इन सीटों पर दिग्गजों को भी नहीं जीत का यकीन
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मोदी लहर या सत्ता विरोधी लहर के दावों के बावजूद इन सीटों पर दिग्गज जीत को लेकर आशंकित है, वो जीत की बात तो कह रहे हैं लेकिन इसके पीछे मजबूत तर्क नहीं दे पा रहे।
इस बार आम चुनाव में राजनीतिक दलों के कई दिग्गज ‘लेकिन’ के चक्कर में फंसे हैं। इन दिग्गजों ने चुनाव पूरी शिद्दत से लड़ा है और हवा भी तकरीबन उनके अनुकूल है लेकिन प्रतिद्वंद्वियों की कड़ी चुनौती और स्थानीय समीकरणों के चलते वे जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो पा रहे हैं।
इस आशंका ने इनकी धुकधुकी बढ़ा रखी है कि कहीं किसी वर्ग या संप्रदाय विशेष के मतों का ध्रुवीकरण उनका खेल बिगाड़ न दे।
‘लेकिन’ के फेर में जिन दिग्गजों की सीट फंसी दिखाई दे रही है, उनमें लखनऊ से भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह, अमेठी से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, आजमगढ़ से सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव, बागपत से राष्ट्रीय लोकदल के चौ. अजित सिंह, कानपुर से भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी भी शामिल हैं।
मुलायम, मोदी की प्रतिष्ठा दांव पर
ज्यादातर सीटों पर चुनाव हो चुके हैं जबकि कुछ दिग्गजों की परीक्षा अभी बाकी है। मसलन आजमगढ़ में मुलायम के भाग्य का फैसला 12 मई को होगा लेकिन उनकी जीत को लेकर शंका बनी हुई है।
रायबरेली में सोनिया गांधी, वाराणसी में नरेंद्र मोदी तथा मैनपुरी में मुलायम सिंह यादव को छोड़कर ज्यादातर हाई प्रोफाइल सीटों पर दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है।
सत्ता विरोधी रुझान ने जहां कांग्रेसी दिग्गजों की चुनावी गणित बिगाड़कर रख दी है, वहीं मोदी लहर के बावजूद भाजपा के कई दिग्गजों को जीत की राह आसान नहीं दिखाई दे रही है।
राजनाथ को कांग्रेस की कड़ी चुनौती
अटल की विरासत संभालने लखनऊ पहुंचे भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह को यहां कांग्रेस की डॉ. रीता बहुगुणा जोशी कड़ी टक्कर दे रही हैं। राजनाथ को लखनऊ में पसीना भी काफी बहाना पड़ा।
मोदी लहर उनके लिए ऑक्सीजन साबित हुई है लेकिन रीता के पक्ष में मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण के चलते उनके समीकरण कुछ गड़बड़ाए भी हैं। हालांकि राजधानी में हर तरफ चर्चा यही है कि राजनाथ जीत तो सकते हैं लेकिन देखने वाली बात यह होगी कि अंतर कितना रहता है।
कुछ ऐसे भी हैं जो रीता की जीत का दावा कर रहे हैं। फिलहाल दोनों के भाग्य ईवीएम में बंद हैं और 16 मई को ही पता चलेगा बाजी किसके हाथ लगती है।
राहुल और स्मृति कौन होगा विजेता
पहली बार अमेठी में राहुल गांधी को असल चुनौती झेलनी पड़ी है। इससे पहले के चुनाव में मुकाबले में कोई मजबूत उम्मीदवार न होने की वजह से राहुल की एकतरफा जीत होती रही लेकिन अबकी बार सही मायने में उन्हें चुनाव लड़ना पड़ा।
भाजपा की स्मृति ईरानी और आप के कुमार विश्वास ने राहुल का विजय रथ रोकने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। खुद नरेंद्र मोदी भी राहुल के गढ़ में आकर उन्हें ललकार गए।
राहुल की जीत तय तो मानी जा रही है लेकिन भाजपा ने जिस तरह से उनकी घेरेबंदी की है, उसे देखते हुए यह बहुत आसान नहीं नजर आ रही है।
आजमगढ़ में कमजोर पड़े मुलायम
मुलायम सिंह यादव मैनपुरी के अलावा इस बार आजमगढ़ से भी चुनाव मैदान में हैं। उनके सामने भाजपा के रमाकांत यादव हैं।
हालांकि आजमगढ़ में 12 मई को वोट डाले जाने हैं लेकिन वहां यादवों के ही दो खेमों में बंट जाने से मुकाबला काफी दिलचस्प हो चला है।
अभी से ही मुलायम की जीत-हार को लेकर चर्चाएं चल रही हैं। हिंदू-मुस्लिम मतदाताओं का ध्रुवीकरण यहां के नतीजों पर निश्चित तौर पर असर डालने जा रहा है। ऐसे में बाजी किसके हाथ लगेगी, कहा नहीं जा सकता।
अजित सिंह को कड़ी चुनौती
चौ. चरण सिंह की कर्मभूमि और अलग मिजाज के लिए देश भर में पहचान रखने वाली बागपत संसदीय सीट पर चौ. अजित सिंह कड़े मुकाबले में फंसे हैं।
1998 में 13 महीने के अल्प कार्यकाल को छोड़कर चौ. अजित सिंह 1989 से लगातार यहां से सांसद चुने जाते रहे हैं।
जाट-मुस्लिम समीकरण के सहारे इस सीट पर अजित सिंह की चुनावी नैया पार लगती रही है। इस बार उनके सामने अपना गढ़ बचाने की चुनौती है। मुजफ्फरनगर दंगों की वजह से समीकरण पूरी तरह से बदले बताए जा रहे हैं।
उन्हें भाजपा के डॉ. सत्यपाल सिंह से कड़ी चुनौती मिली है। वोटरों पर मोदी लहर के असर को देखते हुए उनकी जीत को लेकर संशय बना हुआ है।
कांग्रेस विरोधी लहर
केंद्रीय विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद एक बार फिर अपनी पारंपरिक सीट से चुनाव मैदान में हैं।
कांग्रेस के प्रति सत्ता विरोधी रुझान के बावजूद सलमान जीत की उम्मीद लगाए हुए हैं लेकिन भाजपा के मुकेश राजपूत व सपा के रामेश्वर सिंह यादव ने उनका रास्ता रोकने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।
त्रिकोणीय मुकाबले में बाजी किसके हाथ लगेगी, यह फिलहाल पहेली बना हुआ है।
मुश्किल में हैं मुरली
कानपुर की सीट हाई प्रोफाइल सीटों में एक है। कांग्रेस से केंद्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल यहां से एक बार फिर लोकसभा में पहुंचने की कोशिश में हैं तो भाजपा ने अपने दिग्गज नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी को मैदान में उतारा है।
मुकाबला कांटे का है। मोदी लहर के बावजूद जोशी को काफी कड़ी मेहनत करनी पड़ी है। यहां भी जीत-हार काफी कुछ मुस्लिम वोटरों के रुख पर निर्भर करेगी।
गाजियाबाद से वी के सिंह चुनाव में
बागपत के बगल की गाजियाबाद सीट पर पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह भाजपा उम्मीदवार हैं। उनका मुकाबला कांग्रेस उम्मीदवार व सिने अभिनेता राज बब्बर से है।
मोदी लहर के चलते वीके सिंह की स्थिति मजबूत मानी जा रही है लेकिन यहां मुसलमानों का रुख नतीजों में उलटफेर कर सकता है। पलड़ा तो वीके सिंह का ही भारी है लेकिन राज बब्बर को भी कम नहीं आंका जा रहा।
क्या पूरा होगा ड्रीमगर्ल का ड्रीम
इस मुकाबले में किसका पलड़ा भारी रहेगा, यह बता पाने की स्थिति में कोई नहीं है। मुकाबला कांटे का है सो दोनों खेमों को नतीजों का बेसब्री से इंतजार है।
डिंपल को चुनौती
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी और मौजूदा सांसद डिम्पल यादव इस सीट से 2012 में पहली बार निर्विरोध निर्वाचित हुई थीं।
स्थानीय समीकरण पक्ष में होने के बावजूद इस सीट पर मोदी लहर के असर ने सपाइयों को आशंकित कर रखा है।
डिम्पल के साथ-साथ अखिलेश ने भी यहां काफी मेहनत की और मुलायम सिंह भी अपनी बहू के लिए वोट मांगने पहुंचे लेकिन भाजपा के सुब्रत पाठक ने उनके सामने कड़ी चुनौती पेश की है। देखने वाली बात यह होगी कि डिम्पल बाजी मारती हैं या सुब्रत।