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Lucknow News: चुनौतियों की सड़क पर जिम्मेदारी का सफर

Thu, 09 Jan 2025 02:58 AM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ Updated Thu, 09 Jan 2025 02:58 AM IST
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The journey of responsibility on the road of challenges
बस की स्टेयरिंग संभाले आज्ञा रावत।
गौरी त्रिवेदी
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दिल के बहलाने का सामान न समझा जाए,
मुझ को अब इतना भी आसान न समझा जाए,
मैं भी दुनिया की तरह जीने का हक मांगती हूं
इस को गद्दारी का एलान न समझा जाए।

पाकिस्तान की मशहूर शायरा रेहाना रूही की गजल की ये पंक्तियां परिवहन विभाग में बस चालक और परिचालकों की भूमिका निभा रहीं महिलाओं पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। जिन क्षेत्रों पर पुरुषों का एकाधिकार रहा है, वहां अब महिलाएं अपनी मेहनत के दम पर बेहतर काम करके दिखा रही हैं।
भारी-भरकम बस की स्टेयरिंग को घुमाकर लंबा सफर तय करना हो या हाथ देकर सवारियां बुलाना हो, टिकट काटना हो... यह सब कुछ महिलाओं के लिए आसान नहीं है। लेकिन ये महिलाएं शक्तिस्वरूपा बन इस कठिन काम को भी आसानी से कर रही हैं। ये महिलाएं समाज के एक बड़े तबके को संदेश दे रही हैं कि अब वे हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला सकती हैं। परिवहन विभाग में इस समय एक महिला बस चालक, 74 महिला परिचालकों की तैनाती है। इनमें 63 नियमित हैं तो 11 संविदा पर हैं। जब अमर उजाला ने इन महिलाओं से बात की तो पता चला कि वे किस तरह से चुनौतियों की सड़क पर जिम्मेदारी का सफर पूरा कर रही हैं। पेश है इन महिला चालक व परिचालकों पर विशेष रिपोर्ट : संवाद
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पहली बार जब बस चलाई तो लोगों ने माना अचंभा

स्नातक कर चुकीं उन्नाव की निवासी आज्ञा रावत परिवहन विभाग में संविदा चालक हैं। उन्होंने बताया कि जब पहली बार बस चलाई तो लोग अचंभा मान गए। लोग मेरे मुंह पर बोलते थे कि अब महिलाएं भी बस चलाने लगीं। जिन महिलाओं को सिर्फ इसलिए जाना जाता हो कि वह घर के कामकाज के लिए ही बनी हैं, वे अगर भारी भरकम बस की स्टेयरिंग को घुमाती नजर आएं तो थोड़ा अचंभा तो होता ही है। ...लेकिन अगर महिलाएं ठान लें तो कुछ भी मुश्किल नहीं है।
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घर कब लौटूंगी, पता नहीं होता

अकबरपुर की साधना सिंह ने बताया कि वह आठ साल से नौकरी कर रही हैं। उनका चार साल का बेटा है। कहा कि सुबह निकलते हैं लेकिन घर कब तक आना होगा, इसका पता नहीं होता। यदि बस ट्रैफिक में फंस गई तो समस्याएं बढ़ जाती हैं। विभाग में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि यदि महिलाओं को देर रात हो जाए तो उन्हें घर भेजवाया जा सके। यात्रियों के साथ भी कई तरह की समस्याओं से जूझना पड़ता है लेकिन हम लोग समन्वय बिठा लेते हैं। एक्सप्रेसवे पर महिलाओं के लिए टॉयलेट की व्यवस्था होनी चाहिए।

गिरते हैं शह सवार ही मैदान-ए-जंग में...
सीतापुर की मूल निवासी नूतन श्रीवास्तव ने बताया कि मैं आयोग के माध्यम से प्रतियोगी परीक्षा पास करके यहां आई हूं। जब ट्रेनिंग होने लगी तो लगा कि गलत विभाग चुन लिया। फिर पिताजी की बात याद आई। वे शायर मिर्जा अजीम बेग की चंद लाइनें हमेशा सुनाते थे कि गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलें। इन्हीं पंक्तियों के सहारे मन को पक्का किया। कहा, आज भी मैं अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करती। किसी भी अराजकतत्व को तुरंत बस से नीचे उतार देती हूं, चाहे भले ही पेनॉल्टी लग जाए। सफर में टॉयलेट की व्यवस्था न होने से माहवारी के दिनों में पैड बदलने की चुनौती रहती है। यहां विशेष अवकाश का भी कोई प्रावधान नहीं है। जब पेट्रोल पंप या फूड कोर्ट पर बस रुकती है तो ही एक विकल्प होता है। महिलाओं से मैं कहना चाहती हूं कि आपको जो भी फील्ड पसंद है, आप उसमें जाएं। हम सब मिलकर ऐसे ही ठोस कदम उठाएंगी तो एक नए युग का निर्माण होगा।

बच्चा छोटा है, कमरे में ताला लगाकर जाती हूं

मूलत: बरेली की रहने वाली रिचा अग्निहोत्री ने बताया कि यह नौकरी 13 से 14 घंटे की है। कभी-कभी लोग अराजक भी हो जाते हैं। लेकिन जब आमजन के बीच ही रहना है तो हर तरीके के इंसान से आपको समन्वय बिठाना पड़ेगा। पति अपना काम करते हैं। बच्चा छोटा है तो उसे कमरे के बाहर ताला लगाकर जाती हूं। समाज में आज भी ड्राइवर, कंडक्टर जैसे कामों को सही नहीं माना जाता है, इसलिए अक्सर नकारात्मकता का शिकार होना पड़ता है।

नकारात्मक लोगों पर ध्यान न दें, आगे बढ़ें

बाराबंकी की रहने वाली गौरी श्रीवास्तव ने बताया कि शादी के कुछ साल बाद ही पति का देहांत हो गया। मेरे पास नौकरी थी तो परेशानियों से लड़ पाई। जिंदगी कठिन हुई लेकिन विभागीय लोगों ने मदद की तो आसानी हो गई। घर से बाहर कुछ नकारात्मक चीजों के चलते हम अपना काम छोड़ दें, यह कतई वाजिब नहीं है। हाथ की सभी अंगुलियां बराबर नहीं होती, उसी तरह समाज में भी अलग-अलग तरह के लोग मिलते हैं। इसलिए सारी चीजों के बीच समन्वय बिठाकर आगे बढ़ना होता है।


आपदा में अवसर तलाशना मेरा काम

उन्नाव की निवासी अनुश्री त्रिवेदी ने बताया कि काम तो मुश्किल है लेकिन मैंने आपदाओं में हमेशा अवसर तलाशा है। अक्सर लोग कुछ फिल्मों का संबोधन कर कमेंट करते रहते हैं। कभी-कभी कहासुनी भी हो जाती है। किसी भी महिला के लिए घर से बाहर निकलने पर बहुत सी चीजें उसकी पसंद की नहीं होती हैं लेकिन चुनौतियों को दरकिनार कर जो महिला आगे बढ़ेगी, वही असल जिंदगी में कुछ अलग कर पाएगी।

कुरुक्षेत्र। एलएनजेपी अस्पताल में बनाया गया आईसालेशन वार्ड। संवाद

कुरुक्षेत्र। एलएनजेपी अस्पताल में बनाया गया आईसालेशन वार्ड। संवाद

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