीतिपरक बनाने के जनता के संघर्ष का प्रतिबिंब है। सुप्रीम कोर्ट ने 1996 में एक फैसले में कहा था कि कानून का राज परिणाम में समानता लाने के लिए सामाजिक न्याय का शक्तिशाली साधन है।

इच्छा शक्ति के बिना संविधान कागजी शेर
उप राष्ट्रपति ने भारतीय संविधान पर न्यूजीलैंड के एक जज की टिप्पणी का उल्लेख किया। कहा कि भारतीय संविधान मजबूत और विस्तृत है लेकिन न्यायपालिका की इच्छा शक्ति और दृढ़ता के बिना यह छलावा और कागजी शेर है। यहीं पर न्याय करने का दायित्व न्यायाधीशों पर आ जाता है।

निर्णय देते वक्त अत्यधिक उत्साह भी चिंता का विषय

Vice president Hamid Ansari's speech on foundation day of Allahabad highcourt.
राज्यपाल राम नाईक व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी - फोटो : amar ujala

उन्होंने कहा, एक तरफ जनसरोकारों के मामले में सुधारात्मक कदम उठाने से न्यायपालिका की सक्रियता सामने आई है वहीं न्याय महंगा होता जा रहा है और न्याय मिलने में देरी होती है।

न्यायिक जवाबदेही के लिए तंत्र का अभाव और भ्रष्टाचार के आरोपों ने संदेह को जन्म दिया है। इससे निराशा बढ़ी है। कहा कि जजों द्वारा निर्णय देते वक्त दिखाया जा रहा अत्यधिक उत्साह भी चिंता का विषय है।

स्थगन और ज्यादा तर्क-वितर्क से देरी
अंसारी ने कहा, सबसे लंबे समय तक भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे एक जस्टिस ने सेवानिवृत्ति की पूर्व संध्या पर न्याय में देरी पर राय रखी थी। कहा था, इसके लिए बार-बार होने वाले स्थगन और लंबे समय तक होने वाले तर्क-वितर्क जिम्मेदार हैं।

इनमें से हर कारण को दूर किया जा सकता है, बशर्ते न्यायाधीश और अधिवक्ता समाज चाह ले। जहां तक लंबे तर्क वितर्क का संबंध है, यह भारतीय बीमारी है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में प्रत्येक पक्ष को मौखिक रूप से अपनी बात रखने के लिए केवल 30 मिनट का समय दिया जाता है।

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