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Lucknow News: प्रख्यात नाटककार डॉ. शंकर शेष के नाटक ‘रक्तबीज’ के मंचन ने दिखाई महत्वाकांक्षा की कड़वी सच्चाई

Tue, 01 Sep 2026 02:27 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Tue, 01 Sep 2026 02:27 AM IST
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The staging of the play Raktbeej revealed the bitter truth of ambition.
प्रख्यात नाटककार डॉ. शंकर शेष के नाटक ‘रक्तबीज’ के मंचन ने दिखाई महत्वाकांक्षा की कड़वी सच्चाई
लखनऊ। शोषण की पीड़ा झेलने वाला इंसान जब खुद ताकतवर होता है तो क्या वह उसी व्यवस्था को बदलता है या उसका हिस्सा बन जाता है। सत्ता, सफलता और आगे बढ़ने की अंधी दौड़ के बीच बदलते इंसानी रिश्तों का यही कड़वा सच प्रख्यात नाटककार डॉ. शंकर शेष के बहुचर्चित नाटक ‘रक्तबीज’ में सामने आया।
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सोमवार को गोमतीनगर स्थित अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान में चित्रगुप्त कलामंच समिति की ओर से नाटक का मंचन किया गया। निर्देशन विपिन कुमार ने किया। नाटक की शुरुआत आत्महत्या को लेकर एक गंभीर बहस से होती है। पात्र सवाल उठाते हैं कि क्या किसी व्यक्ति का यह फैसला केवल उसका निजी निर्णय है या इसके पीछे समाज और व्यवस्था से पैदा हुई परिस्थितियां भी जिम्मेदार होती हैं। इसी सवाल के साथ नाटक दर्शकों को उस व्यवस्था की ओर ले जाता है, जहां इंसान की परिस्थितियां उसके फैसलों और व्यवहार को प्रभावित करती हैं।
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कहानी में एक युवा क्लर्क और उसकी पत्नी के जरिये महत्वाकांक्षा का वह चेहरा सामने आता है, जहां नौकरी में आगे बढ़ने की चाह में रिश्ते और भावनाएं भी साधन बन जाते हैं। सबसे त्रासद पहलू यह है कि जो व्यक्ति कभी शोषण का शिकार होता है, वही आगे चलकर शोषक की भूमिका में आ जाता है।
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नाटक की दूसरी घटना शोध और प्रतिष्ठा की दुनिया में मौजूद सत्ता के खेल को सामने लाती है। नाम, प्रसिद्धि और पहचान हासिल करने की होड़ में प्रतिभा और रिश्तों का इस्तेमाल किया जाता है। वरिष्ठ और जूनियर के बीच बढ़ता सत्ता संघर्ष आखिरकार चौंकाने वाले मोड़ पर पहुंचता है। नाटक किसी आसान समाधान की ओर इशारा नहीं करता, बल्कि दर्शकों के सामने यह सवाल छोड़ जाता है कि जिस व्यवस्था में शोषित व्यक्ति ही आगे चलकर शोषक बन जाए, उससे मुक्ति का रास्ता आखिर क्या है। नाटक में सुमेश सक्सेना अंकुर ने शर्मा और शंतनु, ज्योति सिंह ने सुजाता, सुमित श्रीवास्तव ने माधुरी, मानस और गोयल, शिल्पी मलिक ने अंजलि और लीता तथा अनामिका सिंह ने केदार की भूमिका निभाई।


फिल्म दूरियां की कहानी के लिए डॉ. शंकर शेष को मिला था फिल्मफेयर
हिंदी नाटक साहित्य में भारतेंदु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, लक्ष्मीनारायण मिश्र, मोहन राकेश, लक्ष्मीनारायण लाल, धर्मवीर भारती आदि की कड़ी में डॉ. शंकर शेष का विशिष्ट स्थान है। उन्होंने अपने नाटकों के जरिये समाज और इंसानी जीवन के कठिन सवालों को प्रभावी ढंग से मंच तक पहुंचाया। उनका जन्म दो अक्तूबर 1933 को मध्य प्रदेश के बिलासपुर में हुआ था। उच्च शिक्षा नागपुर और मुंबई में प्राप्त करने के बाद उन्होंने रंगमंच को ध्यान में रखकर नाटकों की रचना की। वर्ष 1955 से 1981 के बीच उन्होंने हिंदी में 22 नाटक लिखे। ‘एक और द्रोणाचार्य’, ‘कालजयी’, ‘घरौंदा’, ‘रक्तबीज’, ‘पोस्टर’, ‘राक्षस’, ‘कोमल गांधार’ और ‘आधी रात के बाद’ उनकी प्रमुख कृतियां हैं। ‘एक और द्रोणाचार्य’ उनका सबसे लोकप्रिय नाटक रहा, जिसकी देशभर में 30 से अधिक प्रस्तुतियां हुईं। फिल्म ‘दूरियां’ की कहानी के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था। 28 अक्तूबर 1981 को श्रीनगर (कश्मीर) में 48 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था।

प्रख्यात नाटककार डॉ. शंकर शेष के नाटक ‘रक्तबीज’ के मंचन ने दिखाई महत्वाकांक्षा की कड़वी सच्चाई

प्रख्यात नाटककार डॉ. शंकर शेष के नाटक ‘रक्तबीज’ के मंचन ने दिखाई महत्वाकांक्षा की कड़वी सच्चाई

प्रख्यात नाटककार डॉ. शंकर शेष के नाटक ‘रक्तबीज’ के मंचन ने दिखाई महत्वाकांक्षा की कड़वी सच्चाई

प्रख्यात नाटककार डॉ. शंकर शेष के नाटक ‘रक्तबीज’ के मंचन ने दिखाई महत्वाकांक्षा की कड़वी सच्चाई

प्रख्यात नाटककार डॉ. शंकर शेष के नाटक ‘रक्तबीज’ के मंचन ने दिखाई महत्वाकांक्षा की कड़वी सच्चाई

प्रख्यात नाटककार डॉ. शंकर शेष के नाटक ‘रक्तबीज’ के मंचन ने दिखाई महत्वाकांक्षा की कड़वी सच्चाई

प्रख्यात नाटककार डॉ. शंकर शेष के नाटक ‘रक्तबीज’ के मंचन ने दिखाई महत्वाकांक्षा की कड़वी सच्चाई

प्रख्यात नाटककार डॉ. शंकर शेष के नाटक ‘रक्तबीज’ के मंचन ने दिखाई महत्वाकांक्षा की कड़वी सच्चाई

प्रख्यात नाटककार डॉ. शंकर शेष के नाटक ‘रक्तबीज’ के मंचन ने दिखाई महत्वाकांक्षा की कड़वी सच्चाई

प्रख्यात नाटककार डॉ. शंकर शेष के नाटक ‘रक्तबीज’ के मंचन ने दिखाई महत्वाकांक्षा की कड़वी सच्चाई

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प्रख्यात नाटककार डॉ. शंकर शेष के नाटक ‘रक्तबीज’ के मंचन ने दिखाई महत्वाकांक्षा की कड़वी सच्चाई

प्रख्यात नाटककार डॉ. शंकर शेष के नाटक ‘रक्तबीज’ के मंचन ने दिखाई महत्वाकांक्षा की कड़वी सच्चाई

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