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सूरमा: नहीं मिला मैदान, अब दर्शक दीर्घा में, ताल ठोकने की बारी आई तो कट गया टिकट, चुनावी शोर से भी हुए दूर

Sat, 22 Jan 2022 11:22 AM IST
शाहरुख खान अमित मुद्गल, अमर उजाला, लखनऊ
अमित मुद्गल, अमर उजाला, लखनऊ Published by: शाहरुख खान Updated Sat, 22 Jan 2022 11:22 AM IST
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सार
मेरठ की बात करें तो यहां मुकाबला हर बार ही कड़ा रहा है। अरसे बाद ऐसा हो रहा है जब पूर्व मंत्री हाजी याकूब कुरैशी न खुद और न ही उनके परिवार का कोई सदस्य चुनावी मैदान में है। पिछले चुनाव में याकूब कुरैशी के पुत्र इमरान सरधना विधानसभा सीट से चुनावी रण में उतरे थे, तो मेरठ दक्षिण सीट से याकूब ने खुद ताल ठोकी थी। दोनों बसपा से लड़े थे, दोनों ही चुनाव हार गए थे। इस बार इमरान मेरठ दक्षिण से तैयारी कर रहे थे, पर ऐन मौके पर उनका टिकट कट गया। 
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Uttar Pradesh Election 2022 Candidates did not get the field, now in the audience gallery
uttar pradesh election 2022 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आज कहानी उन सूरमाओं की जो दर्शक दीर्घा में बैठा दिए गए। कहानी उन योद्धाओं की जो मैदान को इस उम्मीद में तैयार करते रहे कि एक दिन तो इसी में ताल ठोकना है। कुछ तो मैदान के सारे कंकड़-रोड़े दूर करने में जी-जान से जुटे रहे कि अपने लाडले को उतारना है। 


सोचे थे कि बेटे-बेटी का भविष्य संवर जाएगा। पर, जब ताल ठोकने की बारी आई तो कोई और टिकट मार ले गया। टिकट से महरूम हुए तो चुनावी शोर से भी दूर हो गए। खुद को कोस रहे हैं कि कैसे हवा का रुख भांपने में चूक गए। तो कुछ की मौकापरस्ती ने उनके अरमानों पर पानी फेर दिया। अमित मुद्गल की रिपोर्ट...


मेरठ :  कुरैशी व अखलाक का कुनबा बाहर
मेरठ की बात करें तो यहां मुकाबला हर बार ही कड़ा रहा है। अरसे बाद ऐसा हो रहा है जब पूर्व मंत्री हाजी याकूब कुरैशी न खुद और न ही उनके परिवार का कोई सदस्य चुनावी मैदान में है। पिछले चुनाव में याकूब कुरैशी के पुत्र इमरान सरधना विधानसभा सीट से चुनावी रण में उतरे थे, तो मेरठ दक्षिण सीट से याकूब ने खुद ताल ठोकी थी। दोनों बसपा से लड़े थे, दोनों ही चुनाव हार गए थे। इस बार इमरान मेरठ दक्षिण से तैयारी कर रहे थे, पर ऐन मौके पर उनका टिकट कट गया। 

मेरठ में उनका राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी परिवार है, हाजी शाहिद अखलाक का। सांसद और मेयर रह चुके शाहिद एवं उनका परिवार भी चुनाव मैदान से दूर है। चुनाव से ऐन पहले उन्होंने बसपा में शामिल होने की बात कही। वे निकले तो थे बसपा पदाधिकारियों से मुलाकात करने, पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से मुलाकात कर आए। बसपा में बात बिगड़ गई और सपा में बनी नहीं। फिलहाल चुनावी रण से यह परिवार भी बाहर है।

सहारनपुर : इमरान के अरमान पर फिरा पानी

सहारनुपर में इमरान मसूद पर इस समय सभी की निगाहे हैं। इमरान मसूद लखनऊ आकर सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव से मिले थे, पर बात नहीं बनी। उनका टिकट भी नहीं हो पाया। फिलहाल अभी तो वे चुनावी रण से बाहर हैं। हालांकि, उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी है। कहा जा रहा है कि वह कहीं न कहीं से टिकट के जुगाड़ में हैं और इसमें सफल भी हो सकते हैं। हालांकि, उनके भाई नोमान मसूद गंगोह से बसपा से चुनावी रण में कूद गए हैं।

सहारनपुर के ही पूर्व सांसद स्व. जगदीश राणा का परिवार भी अब तक चुनावी मैदान में प्रवेश नहीं पा सका है। उनके भाई महावीर राणा पिछली बार भी भाजपा से बेहट से लड़े थे, पर हार गए थे। इस बार सहारनपुर देहात सीट से दावेदारी कर रहे थे, लेकिन नरेश सैनी के आ जाने से उनका भी पत्ता कट गया।

मुजफ्फरनगर :  चुनावी दंगल से दूर राणा परिवार
मुजफ्फरनगर का राणा परिवार इस बार चुनावी दंगल में ताल नहीं ठोक पाया है। पूर्व सांसद कादिर राणा या उनके परिवार का कोई सदस्य चुनावी मैदान में नहीं है। उनके भाई नूर सलीम राणा वर्ष 2012 में बसपा से चुनाव लड़े थे और जीते थे। पिछला चुनाव उन्होंने चरथावल से लड़ा, पर हार गए।  इस बार रालोद में शामिल हुए, पर टिकट ही नहीं मिल पाया।

इसी परिवार के पूर्व विधायक शाहनवाज राणा भी चुनावी रण से दूर रह गए। मुजफ्फरनगर में ही पूर्व सांसद अमीर आलम का भी परिवार चुनावी दंगल से बाहर है। 2012 में उनके बेटे नवाजिश आलम बुढ़ाना से सपा से लड़े थे और जीत गए थे। 2017 में मीरापुर से चुनाव लड़े पर हारे। अब रालोद से बिजनौर, मीरापुर या चरथावल सीट पर दावा कर रहे थे, पर टिकट से महरूम रह गए।

बागपत, मुरादाबाद :  साहब सिंह को नहीं मिला  दंगल का टिकट, शमीउल हक भी नदारद

बागपत में पूर्व विधायक साहब सिंह इस बार चुनावी रण में नहीं हैं। पिछला चुनाव रालोद के टिकट पर उन्होंने बड़ौत से लड़ा था। सपा से भी कई बार चुनाव लड़ चुके हैं। इस बार फिर बड़ौत से ही रालोद से टिकट मांग रहे थे, पर वहां से रालोद ने जयवीर सिंह तोमर को मैदान में उतार दिया। साहब सिंह भी लगातार चुनाव लड़ते आ रहे हैं, पर इस बार चुनावी दंगल में नहीं उतर पाए हैं। मुरादाबाद में भी देहात सीट पर यही हुआ है। यहां विधायक रहे शमीउल हक या उनके परिवार का कोई सदस्य इस बार चुनावी मैदान में नहीं है।

हापुड़ :  तोमर ले उड़े तोमर का टिकट
हापुड़ की धौलाना सीट का पिछला चुनाव परिणाम याद करें। चार बार सांसद रह चुके डॉ. रमेश चंद तोमर भाजपा से चुनाव लड़े थे और  बसपा के असलम चौधरी से मात्र साढ़े तीन हजार वोटों के अंतर से हार गए थे। इस बार भी टिकट मांग रहे थे। पर, भाजपा ने यहां से धर्मेश तोमर को टिकट दे दिया। अरसे बाद ऐसा हो रहा है कि तोमर चुनावी मैदान से बाहर हैं।

बरेली :  न राजेश अग्रवाल न बेटे को मिला टिकट
यूपी के पूर्व कैबिनेट मंत्री राजेश अग्रवाल का परिवार भी इस समय चुनावी रण से दूर है। राजेश बरेली शहर और कैंट से कई बार के विधायक हैं। भाजपा के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष हैं। माना जा रहा था कि वह खुद या उनके परिवार का कोई सदस्य अवश्य चुनाव लड़ेगा।  इस बार उन्हें टिकट नहीं मिला तो वे अपने पुत्र की पैरवी कर रहे थे, लेकिन उनके पुत्र मनीष अग्रवाल को भी टिकट नहीं दिया गया। अर्से बाद उनका परिवार इस चुनावी संग्राम में शामिल नहीं हो रहा है।

अलीगढ़ :  डॉ. दलवीर सपने को नहीं दे पाए उड़ान
अलीगढ़ में बरौली सीट पर चार बार के विधायक रहे डॉ. दलवीर सिंह का परिवार इस बार चुनावी महासमर में नहीं है। इस बार भाजपा ने उनका टिकट काट दिया है। दलवीर सिंह अपना टिकट न होने की स्थिति में अपने पौत्र के लिए टिकट मांग रहे थे, पर वहां ठा. जयवीर सिंह को भाजपा ने टिकट दिया है। वर्ष 1989 के बाद यह परिवार चुनावी मैदान से दूर रहेगा।
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