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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   UP: Why?...Gen-Ji's body is changing, experts say useless organs and muscles are disappearing.

यूपी : आखिर क्यों?...बदल रहा जेन-जी का शरीर, विशेषज्ञ बोले-अनुपयोगी अंग और मांसपेशियां हो रही गायब

Sat, 22 Nov 2025 10:45 AM IST
आकाश द्विवेदी अमर उजाला नेटवर्क,विनीत चतुर्वेदी, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क,विनीत चतुर्वेदी, लखनऊ Published by: आकाश द्विवेदी Updated Sat, 22 Nov 2025 10:45 AM IST
सार

विशेषज्ञों के अनुसार आधुनिक जीवनशैली और तकनीक के प्रभाव से जेन-जी के शरीर में धीरे-धीरे विकासवादी बदलाव दिख रहे हैं। कई अनुपयोगी मांसपेशियां और अंग जैसे पामारिस लॉन्गस, अक्ल दाढ़ और कान की मांसपेशियां गायब हो रही हैं। 

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UP: Why?...Gen-Ji's body is changing, experts say useless organs and muscles are disappearing.
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

आधुनिक जीवन की चुनौतियों के बीच प्रकृति चुपचाप अपनी शिल्पकारी में जुटी है। विकास की अनदेखी धाराएं आज जेन-जी यानी नव युवाओं की देह में नए आकार गढ़ रही हैं। अनुवंशिक विकास के क्रम में प्रकृति खामोशी के साथ जेन-जी के शरीर में बेहद धीमी गति से मांसपेशियों, हड्डियों, दांतों, आंखों और यहां तक कि दिमाग तक को बदल रही है।

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यह दावा है लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के एनाॅटमी विभाग के प्रोफेसर डॉ. नवनीत सिंह का। अमर उजाला से खास बातचीत में उन्होंने कई और खुलासे किए।

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अक्ल दाढ़ का गायब होना बड़ा संकेत

प्रो. नवनीत के अनुसार, देश में हुए कई ताजा अध्ययन बताते हैं कि लंबे अरसे से उपयोग में न रहने के कारण अब बड़ी संख्या में युवाओं में अक्ल दाढ़ निकलती ही नहीं। पहले आदि मानवों को कठोर भोजन, कंद-मूल, मांस चबाने के लिए बड़े जबड़े और अक्ल दाढ़ की जरूरत पड़ती थी। बाद में नरम, पका खाना, फास्ट फूड की आदतें और कम चबाने वाले आहार के कारण जबड़ा छोटे होने लगे। अब के दौर में लगभग 30 फीसदी लोगों में 32 की जगह 30 दांत ही निकलते हैं।

 

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नई पीढ़ी में घट रही याद रखने की क्षमता

उप्र विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुमित कुमार श्रीवास्तव ने ऑस्ट्रेलिया की फ्लिंडर्स यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ एडिलेड में अनुवंशिक विकास से जुड़े शोध का हवाला देते हुए बताया कि हमारा शरीर आधुनिक दुनिया के अनुसार खुद को री-डिजाइन कर रहा है। 

बीते कुछ अरसे में हमारे कई मसल व अंग शरीर के लिए गैरजरूरी एसेसरीज जैसे बन गए हैं। दिमाग पर भी तकनीक का गहरा असर है। मोबाइल, स्क्रीन और सुविधा वाले युग में जेन-जी में याद रखने की क्षमता घट रही है। निर्णय क्षमता तेज, लेकिन सतही हो गई है। मल्टीटास्किंग बढ़ी है और सूचना ग्रहण करने व समझने का तरीका बदल गया है।




 

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जेन-जी में धीरे-धीरे गायब हो रहे अंग

प्रो. नवनीत बताते हैं कि बीते दो दशक के अवलोकन में सामने आ चुका है कि मनुष्य उन अंगों को खो रहा है जिनकी शरीर में उपयोगिता खत्म हो चुकी है। इन अंगों और मांसपेशियों को इस तरह से समझा जा सकता है।

 

ये भी जानें

  • पामारिस लॉन्गस मांसपेशी : अब 25 फीसदी लोगों में गायब होने लगी हैं। यह हमारे अग्रबाहु में कलाई के पास पाई जाने वाली एक लंबी, पतली मांसपेशी है जो कलाई को मोड़ने में मदद करती है।
  • कान में पाई जाने वाली ऑरिक्युलैरिस पोस्टीरियर : यह मांसपेशी जो पहले कान को हिलाने के काम आती थी, जो अब गायब हो रही।
  • अपेंडिक्स : कभी पाचन में जरूरी अंग था जो अब निष्क्रिय है।
  • शरीर के बाल : तापमान नियंत्रण, कपड़ों और आधुनिक जीवन ने बाल का महत्व घटाया है।
  • आंखों व दिमाग की संरचना में बदलाव : जेन-जी लगभग पूरे दिन स्क्रीन के सामने रहता है। इससे आंखों का आकार और फोकसिंग पैटर्न बदल रहा है। लगभग 20 से 30 प्रतिशत लोगों में मायोपिया यानी सिर्फ नजदीक दिखाई देने की परेशानी तेजी से बढ़ी है। दिमाग के सोचने के पैटर्न में भी तेजी से बदलाव आ रहा है।

 

अहम बातें

तकनीक, तनाव और बदलती जीवनशैली के बीच मनुष्य का शरीर एक बार फिर विकास के नए मोड़ पर खड़ा है। मानव विकास की कहानी खत्म नहीं हुई। अब यह हमारे डीएनए के भीतर चुपचाप आगे बढ़ रही है। यहां बदलाव सिर्फ बाहरी नहीं, बल्कि हमारी नसों में लिखी जा रही नई जीव-वैज्ञानिक कहानी है।

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