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UP: लोटा-थरिया के दर्द दरकिनार...चुनावी मैदान में सियासी स्वांग; इन संसदीय क्षेत्रों में सबसे बड़ी आफत है बाढ़

Mon, 06 May 2024 01:11 PM IST
शाहरुख खान संजय तिवारी, अमर उजाला, बलरामपुर
संजय तिवारी, अमर उजाला, बलरामपुर Published by: शाहरुख खान Updated Mon, 06 May 2024 01:11 PM IST
सार

देवीपाटन मंडल के तीन संसदीय क्षेत्रों में सबसे बड़ी आफत बाढ़ है। हर साल गरीबों का लोटा, थरिया और अन्न का दाना-दाना बह जाता है। चुनावी मिशन में दिखावे के सियासी रंग बिखरे हैं। जनता के मुद्दे गायब हैं।

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UP Lok Sabha Election 2024 Flood is biggest problem in three parliamentary constituencie of Devipatan division
UP Lok Sabha Election - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

देवीपाटन मंडल की चार संसदीय सीटों में तीन बाढ़ जैसी समस्या से घिरी हैं। इससे हर साल लोगों का लोटा और थरिया तक बह जाता है। बाढ़ के समय तरबगंज में शरण लिए बाढ़ पीडित बंश बहादुर कहते हैं कि हमार तौ लोटा बहिगा, थरिया बहिगा और बहिगा दाना- दाना...। 
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यह दर्द आज चुनावी दौर में मुद्दे से लापता है। संसदीय चुनाव में स्थानीय मुद्दों पर बात करने से लड़ाके परहेज कर रहे हैं। आम लोगों के दर्द को दूर करने की बातों की बजाय एक दूसरे को कमजोर दिखाने में सियासी स्वांग को तवज्जो दे रहे हैं। इससे सियासी संग्राम अलग ही दिशा में बढ़ रहा है। 
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चुनावी क्षेत्र में पहुंच बढ़ाने के लिए रैलियों और नुक्कड़ सभाओं में समीकरण साधने के लिए दांव चले जा रहे हैं। इन सब में अहम समस्या की गूंज सुनाई ही नहीं दे रही है। मंडल की कैसरगंज, बहराइच और श्रावस्ती संसदीय सीटों पर बाढ़ की समस्या बड़े स्तर पर लाखों परिवारों को बेघर करती रही है। हर साल दस लाख से अधिक की आबादी बाढ़ का दंश झेलती है। 
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कैसरगंज क्षेत्र में बने दो बांधों, बहराइच और श्रावस्ती के छह बांधों को बचाने की जद्दोजहद में करोड़ों का बजट हर साल खपाया जाता है। बीते दस सालों से पक्के बांध की मांग हो रही है, लेकिन यह सियासी गलियारों में मुकाम तक पहुंच नहीं सका। 

यही नहीं, कैसरगंज क्षेत्र में तो ऐली परसौली के आगे बांध ही नहीं है, जिसके लिए लंबे समय से मांग हो रही है। बांध के विस्तार का मामला ठंडे बस्ते में है। इसकी भी गूंज चुनावी दौर में कहीं सुनाई नहीं पड़ रही है। 

बहराइच में भी बाढ़ सबसे बड़ी समस्या है और लोगों की परेशानी का सबब है, अब तक किसी दल ने इस पर बात नहीं की। सभी की निगाहें पार्टियों के वोट बैंक और चेहरों से प्रभावित मतों पर टिकी है।

रोजी- रोजगार की बात भी होती है तो एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए। स्थानीय दावेदार में कुछ तो अपनी हनक दिखाने में जुटे हैं तो कुछ चमक- दमक के फेर में पड़े हैं। पूरी सियासत व्यक्तिगत कीचड़ उछाल राजनीति से घिरती दिख रही है। 

गाड़ियों का रौब, जुबानी जंग भी
सियासी मैदान में चारों सीटों पर मुकाबला रोमांचक है। कोई गाड़ियों के रेला से रौब गालिब करने में जुटा है तो कोई जुबानी जंग तेज कर रहा है। कैसरगंज में तो दबदबे का शोर दोनों दल मचाने में जुटे हैं। एक दल के प्रत्याशी ने धमक दिखाई तो दूसरे फ्लावर नहीं फायर होने की चुनौती देने से बाज नहीं आए।

गोंडा में दोनों तरफ घराने और सादगी का दौर चल रहा है। श्रावस्ती में खामोशी के साथ दावेदार समीकरण तो साध रहे हैं, लेकिन व्यक्तिगत मुद्दों का ही ज्यादा शोर है। बहराइच में भी जातीय समीकरण साधने का खेल चला जा रहा है। यह सब देखकर आम लोग भी अवाक हैं और उनमें अपना खोज रहे हैं। 
 

सियासी लहर की सियायत कायम करने का दांव
बीते तीन चुनावों से लहरों का दौर चल रहा है, जिसे आज भी कायम रखने की जुगत में सियासी दल जुटे हैं। 1977 का चुनाव आपातकाल के बाद हुआ तो कांग्रेस विरोधी लहर का दम दिखा। 1991 में राम लहर की गूंज रही और कई सालों तक दलों ने इसे भुनाया और राज किया। इसके बाद 2009 में किसान कर्ज माफी व मनरेगा का जादू सिर चढ़कर बोला, जिसका असर भी दिखा। देवीपाटन मंडल की तीन सीटों पर कांग्रेस का पंजा लहराया।

2014 में मोदी लहर आई और चारों सीटों पर भाजपा का दबदबा कायम हुआ। 2019 में भी सर्जिकल स्ट्राइक, पुलवामा और किसान सम्मान निधि की गूंज रही। इससे मंडल की तीन सीटों पर भाजपा का कब्जा बरकरार रहा। श्रावस्ती में सिर्फ सपा व बसपा गठबंधन को जीत मिली। इस बार भी राम मंदिर के साथ ही राशन और शासन की गूंज भाजपा कर रही है तो आरक्षण व संविधान बचाने के मुद्दे के साथ जातीय समीकरण से मैदान सजाए जा रहे हैं।
 
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