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अदालत ने माना बाबरी मस्जिद को गिराने का कार्य संविधान के खिलाफ
Mon, 18 Nov 2019 01:48 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Mon, 18 Nov 2019 01:48 AM IST
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बाबरी मस्जिद
- फोटो : फाइल फोटो
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मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक के बाद बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के सह संयोजक डा. कासिम रसूल इलियास ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के हवाले से कहा कि बाबरी मस्जिद में अंतिम नमाज 16 दिसंबर 1949 को पढ़ी गई थी। कोर्ट ने इसे स्वीकार किया है।
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इसके अलावा मुसलमानों के द्वारा दायर किया गया वाद संख्या 4 मियाद के अंदर है तथा आंशिक रूप से डिक्री किये जाने योग्य है। न्यायालय ने भी माना कि 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद गिराई जाने का कार्य भारत के सेक्युलर संविधान के खिलाफ है।
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फैसले में कहा गया कि विवादित भवन में चूंकि हिंदू भी सैकड़ों साल से पूजा करते रहे हैं, इसलिए पूरे विवादित भवन की भूमि वाद संख्या 5 के वादी संख्या 1, यानि भगवान श्रीरामलला को दी जाती है।
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चूंकि विवादित भूमि वाद संख्या 5 के वादी संख्या 1 को दी गई है इसलिए मुसलमानों को 5 एकड़ भूमि केन्द्र सरकार द्वारा या तो एक्वायर्ड लैंड या राज्य सरकार द्वारा अयोध्या में किसी अन्य प्रमुख स्थान पर दी जाये जिस पर वह मस्जिद बना सकें। यह आदेश उच्चतम न्यायालय ने संविधान केअनुच्छेद 142 की शक्तियों का प्रयोग करकेपारित किया है।
जिसके अनुसार 5 एकड़ भूमि सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिये जाने का निर्देश दिया गया है। उन्होंने बताया कि बैठक में चर्चा हुई कि 22-23 दिसंबर 1949 की रात में बाबरी मस्जिद के गुंबद के नीचे मूर्तियां रखे जाने के संबंध में दर्ज एफआईआर और प्रदेश सरकार, डीएम फैजाबाद व एसपी फैजाबाद के द्वारा वाद संख्या 1 व 2 में दाखिल जवाब दावे में यह स्वीकार किया जा चुका है कि उपरोक्त मूर्तियां चोरी से तथा जबरदस्ती रखी गई थीं और माननीय उच्च न्यायालय लखनऊ बेंच ने 30 सितंबर 2010 के निर्णय में भी उपरोक्त मूर्तियों को डीईटी नहीं माना था।