UP: किस काम का 200 करोड़ का खुफिया तंत्र?
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प्रदेश में जिस तरह दंगे और कानून व्यवस्था बिगड़ने के एक के बाद एक मामले सामने आ रहे हैं उसने यूपी के खुफिया तंत्र की उपयोगिता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।
सरकार हर साल करीब 200 करोड़ रुपये इस तंत्र पर खर्च कर रही है। इस सबके बावजूद नतीजे नहीं दे पाने से न केवल पुलिस डिपार्टमेंट बल्कि प्रदेश की छवि को भी धक्का लग रहा है।
सोशल साइट्स पर एक ओर जहां यूपी की छवि दंगों और कानून व्यवस्था के बिगड़ते मामलों वाले प्रदेश की बन चुकी है।
दूसरी ओर सूबे के हर जिले में 50 से 80 की संख्या में मौजूद पुलिस विभाग के इंटेलीजेंस के अफसर और कर्मचारी अपने काम को उस कुशलता से अंजाम नहीं दे पा रहे, जिसकी उनसे अपेक्षा है।
अगर दे पा रहे होते तो सहारनपुर का ये हाल देखना पड़ता न मुजफ्फरनगर की शर्म झेलनी पड़ती। इस सबका खामियाजा जनता को जान माल के नुकसान के रूप में चुकाना पड़ रहा है।
खुफिया तंत्र फेल होने से बिगड़ते हैं हालात
पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह मौजूदा हालात को सीधे तौर पर इंटेलीजेंस फेल्योर का नतीजा बताते हैं।
उनका कहना है कि इंटेलीजेंस सिस्टम मकड़ी के जाले की तरह है, जिसमें जरा भी कंपन होता है तो मकड़ी को पता चल जाता है। लेकिन मकड़ी के क्रियाशील नहीं रहने से अब जाल दुरुस्त नहीं रहा।
दो दशक पहले तक इंटेलीजेंस ऑफिसर्स के अपने सोर्स व नेटवर्क होते थे। आज ऐसा नहीं है। ऑफिसर्स 4 अखबार पढ़कर अपनी रिपोर्ट बनाते हैं और सीनियर को भेज रहे हैं।
पहले ‘सांप्रदायिक सूचना’, ‘सांप्रदायिक गुंडा’, ‘रजिस्टर बदमाशान’ जैसे रजिस्टर नियम से मेंटेन किए जाते थे, सालों से प्रदेश में इनमें एंट्री नहीं हुई है।
साम्प्रदायिक विवाद की वजहें तक नहीं जानते अफसर
विक्रम सिंह कहते हैं कि पहले यूपी के बेस्ट अफसर को इंटेलीजेंस में भेजा जाता था क्योंकि मेहनत और दिमाग का काम है। लेकिन आज इसमें कौन जा रहे मुझे नहीं लगता कि टिप्पणी करके चीजें स्पष्ट करने की जरूरत है।
अफसरों को यह तक मालूम नहीं कि साम्प्रदायिक विवाद की वजहें क्या हैं? वे मौसम विभाग के पूर्वानुमान ‘हल्की बारिश हो सकती है, बाकी मौसम साफ रहेगा’ जैसी रिपोर्ट देते हैं। इनके आधार पर तनाव या दंगा स्थल पर पहुंचकर ए अंदाज में अपने वाहन से उतरते हैं।
खुद मेरा वीवीआईपी मूवमेंट के दौरान का एक अनुभव है जब इंटेलीजेंस ने खतरे की आशंका जताती रिपोर्ट भेजी, इसमें वीवीआईपी को 24 तरह से जान के खतरे बताए गए थे जिनमें फिदाईन हमले से लेकर खाने में जहर देकर मार दिए जाने की आशंकाएं शामिल थीं।
यानी कोई चीज स्पेशफिक नहीं। इन पर कोई कितना विश्वास करेगा?
भरोसा नहीं रह गया
पूर्व डीजीपी आईसी द्विवेदी बताते हैं कि इंटेलीजेंस का काम शांति भंग कहां हो सकती है, इसकी पहले से जानकारी रखना है और उसे रोकने के लिए सिस्टम को मदद करना है।
सहारनपुर की घटना में महसूस हो रहा है कि मामला बहुत दिनों से चल रहा था। द्विवेदी कहते हैं कि इसमें क्षेत्रीय थानों और इंटेलीजेंस के स्टाफ के बीच तालमेल बेहतर हो सकता था। दरअसल पुलिस और सरकार पर नागरिकों का भरोसा डिगता दिख रहा है।
पुलिस दरअसल नागरिकों की मदद से ही अपना काम कर सकती है अगर वह नागरिकों के सामने अपना भरोसा तक कायम नहीं रख पाएगी तो काम कैसे कर पाएगी? जिस तरह से माहौल तनावपूर्ण हो रहे हैं इंटेलीजेंस एजेंसियों को खुद ही हाईअलर्ट पर आ जाना चाहिए।