यूपी: हाइवे घोटाले की जांच भी सीबीआई से कराने की सिफारिश
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यूपी सरकार ने दिल्ली-सहारनपुर-यमुनोत्री फोर लेन सड़क निर्माण घोटाले की जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश की है। उत्तर प्रदेश स्टेट हाइवे अथॉरिटी (उपशा) ने अगस्त 2011 में इस सड़क को दो लेन से चार लेन किए जाने का ठेका मेसर्स एसईडब्ल्यू-एलएसवाई हाईवेज लि. और प्रसाद एंड कंपनी को दिया था।
इन कंपनियों ने महज 13 प्रतिशत काम करके बैंक अधिकारियों व सीए की मदद से 603 करोड़ रुपये का भुगतान करा लिया। जबकि कंपनी ने मात्र 148 करोड़ रुपये का ही काम किया गया था।
उपशा के मुख्य कार्यपालक अधिकारी रहे नवनीत सहगल के निर्देश पर इस परियोजना के महाप्रबंधक शिव कुमार अवधिया ने 20 फरवरी 2017 को एफआईआर दर्ज कराई थी।
इसमें 14 बैंकों के अधिकारियों, कंपनी के डायरेक्टर व प्रमोटर डायरेक्टर के खिलाफ 455 करोड़ रुपये के गबन का आरोप लगाया गया था। वहीं, सहगल ने इसकी जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश भी की थी। अब राज्य सरकार ने इस मामले की जांच सीबीआई से कराने का फैसला किया है।
क्या है पूरा मामला
दिल्ली-सहारनपुर से यमुनोत्री मार्ग (एसएच 57) तक सड़क बनाने का काम मेसर्स एसईडब्ल्यू-एलएसवाई हाईवेज लिमिटेड को दिया गया था। इसके लिए निर्माण कंपनी व उपशा के बीच अगस्त 2011 में अनुबंध हुआ। इसके तहत 1735 करोड़ रुपये की लागत से इस सड़क को टू लेन से फोर लेन किए जाने के लिए 30 मार्च 2012 से 900 दिनों की समयसीमा तय की गई।
इसके लिए निर्माण कंपनी के दोनों प्रमोटर डायरेक्टर सुकरवा अनिल कुमार और अलोरी साईं बाबा ने 1,700 करोड़ का लोन 14 बैंकों से लेने का अनुबंध किया। उपशा ने आरोप लगाया कि दोनों प्रमोटर डायरेक्टरों ने बैंको के स्वतंत्र अभियंता और चार्टर्ड अकाउंटेंट से मिलीभगत कर जाली जांच रिपोर्ट बनवाई और 14 बैंकों से लोन ले लिया। वहीं, बैंकों ने यह भी जांचने की कोशिश नहीं की कि जिस काम के लिए लोन लिया गया है, वह किस स्थिति में है।
इस गड़बड़ी का खुलासा तब हुआ, जब पता चला कि सामान्य लोन अनुबंध में परियोजना की लागत 1,735 करोड़ रुपये थी और फाइनेंशियल प्लान में यह राशि 2,770 करोड़ रुपये बताई गई। 20 फरवरी को दर्ज एफआईआर के मुताबिक, प्रमोटर डायरेक्टरों ने निर्माण कार्य एक अप्रैल 2012 से शुरू किया और नवंबर 2013 में रोक दिया। पेड़ कटान को लेकर पर्यावरण मंत्रालय का बहाना बनाते हुए 721 दिन का और समय ले लिया गया, लेकिन इसके बाद भी काम शुरू नहीं किया गया।
इस दौरान 14 बैंकों से 603 करोड़ 67 लाख 77 हजार 505 रुपये का लोन ले लिया गया। जबकि मात्र 13.33 प्रतिशत काम ही किया गया था। इस काम की लागत लगभग 148 करोड़ रुपये थी। आरोप है कि निर्माण कंपनी के डायरेक्टरों व प्रमोटर डायरेक्टरों ने 17 मार्च 2012 से 25 जुलाई 2016 के बीच पदासीन 14 बैंकों के प्रबंधकों, बैंकों के स्वतंत्र अभियंताओं और चार्टर्ड अकाउंटेंट व मेसर्स इंडिया इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनी लि. के साथ मिलकर 455 करोड़ 48 लाख 77 हजसा 505 रुपये का गबन किया है।
इनके खिलाफ दर्ज कराई एफआईआर
उपशा की एफआईआर में कंपनी के प्रमोटर डायरेक्टर सुकरवा अनिल कुमार, अलोरी साईं बाबा, डायरेक्टर पीएस मूर्ति व यरलागदा वेंकटेशराव को नामजद किया है।
इनके अलावा सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, कॉर्पोरेशन बैंक, देना बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, इंडिया इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनी लि., इंडियन ओवरसीज बैंक, ओरिएंटल बैंक ऑफ कामर्स, पीएनबी, पंजाब एंड सिंध बैंक, स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ पटियाला, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया व विजया बैंक के तत्कालीन स्वतंत्र अभियंता और चार्टर्ड अकाउंटेंट को नामजद किया गया है।