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कल्याण की दहाड़ न कटियार की पुकार
लखनऊ/अखिलेश वाजपेयी
Updated Wed, 28 Aug 2013 03:19 AM IST
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वजह कुछ भी हो लेकिन मंदिर मुद्दे पर परिक्रमा आंदोलन में अतीत में मंदिर आंदोलन पर पराक्रम दिखाने वाले कई चेहरे परदे के पीछे ही रह गए।
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न कल्याण सिंह की दहाड़ सुनाई दी और न विनय कटियार की लोगों से अयोध्या पहुंचने की पुकार। कुछ चेहरे आए भी तो पूरे मामले के उत्तरार्ध में और वह भी बेहद औपचारिक तरीके से।
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जिसमें उत्साह कम औपचारिकता ज्यादा लग रही थी। उम्मीद थी कि कम से कम वे चेहरे तो जरूर विहिप के इस आंदोलन में भी आगे दिखेंगे, जिन्हें पहचान और प्रतिष्ठा राम मंदिर आंदोलन से ही मिली लेकिन उनकी झलक भी इस पूरे आंदोलन में देखने को लोगों की आंखें तरस गईं।
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वर्ष 1990 में कल्याण सिंह बोलते थे कि राम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण अगर अयोध्या में नहीं होगा तो फिर कहां होगा। वही कल्याण 1992 में मुख्यमंत्री हो चुके थे।
6 दिसंबर 1992 को जब ढांचा गिरा और मामला न्यायालय में पहुंचा। तब कल्याण की यह बात घर-घर लोगों की जुबान पर रहा करती थी, ‘ढांचा गिरने पर पछतावा नहीं गर्व है।
राम की सत्ता के आगे यह सत्ता कुछ नहीं। राम काज के लिए जीवन भर जेल में रहना स्वीकार है।’ उम्मीद थी कि कल्याण जैसा भगवा चेहरा इस बार भी परिक्रमा के नाम पर होने वाले आंदोलन पर अपनी भूमिका से ताप भरेगा। पर, ऐसा नहीं हो पाया।
कटियार आए भी तो सकुचाते हुए
विनय कटियार का नाम भी उन लोगों में है, जिनका भाषण 1990 में पानी में आग लगाने वाला समझा जाता है। उनके भाषणों में ये लाइनें युवाओं के बीच चर्चा का मुद्दा रहा करती थीं कि हनुमान जी पूंछ पटकेंगे और मुलायम की लंका भस्म हो जाएगी।
राम मंदिर आंदोलन में अपने आग उगलते इन्हीं भाषणों के नाते वह ‘बजरंगी’ कहे जाने लगे। इस बार यह पूरा आंदोलन उनके ओजपूर्ण भाषओं व भूमिका के बगैर ही चलता रहा। उनकी झलक परिक्रमा वाले दिन हल्की सी दिखी, वह भी अपने अयोध्या स्थित आवास पर।
उमा भारती बोली लेकिन अंत में
उमाभारती भी उन चेहरों में हैं, जिन्हें राम मंदिर आंदोलन से प्रसिद्ध मिली। वर्ष 1990 में उनके भाषणों का ताप वही महसूस कर सकता है जिसने सुना है। पर, इस बार वह भी परदे के पीछे ही रह गई।
उनके भाषण व नारे सुनने को लोग तरस गए। वह बोलीं लेकिन तब जब कुछ पत्रकार उनसे बात करने उनके आवास पर पहुंच गए।
उम्मीद थी कि परिक्रमा आंदोलन के उत्तरार्ध में ही सही वह कुछ ऐसा जरूर बोलेंगी, जिसमें सपा सरकार पर करारा हमला होगा। पर, उन्होंने जिस शैली में सवालों का जवाब दिया तो किसी को लगा ही नहीं कि यह उमा 1990-92 वाली उमा हैं।
यह चेहरे भी नहीं दिखे
सिर्फ कल्याण, कटियार व उमा ही नहीं। अब वात्सल्य ग्राम के माध्यम से सामाजिक सेवा के क्षेत्र में आगे बढ़ चुकी साध्वी ऋतम्भरा के भाषणों की आंच भी इस बार किसी को महसूस नहीं हुई।
वह भी पूरे परिदृश्य से गायब रहीं। लोगों को उम्मीद थी कि इस बार भी उनकी वह लाइनें गूंजेंगी, ‘राम के जो काम न आए, वह बेकार जवानी है।’
आचार्य धर्मेन्द्र के भाषणों की आंच सिर्फ वही महसूस कर सकता है, जो 6 दिसंबर 1992 को ढांचा ढहने के दिन वहां रहा होगा। उस समय मध्यप्रदेश के जयभान पवैया की गिनती भी उन लोगों में होती है, जो विनय कटियार की तरह ही 1990 में लोगों के भीतर आग भरा करते थे। पर, इस बार वह भी कहीं नहीं दिखे।