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पढ़ें, यूपी बजट से जुड़ी वो बातें जो नहीं जानते हैं आप

Thu, 18 Feb 2016 02:27 AM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 18 Feb 2016 02:27 AM IST
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UP finance secretary speaks about up budget.

बजट भले ही वित्त विभाग और उसके नेतृत्व में विशेषज्ञों की एक टीम बनाती है, पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव उस पर बहुत ही बारीक नजर रखते हैं।

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वे बजट बनाने के दौरान अपनी प्राथमिकताओं के साथ वित्तीय प्रबंधकों की सलाह को भी बेहद अहमियत देते हैं। यह कहना है लगातार तीसरी बार बजट बनाने वाले प्रमुख सचिव वित्त राहुल भटनागर का।
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1983 बैच के आईएएस भटनागर शुरू से ही इस सरकार की ‘गुडबुक’ में रहे हैं। वित्त के साथ गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग व संस्थागत वित्त जैसे भारी-भरकम विभाग में भी वे मुखिया हैं।
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उन्होंने बजट बनाने व खर्च की व्यवस्था में कई सुधार भी किए हैं। ‘अमर उजाला’ ने उनसे बजट तैयार करने के दौरान आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक सीमाओं और उसके तमाम पहलुओं को समझने की कोशिश की।

बजट मतलब सरकार की साल भर की प्राथमिकताएं

UP finance secretary speaks about up budget.

प्रश्न- बजट किस तरह बनाते हैं? क्या खास बदलाव हुए हैं इसकी कार्यशैली में?

जवाब- इस सरकार ने साल का विकास एजेंडा बनाने की शुरुआत कर एक बड़ी पहल की है। यह बजट बनाने की कार्यवाही शुरू होने तक फाइनल कर लिया जाता है। वास्तव में यही सरकार की साल भर की प्राथमिकताएं होती हैं।

इसमें जिन कामों में पैसे की जरूरत होती है, बजट में उसे उपलब्ध कराने की वित्त विभाग की जिम्मेदारी है। इससे प्राथमिकताएं तय करने में आसानी हो जाती है।

दूसरा, जो काम पहले से चल रहे हैं, उन्हें पूरा करने या आगे बढ़ाने के लिए पैसे का बंदोबस्त बजट की शीर्ष प्राथमिकता होती है। पहले विभागों से प्रस्ताव मांग लिए जाते थे और वित्त विभाग प्राथमिकताएं तय करता था।

अब विभाग से प्रस्ताव मांगने के बाद हर विभाग के प्रमुख सचिव के साथ बातचीत की जाती है। उनके विभाग की प्राथमिकताएं उनसे ही तय कराई जाती हैं। इसके बाद मुख्य सचिव और फि र मुख्यमंत्री से बात कर बजट प्रस्तावों को फाइनल किया जाता है।

इन मुद्दों पर दिया गया खास ध्यान

UP finance secretary speaks about up budget.

प्रश्न- सीमित वित्तीय संसाधन में राजनीतिक नेतृत्व कई बार जो चाहता होगा, संभव नहीं होता होगा?

जवाब-
बजट सरकार का होता है। मुख्यमंत्री उसके मुखिया हैं। अच्छी बात यह है कि मुख्यमंत्री सूबे की वित्तीय सीमाओं और परिस्थितियों पर पैनी नजर रखते हैं।

कम लोग जानते होंगे कि मुख्यमंत्री वित्तीय प्रबंधन की कसौटियों के सख्ती से पालन के हिमायती हैं। किसी एजेंडे पर कहीं कोई सीमा नजर आई तो उसे मुख्यमंत्री को बताया गया। उन्होंने उसे पूरी तवज्जो दी।

शायद यही वजह है कि बजट हर दृष्टि से संतुलित रहा है। एक साथ कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, युवा व इन्फ्रास्ट्रक्चर पर पूरा ध्यान दिया गया है। बजट पर हर स्तर से अच्छा रेस्पांस रहा है। कई अर्थशास्त्रियों ने मौजूदा आर्थिक परिदृश्य में बजट की तारीफ की है।

क्यों नहीं टूट रहा है पब्लिक परसेप्‍शन

UP finance secretary speaks about up budget.

प्रश्न- लेकिन बजट खर्च को लेकर अब भी अनियमितता की बात सामने आती है। ‘मार्च लूट’ का पब्लिक परसेप्शन क्यों नहीं टूट रहा है?

जवाब-
बजट को सिर्फ आंकड़ों के आईने में नहीं देखा जा सकता है। दरअसल बजट एक अनुमान होता है। उसमें दिखने वाली रकम खर्च होने की तमाम परिस्थितियां और स्टेज होते हैं।

वित्तीय वर्ष के अंत में काफी बजट खर्च होने की कई परिस्थितियां होती हैं। मसलन, छात्रवृत्ति के फॉर्म स्कूलों में दाखिलों के बाद भरे जाएंगे। इस प्रक्रिया में काफी टाइम लगता है। रबी में किसानों को अनुदान वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में ही मिलेगा।

केंद्र से अनुमानित अनुदान ही यदि नहीं मिला तो भी बजट में प्रावधान की गई रकम डंप नजर आएगी। इसके अलावा अभी यह कार्य संस्कृति डवलप नहीं हो पाई है कि बजट से पहले ही संबंधित योजना या परियोजना का प्रारूप फाइनल हो जाए। इससे सही बजट अनुमान लगाया जा सके और बजट पास होते ही अप्रैल से खर्च शुरू हो सके।

प्रश्न- सरकार ने अब तक का सबसे बड़ा बजट फाइनल किया है। बजट खर्च का जो मौजूदा हाल है, इसमें तो बड़ी रकम काम पर खर्च ही नहीं हो पाएगी?

जवाब-
बजट को तेजी से खर्च करने के लिए कई उपाय किए गए हैं। इनके नतीजे आने शुरू हो गए हैं। पहले विभाग 40 लाख रुपये तक की योजनाएं ही खुद बनाते थे। 40 लाख से पांच करोड़ तक नियोजन विभाग की मूल्यांकन समिति को भेजी जाती थी।

पांच करोड़ से ऊपर के लिए व्यय वित्त समिति आना होता था। अब पांच करोड़ की परियोजनाएं वे स्वयं बना सकते हैं। यदि विभाग में मुख्य अभियंता हैं तो पांच से 25 करोड़ तक की योजनाएं बना सकते हैं।

सूबे पर ऋणजाल लगातार बढ़ा

UP finance secretary speaks about up budget.

प्रश्न- सूबे पर ऋणजाल लगातार बढ़ा है। यह किस तरह की चुनौतियां लाएगा?

जवाब-
यह सही है कि बिजली कंपनियों की माली हालत सुधारने के लिए सरकार को ऋण बांड लाना पड़ रहा है, मगर यह कानून के अंतर्गत है। केंद्र ने ‘उदय’ योजना के तहत इसे जीएसडीपी की ऋण सीमा से बाहर किया है। विकास के लिए 24 घंटे बिजली जरूरी है।

बिजली सेक्टर में सुधार के लिए ही ऐसा करना पड़ा है। इसके अलावा प्रदेश सरकार की हर साल सकल राज्य घरेलू उत्पाद केंद्र तय करता है। इसके तीन प्रतिशत तक ही ऋण ले सकते हैं। सरकार इस मानक का सख्ती से पालन कर रही है।

तीसरी बात, यदि किसी काम को तय सीमा के भीतर वित्तीय संस्थाओं से ऋण लेकर जल्दी पूरा कर सकते हैं, तो फिर उसे वर्षों तक लटकाने से क्या फायदा है? ऋण लेना बुरा नहीं है, उसका मैनेजमेंट सही होना चाहिए। हम ऐसा ही कर रहे हैं।

राज्य सरकार टैक्स पर करती है समय-समय पर फैसला

UP finance secretary speaks about up budget.

प्रश्न- केंद्र सरकार संसद से टैक्स पर निर्णय करती है जबकि सूबे में साल भर यह चलता रहता है?

जवाब-
केंद्र सरकार टैक्स पर फैसले एक्ट के जरिये करती है। इसके लिए उसे संसद के सामने जाना होता है। एक्ट में प्रावधान है कि राज्य सरकार एक निश्चित सीमा तक टैक्स घटाने-बढ़ाने की अनुमति कैबिनेट से ले सकती है। इसीलिए राज्य सरकार अपनी जरूरतों और परिस्थितियों को देखते हुए समय-समय पर टैक्स के बारे में फैसला करती है।

प्रश्न- सातवें वेतन आयोग की चुनौती से निपटने की क्या योजना है?
जवाब- सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को पहले केंद्र को लागू करना है। अभी तक केंद्र ने उस पर फैसला नहीं किया है। केंद्र की मंजूरी के बाद प्रदेश सरकार इस पर विचार के लिए अपनी वेतन समिति बनाती है। उसकी सिफारिशों के हिसाब से निर्णय लेकर लागू किया जाता है।

प्रदेश सरकार इसी प्रक्रिया से आगे बढ़ेगी। यदि नवंबर-दिसंबर तक सिफारिशें लागू करने की परिस्थितियां आती हैं, तो हम तैयार हैं।

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