यूपी: पीजीआई के बाद अब केजीएमयू में खतरनाक फंगस का हमला, दो की मौत, एक की हालत गंभीर
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एसजीपीजीआई के बाद अब केजीएमयू की आईसीयू में खतरनाक फंगस कैंडिडा आरिस का हमला हुआ है। इसकी चपेट में आए तीन मरीजों में से दो की मौत हो गई। वहीं, एक की हालत गंभीर बनी हुई है। उसे अन्य मरीजों से अलग कर दिया गया है।
ट्रॉमा वेंटिलेटर यूनिट (टीवीयू) के जिस वार्ड में ये मरीज थे, उसमें दूसरों की भर्ती रोक दी गई है। हालांकि, केजीएमयू प्रशासन का कहना है कि मौत कैंडिडा आरिस से हुई है या अन्य कारणों से, यह स्पष्ट नहीं है। कैंडिडा आरिस दिसम्बर से भारत के अस्पतालों में कहर बरपा रहा है।
दिल्ली के विभिन्न अस्पतालों में इसकी पुष्टि होने के बाद एसजीपीजीआई ने जांच शुरू कर दी थी। यहां दिसंबर 2017 से 15 मई 2019 तक 25 मरीजों में यह फंगस पाया गया। इसके बाद दो अन्य मरीज में भी इसकी पुष्टि हुई है। अब केजीएमयू की जांच में तीन मरीजों में इस फंगस की पुष्टि हुई है।
तीन जुलाई को ट्रॉमा सर्जरी विभाग में भर्ती मरीज में इसके लक्षण मिले। इसके बाद दो अन्य मरीजों की जांच की गई। 13 जुलाई को हॉस्पिटल इंफेक्शन कंट्रोल टीम ने टीवीयू में भर्ती सभी मरीजों के खून के नमूने लिए। माइक्रोबायोलॉजी विभाग की जांच के दौरान दो में कैंडिडा आरिस की पुष्टि हुई।
मरीजों की मौत के बाद दहशत
बाद में एक महिला में भी यह फंगस मिला। इस संबंध में माइक्रोबायोलॉजी विभाग के प्रो. प्रशांत गुप्ता ने ट्रॉमा वेंटिलेटर यूनिट प्रभारी को पत्र लिखकर आइसोलेशन की सलाह दी। तीनों मरीजों को आइसोलेट करने के बाद दूसरे वार्ड में भर्ती किया गया।
मरने वाला एक मरीज टीवीयू से स्थानांतरित हुआ था, जबकि महिला क्वीन मैरी से आई थी। बताया जाता है कि उसे प्रसव के बाद हालत गंभीर होने पर ट्रॉमा सेंटर भेजा गया था, जहां रविवार को उसकी मौत हो गई। दूसरे मरीज ने सोमवार को दम तोड़ा।
मरीजों की मौत के बाद केजीएमयू के चिकित्सकों, नर्सिंग स्टाफ में दहशत का माहौल है। हालांकि, फंगस से ग्रसित होने वाले मरीजों के इलाज में लगी टीम को आइसोलेट कर दिया गया है। प्रो. जीपी सिंह का कहना है कि टीवीयू के चिकित्सकों एवं कर्मचारियों की दोबारा जांच कराई जाएगी।
उन्हें कोई खतरा न हो, इस पर ध्यान दिया जा रहा है। ट्रॉमा वेंटिलेटर यूनिट के एक वार्ड में छह बेड हैं। इनमें मरीजों की भर्ती पर रोक लगा दी गई है। वार्ड को आइसोलेट किया जा रहा है।
हलकान रहा केजीएमयू प्रशासन
ये हैं प्रमुख लक्षण
मरीज को बार-बार बुखार आता है। साथ ही त्वचा पर लाल चकत्ते पड़ जाते हैं।
पेशाब नली में संक्रमण होता है। ऐसे में फंगल कल्चर टेस्ट होता है। इसमें फंगस की पुष्टि होने पर तत्काल सावधानी बरती जाती है।
‘अमर उजाला’ ने किया था आगाह
‘अमर उजाला’ ने 19 मई के अंक में ‘अस्पतालों की आईसीयू में कैंडिडा आरिस फंगस का खतरा’ शीर्षक से खबर प्रकाशित कर आगाह किया था। इस खबर में एसजीपीजीआई में इससे प्रभावित मरीज मिलने की जानकारी दी गई थी। साथ ही बताया था कि यह फंगस कितना खतरनाक है। ‘अमर उजाला’ में खबर प्रकाशित होने के बाद सीएमओ डॉ. नरेंद्र अग्रवाल ने सभी अस्पतालों को अलर्ट जारी किया था।
कैंडिडा आरिस से मरीजों की मौत को केजीएमयू प्रशासन छुपाने की कोशिश में लगा रहा। दिनभर तीन मरीजों में यह फंगस पाए जाने की बात बताई गई, लेकिन दो के दम तोड़ने की बात से अनभिज्ञता जाहिर की गई। रात करीब साढे़ नौ बजे टीवीयू प्रभारी डॉ. जीपी सिंह ने महिला मरीज की मौत की पुष्टि की।
बताया कि क्वीन मैरी से आने वाली मरीज की एक दिन पहले मौत हुई है। वह भी कैंडिडा आरिस से ग्रसित थी। उन्होंने महिला का नाम बताने से इनकार किया। कुछ देर बाद उन्होंने दूसरे मरीज की मौत की भी पुष्टि की। वहीं, रात करीब 10 बजे केजीएयू मीडिया प्रभारी डॉ. संदीप तिवारी ने बताया कि एक पुरुष मरीज की मौत की जानकारी है। उसकी आंत फंट गई थी। यह कहना संभव नहीं है कि मौत कैंडिडा आरिस से हुई है या किसी अन्य कारण से। महिला मरीज के बारे में जानकारी नहीं है।
एसजीपीजीआई में हो रहा शोध
खतरनाक है कैंडिडा आरिस फंगस
यह फंगस खासतौर से आईसीयू में भर्ती होने वाले बेहद कमजोर इम्यून सिस्टम वाले मरीजों को अपना शिकार बनाता है। जिन्हें कैथेटर लगा होता है या जो लंबे समय तक आईसीयू में रहते हैं, उन्हें ज्यादा खतरा रहता है। ज्यादातर मरीजों की करीब 30 दिनों में मौत हो जाती है।
यही वजह है कि आईसीयू के चिकित्सकों एवं कर्मचारियों के लिए विशेष प्रोटोकॉल अपनाया जा रहा है। मरीजों की अलग से फंगल कल्चर जांच कराई जाती है। कैंडिडा आरिस से संक्रमित ज्यादातर मरीजों पर आमतौर पर इलाज के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले एंटी फंगल्स का असर नहीं होता है। इन पर एंटी बैक्टीरिया दवाइयों का भी असर नहीं होता है।
एसजीपीजीआई की माइक्रोबायोलॉजी विभाग की डॉ. उज्ज्वला घोषाल ने बताया कि संस्थान में इस फंगस को लेकर शोध किया जा रहा है। भारत में इसकी पहचान पहली बार 2011 में हुई थी। यह अब तक 35 देशों में फैल चुका है।
इसका पहला शिकार जापानी बुजुर्ग था। वैज्ञानिकों ने इसके जीनोम (जीन समूह) का स्वरूप अंतरराष्ट्रीय डेटाबेस में साझा किया। एंटी-फंगल ड्रग्स (दवाएं) काफी महंगी होती हैं। संस्थान में दिसंबर 2017 से मई 2019 तक 25 मरीजों में इस फंगस की पुष्टि हुई है। इसके बाद भी दो मरीज पाए गए हैं। इनमें आधे से ज्यादा की जान बचा ली गई है।
ट्रॉमा वेंटिलेटर यूनिट में 20 बेड हैं। छह बेड वाले वार्ड में जांच के दौरान तीन मरीजों में कैंडिडा आरिस की पुष्टि हुई थी। इन्हें आईसोलेट कर दूसरे वार्ड में रखा गया। महिला मरीज की एक दिन पहले मौत हो गई थी। दूसरे मरीज की मौत की जानकारी नहीं है। टीवीयू के अन्य 14 बेड वाले मरीजों में किसी तरह का संक्रमण नहीं पाया गया है। - डॉ. जीपी सिंह, प्रभारी, टीवीयू, केजीएमयू
मेरी जानकारी में एक पुरुष मरीज की मौत हुई है। दूसरे के बारे में जानकारी नहीं है। इन मरीजों की मौत कैंडिडा आरिस से हुई है या किसी अन्य कारण से यह कह पाना संभव नहीं है, क्योंकि मरीज गंभीरावस्था में आए थे। - डॉ. संदीप तिवारी, मीडिया प्रभारी केजीएमयू
एसजीपीजीआई के मरीजों में यह फंगस मिलने की जानकारी के बाद ही सभी सरकारी और निजी अस्पतालों को पत्र जारी किया गया था। किसी भी अस्पताल से इस तरह के मरीज मिलने की पुष्टि नहीं हुई है। अब केजीएमयू के मरीजों में कैंडिडा आरिस की पुष्टि हुई है तो विशेष सावधानी बरतनी पड़ेगी। सभी अस्पतालों को दोबारा आगाह किया जाएगा। - डॉ. नरेंद्र अग्रवाल, सीएमओ