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आज की 'रानी लक्ष्मीबाई', खुद अभावों में पढ़ी, अब बच्चों को पढ़ाती है

Tue, 05 Sep 2017 12:06 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, झांसी
ब्यूरो/ अमर उजाला, झांसी Updated Tue, 05 Sep 2017 12:06 PM IST
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teacher day special, a girl study in lack of facility now she teaches children
बच्चों को पढ़ाती रेखा गुजराती

जिस धरा पर डेढ़ शताब्दी पूर्व वीरांगना लक्ष्मीबाई ने स्वाधीनता संग्राम की दीपशिखा प्रज्वलित की थी, अब वहां एक बेटी अभावों से जूझकर शिक्षा की ज्योति से बालिकाओं का जीवन प्रकाशित करने में जुटी है।

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इंदिरा नगर झुग्गी झोपड़ी में रहने वाली रेखा गुजराती ने कठिन हालातों, अपनों के तिरस्कार और पैसों की कमी से जूझते हुए खुद को शिक्षित किया अब अपनी बस्ती की बालिकाओं को पढ़ाकर उनका जीवन संवारने में जुटी हैं।
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इंदिरा नगर में गुजरात का बाघरी समाज, गौड़ आदिवासी व पत्थर की सिल कुटने वाले लगभग 250 परिवार पिछले कई सालों से बसे हुए हैं। गरीबी और सामाजिक  रूढ़ियों से ग्रस्त इन परिवारों में बालविवाह और बेटियों को शिक्षा न दिलाने का रिवाज है। इन्हीं परिवारों में से एक बाघरी समाज की रेखा ने कुप्रथाओं से जंग लड़ी। 23 वर्ष की रेखा गुजराती की रुचि बचपन से ही पढ़ने में थी।
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संसाधन और माहौल न होने के कारण उसे शिक्षा के लिए यहां-वहां काफी भटकना पड़ता था। बस्ती के समीप एकलव्य स्कूल में पढ़ने गई, लेकिन वहां तीसरी कक्षा तक पढ़ाई होती थी। आगे पढ़ने की समस्या सामने आई तो बस्ती में सरस्वती संस्कार केंद्र संचालित कर रहे राजकुमार आचार्य व बैजंती पांडेय ने उनका खालसा स्कूल में एडमिशन करा दिया। इस दौरान समाज के लोगों से उसे और उसके परिवार वालों को ताने दिए, उनका तिरस्कार किया। लेकिन, वह रेखा के कदम रोक नहीं पाए। रेखा ने अपने माता-पिता क ो शिक्षा का महत्व समझाया और बीए तक पढ़ाई की। 

रामचरित मानस पढ़ती हैं सभी

खुद की पढ़ाई में आई मुसीबत को महसूस करने वाली रेखा ने तय किया कि वह अन्य बालिकाओं को इस समस्या से नहीं जूझने देगी। उन्होंने इंटर पास करते ही बस्ती की लड़कियों को सरस्वती संस्कार केंद्र में पढ़ाना शुरू कर दिया।

आज 21 लड़कियां उनके पास पढ़ने आती है, जो 15 वर्ष से अधिक आयु की है। वह इन्हें हिंदी, सामाजिक विज्ञान, गणित पढ़ाती हैं। सुबह 8 से 10 बजे तक पढ़ने के बाद इनमें से कई लड़कियां परिवार के जीविकोपार्जन के लिए कपडे़ की फेरी करने चली जाती है, तो कई सिलाई, बुनाई, कढ़ाई सीखती है। वह खुद भी सिलाई, बुनाई कराती है। शाम को फिर वह क्लास लगाकर छोटे बच्चों को पढ़ाती है और उनका होमवर्क कराती है। रेखा के मुताबिक बस्ती में सरकारी स्कूल खुलने से शत प्रतिशत साक्षरता यहां हो सकती हैं। 

रामचरित मानस पढ़ती हैं सभी

हिंदी भाषा को सीखने के लिए केंद्र में अध्ययनरत बालिकाएं नियमित रामचरित मानस का पाठ करती हैं। रेखा के मुताबिक इससे हिंदी को सही बोलने और उसकी मात्रा व शुद्धता का ज्ञान सभी को होता रहता है। इसके अलावा सभी धार्मिक संस्कारों में रहे, इसके लिए प्रत्येक मंगलवार को सभी बालिकाएं सुंदरकांड का पाठ भी करती हैं। 

ससुराल छूटा, तो बनाया लक्ष्य पढ़ाई का

रेखा से पढ़ने वाली कविता और जुगनी का बाल विवाह हो गया था। गौना के बाद ससुराल में घरेलू झगड़ा होने पर वह वापस मायके आ गई। अब उन्हें रेखा गुजराती व बैजंती पांडेय पढ़ा रही हैं। दोनों ही शिक्षित होकर स्वावलंबी बनना चाहती हैं।

विरोध हुआ, लेकिन पढ़ाती रही बैजंती

गरीब और आदिवासियों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने में जुटी है बैजंती पांडेय। वह वर्ष 2005 से इंदिरा नगर, जौहर नगर में बच्चों को पढ़ा रही है। शिक्षा के अलावा वह बालिकाओं को जो खुद अपने पैरों पर खड़ी हो सके, उन्हें सिलाई-बुनाई भी सिखाती है। उनके अनुसार जब वह बस्ती में आई, तो खूब व्यंग्य होते थे। विरोध हुआ, लेकिन वह डटी रही। बस्ती में रहने वाली रेखा गुजराती सहित कई लड़कियों को पढ़ाती है, जो आज भी जारी है।

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