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यूपी: पंकज चौधरी बने यूपी भाजपा के सरपंच, पार्षद से लेकर प्रदेश के मुखिया तक ऐसा रहा सफर; जानिए कहानी

Sun, 14 Dec 2025 05:51 PM IST
रोहित मिश्र अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Published by: रोहित मिश्र Updated Sun, 14 Dec 2025 05:51 PM IST
सार

पंकज चौधरी यूपी भाजपा के नए अध्यक्ष बन गए हैं। 1980 में पार्टी बनने के बाद वह पार्टी के 16वें अध्यक्ष बन रहे हैं। पंकज सात बार के सांसद हैं। पंकज चौधरी के पहले 15 नेताओं को पार्टी का अध्यक्ष बनने का मौका मिला था। 

 

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UP: Pankaj Chaudhary becomes UP BJP's Sarpanch, completes journey from councillor to state head
पंकज चौधरी बने यूपी भाजपा के प्रमुख। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

 सात बार के सांसद व केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर चुने गए हैं।  रविवार को आधिकारिक तौर पर उनके नाम की घोषण हो गई।  पार्षद से शुरू हुआ यह सफर केंद्रीय मंत्री से लेकर अब प्रदेश में पार्टी के मुखिया तक पहुंच चुका है। पार्टी में जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के करीबी माने जाते हैं वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी इनकी मजबूत पैठ है। शांत-सौम्य व्यवहार, लोगों से जुड़ाव, व्यापक राजनीतिक सोच और विरोधियों को भी साथ लेकर चलने की उनकी क्षमता को लोग उनके इस सियासी मुकाम का बड़ा आधार मानते हैं।

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पंकज को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के पीछे उनकी राजनीतिक कुशलता के साथ ही जातीय आधार भी माना जा रहा है। पंकज कुर्मी बिरादरी से आते हैं, जो ओबीसी में यादव के बाद दूसरी सबसे बड़ी बिरादरी है। पिछले लोकसभा चुनाव में सपा के पीडीए दांव के कारण बड़ी संख्या में ओबीसी मतदाता खासकर पूर्वांचल में भाजपा से दूर चले गए थे। पंकज के चेहरे के सहारे उन्हें वापस लाने की भी कवायद है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पंकज के अध्यक्ष बनने से पूर्वी यूपी में पार्टी ज्यादा मजबूत होगी।
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राजनीतिक सफर की शुरुआत में ही बने गए थे डिप्टी मेयर

गोरखपुर के घंटाघर हरबंश गली स्थित घर में 20 नवंबर 1964 में जन्मे पंकज चौधरी ने एमपी इंटर कॉलेज और गोरखपुर विश्वविद्यालय से स्नातक तक की शिक्षा ग्रहण की। औद्योगिक घराने में जन्मे पंकज चौधरी ने राजनीति में कदम रखा और नगर निगम गोरखपुर में 1989 में पार्षद बने और डिप्टी मेयर बने। महराजगंज में पंकज के लिए राजनीतिक जमीन उनके भाई स्वर्गीय प्रदीप चौधरी ने तैयार की। वह महराजगंज के पहले जिला पंचायत अध्यक्ष थे। वे ही पंकज को अपने साथ लाए और उन्हें स्थापित किया। पंकज ने भी अपनी राजनीतिक समझ से धीरे-धीरे अपनी पहचान बना ली। राम लहर में 1991 में पहली बार भाजपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। उसके बाद से वह महराजगंज के ही होकर रह गए। अब तक दो बार ही (1999 और 2009 के लोकसभा चुनाव) में ही पंकज को हार का सामना करना पड़ा। पीएम नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल में पहली बार केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री बने और तीसरे कार्यकाल में भी उन्हें दोबारा यह जिम्मेदारी मिली।

छोटे से छोटे कार्यकर्ता को तरजीह देना नहीं भूलते

UP: Pankaj Chaudhary becomes UP BJP's Sarpanch, completes journey from councillor to state head
केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी के प्रदेश अध्यक्ष पद पर नामांकन करने के बाद बधाई देते उप मुख्यमंत्री

राजनीति में बड़े मुकाम पर आने के बाद भी पंकज ने कभी अपनी सादगी नहीं छोड़ी। छोटे से छोटे कार्यकर्ता को तरजीह देते हैं। ब्लॉक गेट पर चाय की दुकान चलाने वाले सत्तन वर्मा भावुक होकर कहने लगे की मंत्री बनने के बाद भीड़ में भी मेरा नाम लेकर बुलाते हैं। यह हमारे के लिए बड़ी बात है। सत्तन ने बताया कि जिले के लिए गौरव का विषय है। जब कभी मिलता हूं तो वह हंसकर हालचाल पूछते हैं। कोई बनावटी पन नहीं रहता है। एक देशी अंदाज में बातचीत करने हृदय को द्रवित कर देता है।

बढ़नी में  रहकर पंकज ने उत्तीर्ण की इंटर की परीक्षा

सूबे के नए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनने जा रहे पंकज चौधरी ने इंटरमीडिएट की परीक्षा शिवपति इंटर कॉलेज शोहरतगढ़ (सिद्धार्थनगर) से 1983 में उत्तीर्ण की। उन्होंने अपनी बड़ी बहन साधना चौधरी के पास रहकर माध्यमिक की पढ़ाई पूरी की थी। साधना पंकज की बड़ी बहन और बढ़नी के घरुआर एस्टेट की मालकिन व पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष सिद्धार्थनगर रह चुकी हैं। साधना ने बताया कि पंकज ने उनके पास रहकर इंटर तक पढ़ाई पूरी की थी। वह समय- समय पर प्रत्येक कार्यक्रम में पहुंचते हैं। पिछले माह दीपावली के बाद भैया दूज में आशीर्वाद लेने पहुंचे तो पूरा दिन गांव वाले घर पर बिताया। इस दौरान पुरानी याद ताजा करते रहे। उनके प्रदेश अध्यक्ष बनने पर बहन के परिवार ही नहीं पूरे घरुआर में जश्न है।

ऐसा रहा राजनीतिक सफरः 

1989-91 सदस्य, नगर निगम, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।
1990-91 उप महापौर, नगर निगम, गोरखपुर।
1990- सदस्य, कार्य समिति, भारतीय जनता पार्टी।
1991- 10वीं लोकसभा के लिए चुने गए। (पहला कार्यकाल)
1991-96 सदस्य, पटल पर रखे गए कागजात संबंधी समिति और सदस्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और वन संबंधी समिति।
1998-12वीं लोकसभा के लिए फिर से निर्वाचित
2004-14वीं लोकसभा के लिए फिर से निर्वाचित
2014- 16वीं लोकसभा के लिए फिर से निर्वाचित
2019- 17वीं लोकसभा के लिए फिर से निर्वाचित
2024- 18वीं लोकसभा के लिए फिर से निर्वाचित
2021 से केंद्र की मोदी सरकार में लगातार मंत्री।
 

इसलिए लगाया पंकज पर दांव 

कई महीने की मशक्कत और मंथन के बाद भाजपा ने पूर्वांचल के कद्दावर नेता और सात बार के सांसद व केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी पर दांव ऐसे नहीं लगाया है। इसके पीछे कई सियासी कारण हैं। पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष की कमान देकर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए पिछड़ों को साधने के साथ ही विपक्ष के पीडीए समीकरण में सेंध लगाने की कोशिश की है। यहीं नहीं, भाजपा ने पंकज चौधरी के सहारे अपने परंपरागत कुर्मी वोट को भी साथ रखने का प्रयास किया है। साथ ही कार्यकर्ताओं को यह भी संदेश दिया है कि भाजपा अपने मूल काडर की कीमत को भूलती नहीं है।

दरअसल, यादवों के बाद पिछड़ों में सबसे अधिक प्रभावशाली रही कुर्मी बिरादरी भाजपा का कोर वोट बैंक रही है। लेकिन, पार्टी में तमाम कुर्मी नेताओं के होने और अपना दल (एस) के साथ होने के बाद भी 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा कुर्मी वोट बैंक में भारी सेंधमारी करने में सफल रही है। इसके कारण भाजपा को भारी कीमत चुकानी पड़ी थी और 2019 में 62 लोकसभा सीट जीतने वाली भाजपा 2024 में 36 सीटों पर ही जीत हासिल कर पाई। तभी से पार्टी नेतृत्व इस नुकसान की भरपाई के लिए एक ऐसे चेहरे को तलाश रहा था, जो कुर्मी वोट बैंक को फिर से अपने पाले में कर पाए।

बड़े नेताओं के बाद भी खिसका वोट बैंक

यह भी माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव में अनुप्रिया पटेल जैसा बड़ा कुर्मी चेहरा होने के अलावा पार्टी के भीतर करीब दो दर्जन से अधिक कुर्मी विधायकों और तमाम राज्य व क्षेत्रीय स्तर पर संगठन के तमाम पटेल नेताओं के होते हुए पार्टी का भारी कुर्मी वोट बैंक खिसक गया था। पार्टी के मंथन में देखा गया कि लोकसभा चुनाव में मिर्जापुर संसदीय क्षेत्र के कुर्मी बहुल मड़िहान और चुनार विधानसभा क्षेत्र में कुर्मी वोट एनडीए से छिटका था। मड़िहान में तो भारी नुकसान हुआ था। वहीं, वाराणसी संसदीय क्षेत्र में रोहनियां और सेवापुरी जैसे कुर्मी बहुल विधानसभा क्षेत्र के साथ ही अन्य विधानसभा क्षेत्रों में भी कुर्मी वोट घटने से पीएम मोदी की जीत का अंतर घट गया था।

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