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अब मसूढ़े न होने पर भी आसानी से लग जाएंगे दांत
Updated Fri, 10 Jul 2015 04:06 PM IST
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मसूढ़े न होने पर भी अब बाई कार्टिकल इम्प्लांट से दांत लगाए जा सकेंगे। खासतौर से पैदाइशी मसूढ़े न बने हो या फिर बहुत बूढ़े लोग जिनके मसूढ़े बिलकुल खत्म हो चुके हों, उनके लिए ये तकनीक प्रभावी है।
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केजीएमयू के दंत संकाय में जल्दी ही ये सुविधा शुरू होने जा रही है। टाइटेनियम से बने इस इम्प्लांट से बिना दांत वाले लोग भी सामान्य लोगों की तरह खाना खा सकेंगे। इसके साथ ही दांतों की वजह से उनका चेहरा भी सही दिखेगा। ओरल एंड मैक्सिलो फेशियल सर्जरी विभाग में जल्दी ही इस तकनीक से दांत लगाए जाएंगे।
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ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जरी विभाग के डॉ. यूएस पाल ने बताया कि जिन लोगों के दांत टूट गए हों उनके लिए इम्प्लांट लगाने की तकनीक है। अब ऐसे मरीज जिनके मसूढ़े विकसित न हुए हों, उनमें भी इम्प्लांट लगाकर दांत लगाए जा सकते हैं।
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इसके लिए बाई कार्टिकल इम्प्लांट लगाया जाता है। ये विशेष तरह के इम्प्लांट होते हैं जो मसूढ़ों की जगह जबड़े की हड्डी में लगाए जाते हैं। पहले हड्डी में छेद किया जाता है। इसके बाद इन इम्प्लांट को वहां लगा दिया जाता है।
इसके ऊपर दांत लगाए जाते हैं। बाई कर्टिकल तकनीक से अब ऐसे बच्चे जिनमें पैदाइशी विकृति के कारण दांत न निकले और मसूढ़े भी न हों, उन्हें दांत लगाया जा सकता है। अभी तक ऐसे बच्चे समाज के सामने नहीं आ पाते थे। क्योंकि उन्हें सामान्य ‘डेंचर’ भी नहीं लगाया जा सकता है। क्योंकि डेंचर लगाने के लिए मसूढ़ों का होना जरूरी होता है।
इम्प्लांट और दांत एक साथ लगाना भी संभव
डॉ. लक्ष्य कुमार ने बताया कि अब ऐसी तकनीक आ गई हैं। जिससे एक ही दिन में इम्पलांट और दांत लगाना संभव हो गया है। पहले मरीज को इम्प्लांट लगाया जाता था।
तीन तीन महीने तक इम्प्लांट के सेट होने का इंतजार किया जाता था। इसके बाद दांत लगाकर फिर से तीन महीने तक मरीज को इंतजार करना पड़ता था। अब नई तकनीक से एक ही बार में इम्प्लांट और दांत भी लगाए जाने लगे हैं। इससे मरीज मात्र तीन महीने में खाने-पीने लायक हो जाता है।
डॉ. लक्ष्य कुमार ने बताया कि सभी इम्प्लांट विदेश से आते हैं, इसलिए काफी महंगे होते हैं। इसके बावजूद केजीएमयू में इम्प्लांट लगवाना काफी सस्ता होता है, क्योंकि यहां सर्जरी व अन्य शुल्क काफी कम है।
यदि केजीएमयू में कोई इम्प्लांट 20 हजार लगता है तो प्राइवेट डेंटिस्ट इसका 1 से 1.5 लाख रुपये तक लेते हैं। सबसे अच्छा इम्प्लांट टाइटेनियम का माना जाता है। उन्होंने बताया कि बाई कार्टिकल इम्प्लांट ऐसे लोगों के लिए वरदान है जिनको अभी तक किसी भी तकनीक से दांत नहीं लग सकता था।
तीन तीन महीने तक इम्प्लांट के सेट होने का इंतजार किया जाता था। इसके बाद दांत लगाकर फिर से तीन महीने तक मरीज को इंतजार करना पड़ता था। अब नई तकनीक से एक ही बार में इम्प्लांट और दांत भी लगाए जाने लगे हैं। इससे मरीज मात्र तीन महीने में खाने-पीने लायक हो जाता है।
डॉ. लक्ष्य कुमार ने बताया कि सभी इम्प्लांट विदेश से आते हैं, इसलिए काफी महंगे होते हैं। इसके बावजूद केजीएमयू में इम्प्लांट लगवाना काफी सस्ता होता है, क्योंकि यहां सर्जरी व अन्य शुल्क काफी कम है।
यदि केजीएमयू में कोई इम्प्लांट 20 हजार लगता है तो प्राइवेट डेंटिस्ट इसका 1 से 1.5 लाख रुपये तक लेते हैं। सबसे अच्छा इम्प्लांट टाइटेनियम का माना जाता है। उन्होंने बताया कि बाई कार्टिकल इम्प्लांट ऐसे लोगों के लिए वरदान है जिनको अभी तक किसी भी तकनीक से दांत नहीं लग सकता था।